सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 486, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
बलिहारी उस रंग की, जन दादू देख अनूपो रे ॥ 4 ॥
415. धीमा ताल
लाग रह्यो मन राम सौं, अब अनतैं नहिं जाये रे।
अचला सौं थिर है रह्यो, सकै न चित्त डुलाये रे ॥ टेक ॥
ज्यों फुर्निंग चंदन रहै, परिमल रहै लुभाये रे।
त्यूँ मन मेरा राम सौं, अब की बेर अघाये रे ॥ 1 ॥
भँवर न छाड़ै बास को, कँवल हि रह्यो बँधाये रे।
त्यूं मन मेरा राम सौं, वेध रह्यो चित्त लाये रे ॥ 2 ॥
जल बिन मीन न जीवई, विछुरत ही मर जाये रे।
त्यों मन मेरा राम सौं, ऐसी प्रीति बनाये रे ॥ 3 ॥
ज्यूं चातक जल को रटै, पीव पीव करत बिहाये रे।
त्यों मन मेरा राम सौं, जन दादू हेत लगाये रे ॥ 4 ॥
416. विनती । वीर विक्रम ताल
मनमोहन हो !
कठिन विरह की पीर, सुन्दर दरस दिखाइये ॥ टेक ॥
सुनहु न दीन दयाल, तव मुख बैन सुनाइये ॥ 1 ॥
करुणामय कृपाल, सकल शिरोमणि आइये ॥ 2 ॥
मम जीवन प्राण अधार, अविनाशी उर लाइये ॥ 3 ॥
इब हरि दरसन देहु, दादू प्रेम बढ़ाइये ॥ 4 ॥
417. वीर विक्रम ताल
कतहूँ रहे हो विदेश, हरि नहिं आये हो।
जन्म सिरानों जाइ, पीव नहिं पाये हो ॥ टेक ॥
विपति हमारी जाइ, हरि सौं को कहे हो।
- 486 -