सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
पावन पीव चरण शरण,युग युग तैं तारे ।
अनाथ नाथ दादू के, हरि जी हमारे ॥ 4 ॥
427. विनती त्रिताल
साजनियां ! नेह न तोरी रे,
जे हम तोरैं महा अपराधी, तो तूँ जोरी रे ॥ टेक ॥
प्रेम बिना रस फीका लागै, मीठा मधुर न होई ।
सकल शिरोमणि सब तैं नीका, कड़वा लागै सोई ॥ 1 ॥
जब लग प्रीति प्रेम रस नाँहीं, तृषा बिना जल ऐसा ।
सब तैं सुन्दर एक अमीरस, होइ हलाहल जैसा ॥ 2 ॥
सुन्दरि सांई खरा पियारा, नेह नवा नित होवै ।
दादू मेरा तब मन मानै, सेज सदा सुख सोवै ॥ 3 ॥
428. कर्ता कीर्ति । त्रिताल
काइमां कीर्ति करूंली रे, तूँ मोटो दातार ।
सब तैं सिरजीला साहिबजी, तूँ मोटो कर्तार ॥ टेक ॥
चौदह भुवन भानै घड़ै, घड़त न लागै बार ।
थापै उथपै तूँ धणी, धनि धनि सिरजनहार ॥ 1 ॥
धरती अंबर तैं धन्या, पाणी पवन अपार ।
चंद सूर दीपक रचया, रैणि दिवस विस्तार ॥ 2 ॥
ब्रह्मा शंकर तैं किया, विष्णु दिया अवतार ।
सुर नर साधू सिरजिया, कर ले जीव विचार ॥ 3 ॥
आप निरंजन ह्वै रह्या, काइमां कौतिकहार ।
दादू निर्गुण गुण कहै, जाऊँली हौं बलिहार ॥ 4 ॥
429. उपदेश चेतावनी । प्रति ताल
जियरा! राम भजन कर लीजे ।
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