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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 504 में से

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पृष्ठ 89

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
पतिव्रत
दादू देख्या एक मन, सो मन सब ही मांहि।
तिहि मन सौं मन मानिया, दूजा भावै नांहि ॥ 195 ॥
पुरुष प्रकाशी
दादू जिहिं घट दीपक राम का, तिहिं घट तिमिर न होइ।
उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 196 ॥
पतिव्रत
दादू दिल अरवाह का, सो अपणा ईमान।
सोई साबित राखिये, जहँ देखै रहमान ॥ 197 ॥
अल्लह आप ईमान है, दादू के दिल मांहि।
सोई साबित राखिये, दूजा कोई नांहि ॥ 198 ॥
प्राण पवन ज्यों पतला, काया करै कमाइ।
दादू सब संसार में, क्योंहि गह्या न जाइ ॥ 199 ॥
नूर तेज ज्यों जोति है, प्राण पिंड यो होइ।
दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, साहिब के वश सोइ ॥ 200 ॥
काया सूक्ष्म कर मिलै, ऐसा कोई एक।
दादू आत्म ले मिलैं, ऐसे बहुत अनेक ॥ 201 ॥
सुन्दरी सुहाग
आडा आत्म तन धरै, आप रहै ता मांहि।
आपण खेलै आप सौं, जीवन सेती नांहि ॥ 202 ॥
अध्यात्म
दादू अनभै थैं आनन्द भया, पाया निर्गुण नांव।
निश्चल निर्मल निर्वाण पद, अगम अगोचर ठांव ॥ 203 ॥
दादू अनभै वाणी अगम को, ले गई संग लगाइ।
अगह गहै, अकह कहै, अभेद भेद लहाइ ॥ 204 ॥
जो कुछ बेद कुरान थैं, अगम अगोचर बात।
सो अनभै साचा कहै, यहु दादू अकह कहात ॥ 205 ॥

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