सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 474, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग भैरूं 25
ऐसो राजा सोई आहि, चौदह भुवन में रह्यो समाहि ।
दादू ताकी सेवा करै, जिन यहु रचिले अधर धरै ॥ 8 ॥
३9२. जीवित मृतक । एकताल
जब यहु मैं मैं मेरी जाइ, तब देखत वेग मिलै राम राइ ॥ टेक ॥
मैं मैं मेरी तब लग दूर, मैं मैं मेटि मिलै भरपूर ॥ 1 ॥
मैं मैं मेरी तब लग नांहि, मैं मैं मेटि मिलै मन माँहि ॥ 2 ॥
मैं मैं मेरी न पावै कोइ, मैं मैं मेटि मिलै जन सोइ ॥ 3 ॥
दादू मैं मैं मेरी मेटि, तब तूँ जान राम सौं भेटि ॥ 4 ॥
३9३. ज्ञान प्रलय । मदन ताल
नाँहीं रे हम नाँहीं रे, सत्यराम सब माँहीं रे ॥ टेक ॥
नाँहीं धरणि अकाशा रे, नाँहीं पवन प्रकाशा रे।
नाँहीं रवि शशि तारा रे, नहीं पावक प्रजारा रे ॥ 1 ॥
नाँहीं पाँच पसारा रे, नाँहीं सब संसारा रे।
नहीं काया जीव हमारा रे, नहीं बाजी कौतिकहारा रे ॥ 2 ॥
नाँहीं तरवर छाया रे, नहीं पंखी नहीं माया रे।
नाँहीं गिरिवर वासा रे, नाँहीं समंद निवासा रे ॥ 3 ॥
नाँहीं जल थल खंडा रे, नाँहीं सब ब्रह्मांडा रे।
नाँहीं आदि अनंता रे, दादू राम रहंता रे ॥ 4 ॥
३94. मध्य मार्ग निष्पक्ष । षट्ताल
अलह कहो भावै राम कहो, डाल तजो सब मूल गहो ॥ टेक ॥
अलह राम कहि कर्म दहो, झूठे मारग कहा बहो ॥ 1 ॥
साधू संगति तो निबहो, आइ परै सो शीश सहो ॥ 2 ॥
काया कमल दिल लाइ रहो, अलख अलह दीदार लहो ॥ 3 ॥
- 474 -