सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
परिचय आत्मबली तरु
तरुवर साखा मूल बिन, धरती पर नांही ।
अविचल अमर अनंत फल, सो दादू खांही ॥ 122 ॥
तरुवर साखा मूल बिन, धर अंबर न्यारा ।
अविनाशी आनन्द फल, दादू का प्यारा ॥ 123 ॥
तरुवर साखा मूल बिन, रज बीरज रहिता ।
अजरा अमर अतीत फल, सो दादू गहिता ॥ 124 ॥
तरुवर साखा मूल बिन, उत्पति परलै नांहि ।
रहिता रमता राम फल, दादू नैनहुँ मांहि ॥ 125 ॥
प्राण तरुवर सुरति जड़, ब्रह्म भूमि ता मांहि ।
रस पीवै फूलै फलै, दादू सूखै नांहि ॥ 126 ॥
परिचय जिज्ञासु उपदेश (प्रश्न)
ब्रह्म सुनि तहँ क्या रहै ? आतम के अस्थान ?
काया अस्थल क्या बसै ? सतगुरु कहो सुजान ॥ 127 ॥
देह अध्यासियों के लक्षण (उत्तर)
काया के अस्थल रहैं, मन राजा पंच प्रधान ।
पच्चीस प्रकृति तीन गुण, आपा गर्व गुमान ॥ 128 ॥
आत्म जिज्ञासु के लक्षण
आतम के स्थान हैं, ज्ञान ध्यान विश्वास ।
सहज सील संतोष सत, भाव भक्ति निधि पास ॥ 129 ॥
ब्रह्मनिष्ठ के लक्षण
ब्रह्म शून्य तहँ ब्रह्म है, निरंजन निराकार ।
नूर तेज तहँ ज्योति है, दादू देखणहार ॥ 130 ॥
अबुल फज़ल के प्रश्न
मौजूद खबर, माबूद खबर, अरवाह खबर औजूद ।
मुकाम चिः चीज हस्त, दादनी सजूद ॥ 131 ॥
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