सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
परिचय स्मरण नाम पारख लक्षण
तन सौं सुमिरण सब करैं, आत्म सुमिरण एक ।
आत्म आगै एक रस, दादू बड़ा विवेक ॥ 152 ॥
दादू माटी के मुकाम का, सब कोइ जाणै जाप ।
एक आध अरवाह का, बिरला आपै आप ॥ 153 ॥
दादू जब लग असथल देह का, तब लग सब व्यापै ।
निर्भय असथल आत्मा, आगै रस आपै ॥ 154 ॥
जब नांही सुरति शरीर की, बिसरै सब संसार ।
आतम न जाणैं आप को, तब एक रह्या निरधार ॥ 155 ॥
तन सौं सुमिरण कीजिये, जब लग तन नीका ।
आत्म सुमिरण ऊपजै, तब लागै फीका ॥
आगै आपैं आप है, तहाँ क्या जी का ।
दादू दूजा कहन को, नाहीं लघु टीका ॥ 156 ॥
परिचय अंग
चर्म दृष्टि देखै बहुत, आतम दृष्टि एक।
ब्रह्म दृष्टि परचै भया, तब दादू बैठा देख ॥ 157 ॥
ये ही नैनां देह के, ये ही आत्म होइ ।
ये ही नैनां ब्रह्म के, दादू पलटे दोइ ॥ 158 ॥
घट परचै सब घट लखै, प्राण परचै प्राण ।
ब्रह्म परचै पाइये, दादू है हैरान ॥ 159 ॥
सूक्ष्म सौंज अरचा बंदगी
दादू जल पाषाण ज्यों, सेवै सब संसार ।
दादू पाणी लूंण ज्यों, कोइ बिरला पूजणहार ॥ 160 ॥
नाम पारिख लक्षण
अलख नाम अंतर कहै, सब घट हरि हरि होइ ।
दादू पाणी लूण ज्यों, नाम कहीजे सोइ ॥ 161 ॥
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