सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग धना श्री 27
राम बिना छूटै नहीं, कीजै बहुत उपाइ ।
कोटि किया सुलझै नहीं, अधिक अलूझत जाइ ॥ ३ ॥
दीन दुखी तुम देखताँ, भौ दुख भंजन राम ।
दादू कहै कर हाथ दे हो, तुम सब पूरण काम ॥ ४ ॥
425. करुणा विनती । त्रिताल
जनि छाड़ै राम जनि छाड़ै, हमहिं विसार जनि छाड़ै ।
जीव जात न लागै बार, जनि छाड़ै ॥ टेक ॥
माता क्यों बालक तजै, सुत अपराधी होइ ।
कबहुँ न छाड़े जीव तैं, जनि दुःख पावै सोइ ॥ १ ॥
ठाकुर दीनदयाल है, सेवक सदा अचेत ।
गुण औगुण हरि ना गिणै, अंतर तासौं हेत ॥ २ ॥
अपराधी सुत सेवका, तुम हो दीन दयाल ।
हमतैं औगुण होत हैं, तुम पूरण प्रतिपाल ॥ ३ ॥
जब मोहन प्राणहि चलै, तब देही किहि काम ।
तुम जानत दादू का कहै, अब जनि छाड़ै राम ॥ ४ ॥
426. चौताल
विषम बार हरि अधार, करुणा बहु नामी ।
भक्ति भाव बेग आइ, भीड़ भंजन स्वामी ॥ टेक ॥
अंत अधार संत सुधार, सुन्दर सुखदाई ।
काम क्रोध काल ग्रसत,प्रकटो हरि आई ॥ १ ॥
पूरण प्रतिपाल कहिये, सुमिऱ्यां तैं आवै ।
भरम कर्म मोह लागे, काहे न छुड़ावै ॥ २ ॥
दीनदयालु होहु कृपालु, अंतरयामी कहिये ।
एक जीव अनेक लागे, कैसे दुख सहिये ॥ ३ ॥
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