सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
झूठ न भावै, फेरि पठावै, कीया पावै रे ॥ ३ ॥
पंथ दुहेला, जाइ अकेला, भार न लीजी रे ।
दादू मेला, होइ सुहेला, सो कुछ कीजी रे ॥ ४ ॥
५३२. दीप चन्दी
डरिये रे डरिये, देख देख पग धरिये ।
तारे तरिये, मारे मरिये, तातैं गर्व न करिये रे, डरिये ॥ टेक ॥
देवै लेवै, समर्थ दाता, सब कुछ छाजै रे ।
तारै मारै, गर्व निवारै, बैठा गाजै रे ॥ १ ॥
राखैं रहिये, बाहैं बहिये, अनत न लहिये रे ।
भानै घड़ै, संवारै आपै, ऐसा कहिये रे ॥ २ ॥
निकट बुलावै, दूर पठावै, सब बन आवै रे ।
पाके काचे, काचे पाके, ज्यूं मन भावै रे ॥ ३ ॥
पावक पाणी, पाणी पावक, कर दिखलावै रे ।
लोहा कंचन, कंचन लोहा, कहि समझावै रे ॥ ४ ॥
शशहर सूर, सूर तैं शशहर, परगट खेलै रे ।
धरती अंबर, अंबर धरती, दादू मेलै रे ॥ ५ ॥
५३३. हित उपदेश। चौताल
मनसा मन शब्द सुरति, पाँचों थिर कीजे ।
एक अंग सदा संग, सहजैं रस पीजे ॥ टेक ॥
सकल रहित मूल गहित, आपा नहिं जानें ।
अन्तर गति निर्मल रति, ऐकै मन मानैं ॥ १ ॥
हिरदै सुधि विमल बुधि, पूरण परकासै ।
रसना निज नाम निरख, अन्तर गति वासै ॥ २ ॥
आत्म मति पूरण गति, प्रेम भगति राता ।
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