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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 504 में से

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पृष्ठ 79

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू दह दिश दीपक तेज के, बिन बाती बिन तेल।
चहुँ दिसि सूरज देखिये, दादू अद्भुत खेल ॥ 87 ॥
सूरज कोटि प्रकास है, रोम रोम की लार।
दादू ज्योति जगदीश की, अंत न आवै पार ॥ 88 ॥
ज्यों रवि एक आकाश है, ऐसे सकल भरपूर।
दादू तेज अनन्त है, अल्लह आली नूर ॥ 89 ॥
सूरज नहीं तहँ सूरज देख्या, चंद नहीं तहँ चन्दा।
तारे नहीं तहँ झिलमिल देख्या, दादू अति आनन्दा ॥ 90 ॥
बादल नहीं तहँ बरषत देख्या, शब्द नहीं गरजंदा।
बीज नहीं तहँ चमकत देख्या, दादू परमानन्दा ॥ 91 ॥
आत्म बेलीतरु
दादू जोति चमकै झिलमिलै, तेज पुंज प्रकाश।
अमृत झरै रस पीजिए, अमर बेलि आकाश ॥ 92 ॥
परिचय अंग
दादू अविनाशी अंग तेज का, ऐसा तत्त्व अनूप।
सो हम देख्या नैन भरि, सुन्दर सहज स्वरूप ॥ 93 ॥
परम तेज प्रगट भया, तहाँ मन रह्या समाइ।
दादू खेलै पीव सौं, नहीं आवै नहीं जाइ ॥ 94 ॥
निराधार निज देखिये, नैनहुँ लागा बन्द।
तहँ मन खेलै पीव सौं, दादू सदा आनन्द ॥ 95 ॥
आत्म बेलितरु
ऐसा एक अनूप फल, बीज बाकुला नांहि।
मीठा निर्मल एक रस, दादू नैनहुँ मांहि ॥ 96 ॥
परिचय
हीरे हीरे तेज के, सो निरखै त्रय लोइ।
कोइ इक देखै संत जन, और न देखै कोइ ॥ 97 ॥

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