सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू शब्द अनाहद हम सुन्या, नखसिख सकल शरीर ।
सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥ 174 ॥
हुण दिल लग्गा हिकसां, मे कूं येहा ताति ।
दादू कम्म खुदाय दे, बैठा डी है राति ॥ 175 ॥
दादू माला सब आकार की, कोई साधु सुमिरै राम ।
करणी कर तैं क्या किया, ऐसा तेरा नाम ॥ 176 ॥
सब घट मुख रसना करै, रटै राम का नाम ।
दादू पीवै रामरस, अगम अगोचर ठाम ॥ 177 ॥
दादू मन चित सुस्थिर कीजिये, तो नख सिख सुमिरण होइ ।
श्रवण नेत्र मुख नासिका, पंचों पूरे सोइ ॥ 178 ॥
साध महिमा
आतम आसन राम का, तहाँ बसै भगवान ।
दादू दोन्यूं परस्पर, हरि आतम का थान ॥ 179 ॥
राम जपै रुचि साधु को, साधु जपै रुचि राम ।
दादू दोनों एक टग, यहु आरम्भ यहु काम ॥ 180 ॥
जहाँ राम तहाँ संतजन, जहाँ साधु तहाँ राम ।
दादू दोन्यूं इकट्ठे, अरस परस विश्राम ॥ 181 ॥
दादू हरि साधु यों पाइये, अविगति के आराध ।
साधु संगति हरि मिलै, हरि संगति तैं साध ॥ 182 ॥
दादू राम नाम सौं मिलि रहै, मन के छाड़ि विकार ।
तो दिल ही माँहैं देखिये, दोनों का दीदार ॥ 183 ॥
साधु समाना राम में, राम रह्या भरपूर ।
दादू दोनों एक रस, क्यों कर कीजै दूर ॥ 184 ॥
सत्संग महात्म
दादू सेवक सांई का भया, तब सेवक का सब कोइ ।
सेवक सांई को मिल्या, तब सांई सरीखा होइ ॥ 185 ॥
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