सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 478, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
जामण मरण जाइ, भव भाजै, अवरण के घर वरण समाइ ।
दादू जाय मिलै जगजीवन, तब यहु आवागमन विलाइ ॥ 4 ॥
405. एक ताल
जीवन मूरी मेरे आतम राम, भाग बड़े पायो निज ठाम ॥ टेक ॥
शब्द अनाहद उपजै जहाँ, सुषमन रंग लगावै तहाँ ।
तहँ रंग लागे निर्मल होइ, ये तत उपजे जानै सोइ ॥ 1 ॥
सरवर तहाँ हंसा रहे, कर स्नान सबै सुख लहै ।
सुखदाई को नैनहुँ जोइ, त्यों त्यों मन अति आनन्द होइ ॥ 2 ॥
सो हंसा शरणागति जाइ, सुन्दरि तहाँ पखाले पाइ ।
पीवै अमृत नीझर नीर, बैठे तहाँ जगत गुरु पीर ॥ 3 ॥
तहँ भाव प्रेम की पूजा होइ, जा पर किरपा जानै सोइ ।
कृपा करि हरि देइ उमंग, तहँ जन पायो निर्भय संग ॥ 4 ॥
तब हंसा मन आनंद होइ, वस्तु अगोचर लखै रे सोइ ।
जा को हरि लखावै आप, ताहि न लिपैं पुन्य न पाप ॥ 5 ॥
तहँ अनहद बाजै अद्भुत खेल, दीपक जलै बाती बिन तेल ।
अखंड ज्योति तहँ भयो प्रकास, फाग बसंत ज्यों बारह मास ॥ 6 ॥
त्रय स्थान निरंतर निरधार, तहँ प्रभु बैठे समर्थ सार ।
नैनहुँ निरखूं तो सुख होइ, ताहि पुरुष को लखै न कोइ ॥ 7 ॥
ऐसा है हरि दीनदयाल, सेवक की जानें प्रतिपाल ।
चलु हंसा तहँ चरण समान, तहँ दादू पहुँचे परिवान ॥ 8 ॥
406. आत्म परमात्म रास । एकताल
घट घट गोपी घट घट कान्ह, घट घट राम अमर अस्थान ॥ टेक ॥
गंगा जमना अंतर-वेद, सरस्वती नीर बहै प्रस्वेद ॥ 1 ॥
कुंज केलि तहं परम विसाल, सब संगी मिल खेलैं रास ॥ 2 ॥
- 478 -