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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
ऐसो राजा सोई आहि, चौदह भुवन में रह्यो समाहि ।
दादू ताकी सेवा करै, जिन यहु रचिले अधर धरै ॥ 8 ॥
३9२. जीवित मृतक । एकताल
जब यहु मैं मैं मेरी जाइ, तब देखत वेग मिलै राम राइ ॥ टेक ॥
मैं मैं मेरी तब लग दूर, मैं मैं मेटि मिलै भरपूर ॥ 1 ॥
मैं मैं मेरी तब लग नांहि, मैं मैं मेटि मिलै मन माँहि ॥ 2 ॥
मैं मैं मेरी न पावै कोइ, मैं मैं मेटि मिलै जन सोइ ॥ 3 ॥
दादू मैं मैं मेरी मेटि, तब तूँ जान राम सौं भेटि ॥ 4 ॥
३9३. ज्ञान प्रलय । मदन ताल
नाँहीं रे हम नाँहीं रे, सत्यराम सब माँहीं रे ॥ टेक ॥
नाँहीं धरणि अकाशा रे, नाँहीं पवन प्रकाशा रे।
नाँहीं रवि शशि तारा रे, नहीं पावक प्रजारा रे ॥ 1 ॥
नाँहीं पाँच पसारा रे, नाँहीं सब संसारा रे।
नहीं काया जीव हमारा रे, नहीं बाजी कौतिकहारा रे ॥ 2 ॥
नाँहीं तरवर छाया रे, नहीं पंखी नहीं माया रे।
नाँहीं गिरिवर वासा रे, नाँहीं समंद निवासा रे ॥ 3 ॥
नाँहीं जल थल खंडा रे, नाँहीं सब ब्रह्मांडा रे।
नाँहीं आदि अनंता रे, दादू राम रहंता रे ॥ 4 ॥
३94. मध्य मार्ग निष्पक्ष । षट्ताल
अलह कहो भावै राम कहो, डाल तजो सब मूल गहो ॥ टेक ॥
अलह राम कहि कर्म दहो, झूठे मारग कहा बहो ॥ 1 ॥
साधू संगति तो निबहो, आइ परै सो शीश सहो ॥ 2 ॥
काया कमल दिल लाइ रहो, अलख अलह दीदार लहो ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
सतगुरु की सुन सीख अहो, दादू पहुँचे पार पहो ॥ 4 ॥
395. दादरा
हिंदू तुरक न जानूं दोइ।
सांई सबन का सोई है रे, और न दूजा देखूं कोइ ॥ टेक ॥
कीट पतंग सबै योनिन में, जल थल संग समाना सोइ।
पीर पैगम्बर देवा दानव, मीर मलिक मुनिजन को मोहि ॥ 1 ॥
कर्ता है रे सोई चीन्हौं, जनि वै क्रोध करे रे कोइ।
जैसे आरसी मंजन कीजे, राम रहीम देही तन धोइ ॥ 2 ॥
सांई केरी सेवा कीजे, पायो धन काहे को खोइ।
दादू रे जन हरि जप लीजे,जन्म जन्म जे सुरिजन होइ ॥ 3 ॥
396. मदन ताल
को स्वामी को शेख कहै, इस दुनियां का मर्म न कोई लहै ॥ टेक ॥
कोई राम कोई अलह सुनावै, पुनि अलह राम का भेद न पावै ॥ 1 ॥
कोई हिन्दू कोई तुर्क कर मानै, पुनि हिन्दू तुर्क की खबर न जानै ॥ 2 ॥
यहु सब करणी दोनों वेद, समझ परी तब पाया भेद ॥ 3 ॥
दादू देखै आत्म एक, कहबा सुनबा अनन्त अनेक ॥ 4 ॥
397. निन्दा। त्रिताल
निन्दत है सब लोक विचारा, हमको भावै राम पियारा ॥ टेक ॥
निस्संशय निर्दोष लगावै, तातैं मोको अचरज आवै ॥ 1 ॥
दुविधा द्वै पख रहिता जे, तासन कहत गये रे ये ॥ 2 ॥
निर्बैरी निहकामी साध, ता सिर देत बहुत अपराध ॥ 3 ॥
लोहा कंचन एक समान, तासन कहत करत अभिमान ॥ 4 ॥
निन्दा औ स्तुति एकै तोलै, तासन कहैं अपवाद हि बोलै ॥ 5 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
दादू निन्दा ताको भावै, जाकै हिरदै राम न आवै ॥ 6 ॥
३९४. (गुजराती) अनन्य शरण । उदीक्षण ताल
महारूं सूं जेहूँ आपूं, ताहरूं छै तूंनें थापूं ॥ टेक ॥
सर्व जीव नें तूं दातार, तैं सिरज्या नें तूं प्रतिपाल ॥ 1 ॥
तन धन ताहरो तैं दीधो, हूँ ताहरो नें तैं कीधो ॥ 2 ॥
सहुवे ताहरो सांचो ये, मैं मैं माहरो झूठो ते ॥ 3 ॥
दादू नें मन और न आवे, तूं कर्ता ने तूं हि जु भावे ॥ 4 ॥
३९९. निष्काम । उदीक्षण ताल
ऐसा अवधू राम पियारा, प्राण पिंड तैं रहै नियारा ॥ टेक ॥
जल लग काया तब लग माया, रहै निरन्तर अवधू राया ॥ 1 ॥
अठ सिधि भाई नो निधि आई, निकट न जाई राम दुहाई ॥ 2 ॥
अमर अभय पद बैकुंठ बासा, छाया माया रहै उदासा ॥ 3 ॥
सांई सेवक सब दिखलावै, दादू दूजा दृष्टि न आवै ॥ 4 ॥
५००. शूरातन कसौटी । भंगताल
तूँ साहिब मैं सेवक तेरा, भावै सिर दे सूली मेरा ॥ टेक ॥
भावै करवत सिर पर सार, भावै लेकर गरदन मार ॥ 1 ॥
भावै चहुँ दिशि अग्नि लगाइ, भावै काल दशों दिशि खाइ ॥ 2 ॥
भावै गिरिवर गगन गिराइ, भावै दरिया माँहि बहाइ ॥ 3 ॥
भावै कनक कसौटी देहु, दादू सेवक कस कस लेहु ॥ 4 ॥
५०1. साधु । भंगताल
काम क्रोध नहिं आवै मेरे, तातैं गोविन्द पाया नेरे ॥ टेक ॥
भरम कर्म जाल सब दीन्हा, रमता राम सबन में चीन्हा ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25


दुविधा दुर्मति दूरि गँवाई, राम रमत सांची मन आई ॥ २ ॥
नीच ऊँच मध्यम को नांही, देखूं राम सबन के मांही ॥ ३ ॥
दादू सांच सबन में सोई, पैंड पकर जन निर्भय होई ॥ ४ ॥

५०२. हित उपदेश। खेमटा ताल
हाजिरां हजूर सांई, है हरि नेड़ा दूर नांही ॥ टेक ॥
मनी मेट महल में पावै, काहे खोजन दूरि जावै ॥ १ ॥
हिर्स न होइ, गुस्सा सब खाइ, तातैं संइयां दूर न जाइ ॥ २ ॥
दुई दूर दरोग न होइ, मालिक मन में देखै सोइ ॥ ३ ॥
अरि ये पाँच शोध सब मारै, तब दादू देखै निकटि विचारै ॥ ४ ॥

५०३. खेमटा ताल
राम रमत है देखे न कोइ, जो देखे सो पावन होइ ॥ टेक ॥
बाहिर भीतर नेड़ा न दूर, स्वामी सकल रह्या भरपूर ॥ १ ॥
जहां देखूं तहँ दूसर नांहि, सब घट राम समाना मांहि ॥ २ ॥
जहाँ जाऊँ तहँ सोई साथ, पूर रह्या हरि त्रिभुवन नाथ ॥ ३ ॥
दादू हरि देखे सुख होहि, निशदिन निरखन दीजे मोहि ॥ ४ ॥

५०४. अध्यात्म। एकताल
मन पवन ले उनमन रहै, अगम निगम मूल सो लहै ॥ टेक ॥
पाँच वायु जे सहज समावै, शशिहर के घर आणै सूर।
शीतल सदा मिलै सुखदाई, अनहद शब्द बजावै तूर ॥ १ ॥
बंकनालि सदा रस पीवै, तब यहु मनवा कहीं न जाइ।
विकसै कमल प्रेम जब उपजै, ब्रह्म जीव की करै सहाइ ॥ २ ॥
बैस गुफा में ज्योति विचारै, तब तेहिं सूझै त्रिभुवन राइ।
अंतर आप मिलै अविनाशी, पद आनन्द काल नहिं खाइ ॥ ३ ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
जामण मरण जाइ, भव भाजै, अवरण के घर वरण समाइ ।
दादू जाय मिलै जगजीवन, तब यहु आवागमन विलाइ ॥ 4 ॥
405. एक ताल
जीवन मूरी मेरे आतम राम, भाग बड़े पायो निज ठाम ॥ टेक ॥
शब्द अनाहद उपजै जहाँ, सुषमन रंग लगावै तहाँ ।
तहँ रंग लागे निर्मल होइ, ये तत उपजे जानै सोइ ॥ 1 ॥
सरवर तहाँ हंसा रहे, कर स्नान सबै सुख लहै ।
सुखदाई को नैनहुँ जोइ, त्यों त्यों मन अति आनन्द होइ ॥ 2 ॥
सो हंसा शरणागति जाइ, सुन्दरि तहाँ पखाले पाइ ।
पीवै अमृत नीझर नीर, बैठे तहाँ जगत गुरु पीर ॥ 3 ॥
तहँ भाव प्रेम की पूजा होइ, जा पर किरपा जानै सोइ ।
कृपा करि हरि देइ उमंग, तहँ जन पायो निर्भय संग ॥ 4 ॥
तब हंसा मन आनंद होइ, वस्तु अगोचर लखै रे सोइ ।
जा को हरि लखावै आप, ताहि न लिपैं पुन्य न पाप ॥ 5 ॥
तहँ अनहद बाजै अद्भुत खेल, दीपक जलै बाती बिन तेल ।
अखंड ज्योति तहँ भयो प्रकास, फाग बसंत ज्यों बारह मास ॥ 6 ॥
त्रय स्थान निरंतर निरधार, तहँ प्रभु बैठे समर्थ सार ।
नैनहुँ निरखूं तो सुख होइ, ताहि पुरुष को लखै न कोइ ॥ 7 ॥
ऐसा है हरि दीनदयाल, सेवक की जानें प्रतिपाल ।
चलु हंसा तहँ चरण समान, तहँ दादू पहुँचे परिवान ॥ 8 ॥
406. आत्म परमात्म रास । एकताल
घट घट गोपी घट घट कान्ह, घट घट राम अमर अस्थान ॥ टेक ॥
गंगा जमना अंतर-वेद, सरस्वती नीर बहै प्रस्वेद ॥ 1 ॥
कुंज केलि तहं परम विसाल, सब संगी मिल खेलैं रास ॥ 2 ॥

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
तहँ बिन बैना बाजैं तूर, विकसै कँवल चंद अरु सूर ॥ 3 ॥
पूरण ब्रह्म परम प्रकाश, तहँ निज देखै दादू दास ॥ 4 ॥
इति राग भैरूं सम्पूर्णम् ॥ 25 ॥ पद 34 ॥
दादूराम
सत्यराम

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अथ राग ललित 26
(गायन समय प्रातः 3 से 6)
५०7. पराभक्ति । त्रिताल
राम तूँ मोरा हौं तोरा, पाइन परत निहोरा ॥ टेक ॥
एकै संगैं वासा, तुम ठाकुर हम दासा ॥ 1 ॥
तन मन तुम कौं देबा, तेज पुंज हम लेबा ॥ 2 ॥
रस माँही रस होइबा, ज्योति स्वरूपी जोइबा ॥ 3 ॥
ब्रह्म जीव का मेला, दादू नूर अकेला ॥ 4 ॥
५०8. (मराठी) अनन्य शरण । त्रिताल
मेरे गृह आव हो गुरु मेरा, मैं बालक सेवक तेरा ॥ टेक ॥
मात पिता तूँ अम्हचा स्वामी, देव हमारे अंतरजामी ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग ललित 26
अम्हचा सज्जन अम्हचा बँधू, प्राण हमारे अम्हचा जिन्दू ॥ 2 ॥
अम्हचा प्रीतम अम्हचा मेला, अम्हची जीवन आप अकेला ॥ 3 ॥
अम्हचा साथी संग सनेही, राम बिना दुख दादू देही ॥ 4 ॥
५०९. (गुजराती) हितोपदेश । गजताल
वाहला माहरा ! प्रेम भक्ति रस पीजिये,
रमिये रमता राम, माहरा वाहला रे ।
हिरदा कमल में राखिये, उत्तम एहज ठाम, माहरा वाहला रे ॥ टेक ॥
वाहला माहरा ! सतगुरु शरणे अणसरे,
साधु समागम थाइ, माहरा वाहला रे ।
वाणी ब्रह्म बखानिये, आनन्द में दिन जाइ, माहरा वाहला रे ॥ 1 ॥
वाहला माहरा ! आतम अनुभव ऊपजे,
ऊपजे ब्रह्म गियान, माहरा वाहला रे ।
सुख सागर में झूलिये, साचो येह स्नान, माहरा वाहला रे ॥ 2 ॥
वाहला माहरा ! भव बन्धन सब छूटिये,
कर्म न लागे कोइ, माहरा वाहला रे ।
जीवन मुक्ति फल पामिये, अमर अभय पद होइ, माहरा वाहला रे ॥ 3 ॥
वाहला माहरा ! अठ सिधि नौ निधि आँगणे,
परम पदारथ चार, माहरा वाहला रे ।
दादू जन देखे नहीं, रातो सिरजनहार, माहरा वाहला रे ॥ 4 ॥
५१०. अखंड प्रीति । गजताल
हमारो मन माई ! राम नाम रंग रातो ।
पिव पिव करै पीव को जानै, मगन रहै रस मातो ॥ टेक ॥
सदा सील संतोष सुहावत, चरण कँवल मन बाँधो ।
हिरदा माँही जतन कर राखूँ, मानों रंक धन लाधो ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग ललित 26
प्रेम भक्ति प्रीति हरि जानूं, हरि सेवा सुखदाई ।
ज्ञान ध्यान मोहन को मेरे, कंप न लागे काई ॥ 2 ॥
संगि सदा हेत हरि लागो, अंगि और नहिं आवे ।
दादू दीन दयाल दमोदर, सार सुधा रस भावे ॥ 3 ॥
५11. (फारसी) साहिब सिफत। राज मृगांक ताल
महरवान, महरवान!
आब बाद खाक आतिश, आदम नीशान ॥ टेक ॥
शीश पाँव हाथ कीये, नैन कीये कान।
मुख कीया जीव दीया, राजिक रहमान ॥ 1 ॥
मादर पिदर परदः पोश, सांई सुबहान।
संग रहै दस्त गहै, साहिब सुलतान ॥ 2 ॥
या करीम या रहीम, दाना तूँ दीवान।
पाक नूर है हजूर, दादू है हैरान ॥ 3 ॥
इति राग ललित सम्पूर्ण ॥ 26 ॥ पद 5 ॥

  • 482 -

राग जैतश्री
अथ राग जैत श्री 27
(गायन समय दिन 3 से 6)
412. अमिट नाम विनती । पंजाबी त्रिताल
तेरे नाम की बलि जाऊँ, जहाँ रहूँ जिस ठाऊँ ॥ टेक ॥
तेरे बैनों की बलिहारी, तेरे नैनहुँ ऊपरि वारी ।
तेरी मूरति की बलि कीती, वारि-वारि हौं दीती ॥ 1 ॥
शोभित नूर तुम्हारा, सुन्दर ज्योति उजारा ।
मीठा प्राण पियारा, तूं है पीव हमारा ॥ 2 ॥
तेज तुम्हारा कहिये, निर्मल काहे न लहिये ।
दादू बलि बलि तेरे, आव पिया तूँ मेरे ॥ 3 ॥

  • 483 -

श्री दादूवाणी-राग जैत श्री 27

५13. विरह विनती । पंजाबी त्रिताल
मेरे जीव की जानै जानराइ, तुमतैं सेवक कहा दुराइ ॥ टेक ॥
जल बिन जैसे जाइ जिय तलफत, तुम्ह बिन तैसे हमहु विहाइ ॥ 1 ॥
तन मन व्याकुल होइ विरहनी, दरश पियासी प्राण जाइ ॥ 2 ॥
जैसे चित्त चकोर चंद मन, ऐसे मोहन हमहि आहि ॥ 3 ॥
विरह अगनि दहत दादू को, दर्शन परसन तनहि सिराइ ॥ 4 ॥
इति राग जैत श्री सम्पूर्ण ॥ 27 ॥ पद 2 ॥

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राग धनाश्री
www.dadooram.org
अथ राग धना श्री २४
(गायन समय दिन ३ से ६)
५14. अमिट अविनाशी रंग । धीमा ताल
रंग लागो रे राम को, सो रंग कदे न जाई रे ।
हरि रंग मेरो मन रंग्यो, और न रंग सुहाई रे ।। टेक ।।
अविनाशी रंग ऊपनो, रच मच लागो चोलो रे ।
सो रंग सदा सुहावनो, ऐसो रंग अमोलो रे ।। 1 ।।
हरि रंग कदे न ऊतरै, दिन दिन होइ सुरंगो रे ।
नित नवो निरवाण है, कदे न ह्वैला भंगो रे ।। 2 ।।
सांचो रंग सहजैं मिल्यो, सुन्दर रंग अपारो रे ।
भाग बिना क्यों पाइये, सब रंग मांहीं सारो रे ।। 3 ।।
अवरण को का वरणिये, सो रंग सहज स्वरूपो रे ।

  • 485 -

श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
बलिहारी उस रंग की, जन दादू देख अनूपो रे ॥ 4 ॥
415. धीमा ताल
लाग रह्यो मन राम सौं, अब अनतैं नहिं जाये रे।
अचला सौं थिर है रह्यो, सकै न चित्त डुलाये रे ॥ टेक ॥
ज्यों फुर्निंग चंदन रहै, परिमल रहै लुभाये रे।
त्यूँ मन मेरा राम सौं, अब की बेर अघाये रे ॥ 1 ॥
भँवर न छाड़ै बास को, कँवल हि रह्यो बँधाये रे।
त्यूं मन मेरा राम सौं, वेध रह्यो चित्त लाये रे ॥ 2 ॥
जल बिन मीन न जीवई, विछुरत ही मर जाये रे।
त्यों मन मेरा राम सौं, ऐसी प्रीति बनाये रे ॥ 3 ॥
ज्यूं चातक जल को रटै, पीव पीव करत बिहाये रे।
त्यों मन मेरा राम सौं, जन दादू हेत लगाये रे ॥ 4 ॥
416. विनती । वीर विक्रम ताल
मनमोहन हो !
कठिन विरह की पीर, सुन्दर दरस दिखाइये ॥ टेक ॥
सुनहु न दीन दयाल, तव मुख बैन सुनाइये ॥ 1 ॥
करुणामय कृपाल, सकल शिरोमणि आइये ॥ 2 ॥
मम जीवन प्राण अधार, अविनाशी उर लाइये ॥ 3 ॥
इब हरि दरसन देहु, दादू प्रेम बढ़ाइये ॥ 4 ॥
417. वीर विक्रम ताल
कतहूँ रहे हो विदेश, हरि नहिं आये हो।
जन्म सिरानों जाइ, पीव नहिं पाये हो ॥ टेक ॥
विपति हमारी जाइ, हरि सौं को कहे हो।

  • 486 -

श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
तुम्ह बिन नाथ अनाथ, विरहनि क्यों रहे हो ॥ 1 ॥
पीव के विरह वियोग, तन की सुधि नहीं हो।
तलफि तलफि जीव जाइ, मृतक ह्वै रही हो ॥ 2 ॥
दुखित भई हम नारि, कब हरि आवे हो ।
तुम्ह बिन प्राण अधार, जीव दुख पावे हो ॥ 3 ॥
प्रगटहु दीनदयाल, विलम्ब न कीजिये हो ।
दादू दुखी बेहाल, दरसन दीजिये हो ॥ 4 ॥
५18. रंग ताल
सुरजन मेरा वे ! कीहैं पार लहाऊँ।
जे सुरजन घर आवै वे, हिक कहाण कहाऊँ ॥ टेक॥
तो बाजैं मेकौं चैन न आवै, ये दुख कींह कहाऊँ।
तो बाजैं मेकौं नींद न आवै, अँखियाँ नीर भराऊँ ॥ 1 ॥
जे तूँ मेकौं सुरजन डेवै, सो हौं शीश सहाऊँ।
ये जन दादू सुरजन आवै, दरगह सेव कराऊँ ॥ 2 ॥
५19. रंग ताल
मोहन माधव कब मिलै, सकल शिरोमणि राइ।
तन मन व्याकुल होत है, दरस दिखाओ आइ ॥ टेक॥
नैन रहे पथ जोवताँ, रोवत रैनि बिहाइ।
बाल सनेही कब मिलै, मोपै रह्या न जाइ ॥ 1 ॥
छिन-छिन अंग अनल दहै, हरिजी कब मिलि हैं आइ।
अंतरजामी जान कर, मेरे तन की तप्त बुझाइ ॥ 2 ॥
तुम दाता सुख देत हो, हाँ हो सुन दीनदयाल।
चाहैं नैन उतावले, हाँ हो कब देखूं लाल ॥ 3 ॥
चरन कमल कब देख हौं, हाँ हो सन्मुख सिरजनहार।

  • 487 -

श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
सांई संग सदा रहौं, हाँ हो तब भाग हमार ॥ 4 ॥
जीवनि मेरी जब मिलै, हाँ हो तब ही सुख होइ ।
तन मन में तूं ही बसै, हाँ हो कब देखूं सोइ ॥ 5 ॥
तन मन की तूं ही लखै, हाँ हो सुन चतुर सुजान ।
तुम देखे बिन क्यों रहौं, हाँ हो मोहि लागे बान ॥ 6 ॥
बिन देखे दुख पाइये, हाँ हो इब विलम्ब न लाइ ।
दादू दरशन कारणैं, हाँ हो सुख दीजे आइ ॥ 7 ॥
५२०. (सिंधी) वैराग्य । वर्ण भिन्न ताल
ये खूहि पयें सब भोग विलासन,
तैसेहु वाझौं छत्र सिंहासन ॥ टेक॥
जन तिहुंरा बहिश्त नहिं भावे, लाल पलिंग क्या कीजे ।
भाहि लगे इह सेज सुखासन, मेकौं देखण दीजे ॥ 1 ॥
बैकुंठ मुक्ति स्वर्ग क्या कीजे, सकल भुवन नहिं भावे ।
भठी पयें सब मंडप छाजे, जे घर कंत न आवे ॥ 2 ॥
लोक अनंत अभै क्या कीजे, मैं विरहीजन तेरा ।
दादू दरशन देखण दीजे, ये सुन साहिब मेरा ॥ 3 ॥
५२१. (फारसी) ईमान साबित । (राग काफी) राज मृगांक ताल
अल्लह आशिकाँ ईमान, बहिश्त दोजख दीन दुनियां, चे कारे रहमान ॥ टेक॥
मीर मीरी पीर पीरी, फरिश्तः फरमान ।
आब आतिश अर्श कुर्सी, दीदनी दीवान ॥ 1 ॥
हरदो आलम खलक खाना, मोमिना इसलाम ।
हजां हाजी क़ज़ा क़ाज़ी, खान तूं सुलतान ॥ 2 ॥
इल्म आलम मुल्क मालुम, हाजते हैरान ।
अजब यारां खबरदारां, सूरते सुबहान ॥ 3 ॥

  • 488 -

अव्वल आखिर एक तूँ ही, जिन्द है कुरबान ।
आशिकां दीदार दादू, नूर का नीशान ॥ 4 ॥
422. (फारसी) विरह विनती। (राग काफी) वर्ण भिन्न ताल
अल्लह तेरा ज़िकर फ़िकर करते हैं,
आशिकां मुश्ताक तेरे, तर्स तर्स मरते हैं ॥ टेक ॥
खलक खेश दिगर नेस्त, बैठे दिन भरते हैं।
दायम दरबार तेरे, गैर महल डरते हैं ॥ 1 ॥
तन शहीद मन शहीद, रात दिवस लड़ते हैं।
ज्ञान तेरा ध्यान तेरा, इश्क आग जलते हैं ॥ 2 ॥
जान तेरा जिन्द तेरा, पाँवों सिर धरते हैं।
दादू दीवान तेरा, जर खरीद घर के हैं ॥ 3 ॥
423. गज ताल
मुख बोल स्वामी तूँ अन्तर्यामी, तेरा शब्द सुहावै राम जी ॥ टेक ॥
धेनु चरावन बेनु बजावन, दर्श दिखावन कामिनी ॥ 1 ॥
विरह उपावन तम बुझावन, अंगि लगावन भामिनी ॥ 2 ॥
संग खिलावन रास बनावन, गोपी भावन भूधरा ॥ 3 ॥
दादू तारन दुरित निवारण, संत सुधारण राम जी ॥ 4 ॥
424. केवल विनती। गज ताल
हाथ दे हो रामा, तुम सब पूरण कामा, हौं तो उरझ रह्यो संसार ॥ टेक ॥
अंध कूप गृह में पर्यो, मेरी करहु सँभाल।
तुम बिन दूजा को नहीं, मेरे दीनानाथ दयाल ॥ 1 ॥
मारग को सूझै नहीं, दह दिशि माया जाल।
काल पाश कसि बाँधियो, मेरे कोई न छुड़ावनहार ॥ 2 ॥

श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
राम बिना छूटै नहीं, कीजै बहुत उपाइ ।
कोटि किया सुलझै नहीं, अधिक अलूझत जाइ ॥ ३ ॥
दीन दुखी तुम देखताँ, भौ दुख भंजन राम ।
दादू कहै कर हाथ दे हो, तुम सब पूरण काम ॥ ४ ॥
425. करुणा विनती । त्रिताल
जनि छाड़ै राम जनि छाड़ै, हमहिं विसार जनि छाड़ै ।
जीव जात न लागै बार, जनि छाड़ै ॥ टेक ॥
माता क्यों बालक तजै, सुत अपराधी होइ ।
कबहुँ न छाड़े जीव तैं, जनि दुःख पावै सोइ ॥ १ ॥
ठाकुर दीनदयाल है, सेवक सदा अचेत ।
गुण औगुण हरि ना गिणै, अंतर तासौं हेत ॥ २ ॥
अपराधी सुत सेवका, तुम हो दीन दयाल ।
हमतैं औगुण होत हैं, तुम पूरण प्रतिपाल ॥ ३ ॥
जब मोहन प्राणहि चलै, तब देही किहि काम ।
तुम जानत दादू का कहै, अब जनि छाड़ै राम ॥ ४ ॥
426. चौताल
विषम बार हरि अधार, करुणा बहु नामी ।
भक्ति भाव बेग आइ, भीड़ भंजन स्वामी ॥ टेक ॥
अंत अधार संत सुधार, सुन्दर सुखदाई ।
काम क्रोध काल ग्रसत,प्रकटो हरि आई ॥ १ ॥
पूरण प्रतिपाल कहिये, सुमिऱ्यां तैं आवै ।
भरम कर्म मोह लागे, काहे न छुड़ावै ॥ २ ॥
दीनदयालु होहु कृपालु, अंतरयामी कहिये ।
एक जीव अनेक लागे, कैसे दुख सहिये ॥ ३ ॥

  • 490 -

श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
पावन पीव चरण शरण,युग युग तैं तारे ।
अनाथ नाथ दादू के, हरि जी हमारे ॥ 4 ॥
427. विनती त्रिताल
साजनियां ! नेह न तोरी रे,
जे हम तोरैं महा अपराधी, तो तूँ जोरी रे ॥ टेक ॥
प्रेम बिना रस फीका लागै, मीठा मधुर न होई ।
सकल शिरोमणि सब तैं नीका, कड़वा लागै सोई ॥ 1 ॥
जब लग प्रीति प्रेम रस नाँहीं, तृषा बिना जल ऐसा ।
सब तैं सुन्दर एक अमीरस, होइ हलाहल जैसा ॥ 2 ॥
सुन्दरि सांई खरा पियारा, नेह नवा नित होवै ।
दादू मेरा तब मन मानै, सेज सदा सुख सोवै ॥ 3 ॥
428. कर्ता कीर्ति । त्रिताल
काइमां कीर्ति करूंली रे, तूँ मोटो दातार ।
सब तैं सिरजीला साहिबजी, तूँ मोटो कर्तार ॥ टेक ॥
चौदह भुवन भानै घड़ै, घड़त न लागै बार ।
थापै उथपै तूँ धणी, धनि धनि सिरजनहार ॥ 1 ॥
धरती अंबर तैं धन्या, पाणी पवन अपार ।
चंद सूर दीपक रचया, रैणि दिवस विस्तार ॥ 2 ॥
ब्रह्मा शंकर तैं किया, विष्णु दिया अवतार ।
सुर नर साधू सिरजिया, कर ले जीव विचार ॥ 3 ॥
आप निरंजन ह्वै रह्या, काइमां कौतिकहार ।
दादू निर्गुण गुण कहै, जाऊँली हौं बलिहार ॥ 4 ॥
429. उपदेश चेतावनी । प्रति ताल
जियरा! राम भजन कर लीजे ।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
साहिब लेखा माँगेगा रे, उत्तर कैसे दीजे ॥ टेक ॥
आगे जाइ पछतावन लागो, पल पल यहु तन छीजे ।
तातैं जिय समझाइ कहूँ रे, सुकृत अब तैं कीजे ॥ 1 ॥
राम जपत जम काल न लागे, संग रहै जन जीजे ।
दादू दास भजन कर लीजे, हरि जी की रास रमीजे ॥ 2 ॥
५30. (गुजराती) काल चेतावनी। प्रति ताल
काल काया गढ़ भेलसी, छीजे दशों दुवारो रे ।
देखतड़ां ते लूटिये, होसी हाहाकारो रे ॥ टेक ॥
नाइक नगर नें मेल्हसी, एकलड़ो ते जाये रे ।
संग न साथी कोइ न आसी, तहँ को जाणे किम थाये रे ॥ 1 ॥
सत जत साधो माहरा भाईड़ा, कांई सुकृत लीजे सारो रे ।
मारग विषम चालिबो, कांई लीजे प्राण अधारो रे ॥ 2 ॥
जिमि नीर निवाणा ठाहरे, तिमि साजी बांधो पालो रे ।
समर्थ सोई सेविये, तो काया न लागे कालो रे ॥ 3 ॥
दादू मन घर आणिये, तो निहचल थिर थाये रे ।
प्राणी नें पूरो मिलै, तो काया न मेल्ही जाये रे ॥ 4 ॥
५31. भयभीत भयानक । दीपचन्दी
डरिये रे डरिये, परमेश्वर तैं डरिये रे ।
लेखा लेवै, भर भर देवै, ताथैं बुरा न करिये रे, डरिये ॥ टेक ॥
सांचा लीजी, सांचा दीजी, सांचा सौदा कीजी रे ।
सांचा राखी, झूठा नाखी, विष ना पीजी रे ॥ 1 ॥
निर्मल गहिये, निर्मल रहिये, निर्मल कहिये रे ।
निर्मल लीजी, निर्मल दीजी, अनत न बहिये रे ॥ 2 ॥
साहि पठाया, बनिजन आया, जनि डहकावै रे ।

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
झूठ न भावै, फेरि पठावै, कीया पावै रे ॥ ३ ॥
पंथ दुहेला, जाइ अकेला, भार न लीजी रे ।
दादू मेला, होइ सुहेला, सो कुछ कीजी रे ॥ ४ ॥
५३२. दीप चन्दी
डरिये रे डरिये, देख देख पग धरिये ।
तारे तरिये, मारे मरिये, तातैं गर्व न करिये रे, डरिये ॥ टेक ॥
देवै लेवै, समर्थ दाता, सब कुछ छाजै रे ।
तारै मारै, गर्व निवारै, बैठा गाजै रे ॥ १ ॥
राखैं रहिये, बाहैं बहिये, अनत न लहिये रे ।
भानै घड़ै, संवारै आपै, ऐसा कहिये रे ॥ २ ॥
निकट बुलावै, दूर पठावै, सब बन आवै रे ।
पाके काचे, काचे पाके, ज्यूं मन भावै रे ॥ ३ ॥
पावक पाणी, पाणी पावक, कर दिखलावै रे ।
लोहा कंचन, कंचन लोहा, कहि समझावै रे ॥ ४ ॥
शशहर सूर, सूर तैं शशहर, परगट खेलै रे ।
धरती अंबर, अंबर धरती, दादू मेलै रे ॥ ५ ॥
५३३. हित उपदेश। चौताल
मनसा मन शब्द सुरति, पाँचों थिर कीजे ।
एक अंग सदा संग, सहजैं रस पीजे ॥ टेक ॥
सकल रहित मूल गहित, आपा नहिं जानें ।
अन्तर गति निर्मल रति, ऐकै मन मानैं ॥ १ ॥
हिरदै सुधि विमल बुधि, पूरण परकासै ।
रसना निज नाम निरख, अन्तर गति वासै ॥ २ ॥
आत्म मति पूरण गति, प्रेम भगति राता ।

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