सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 477

श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25


दुविधा दुर्मति दूरि गँवाई, राम रमत सांची मन आई ॥ २ ॥
नीच ऊँच मध्यम को नांही, देखूं राम सबन के मांही ॥ ३ ॥
दादू सांच सबन में सोई, पैंड पकर जन निर्भय होई ॥ ४ ॥

५०२. हित उपदेश। खेमटा ताल
हाजिरां हजूर सांई, है हरि नेड़ा दूर नांही ॥ टेक ॥
मनी मेट महल में पावै, काहे खोजन दूरि जावै ॥ १ ॥
हिर्स न होइ, गुस्सा सब खाइ, तातैं संइयां दूर न जाइ ॥ २ ॥
दुई दूर दरोग न होइ, मालिक मन में देखै सोइ ॥ ३ ॥
अरि ये पाँच शोध सब मारै, तब दादू देखै निकटि विचारै ॥ ४ ॥

५०३. खेमटा ताल
राम रमत है देखे न कोइ, जो देखे सो पावन होइ ॥ टेक ॥
बाहिर भीतर नेड़ा न दूर, स्वामी सकल रह्या भरपूर ॥ १ ॥
जहां देखूं तहँ दूसर नांहि, सब घट राम समाना मांहि ॥ २ ॥
जहाँ जाऊँ तहँ सोई साथ, पूर रह्या हरि त्रिभुवन नाथ ॥ ३ ॥
दादू हरि देखे सुख होहि, निशदिन निरखन दीजे मोहि ॥ ४ ॥

५०४. अध्यात्म। एकताल
मन पवन ले उनमन रहै, अगम निगम मूल सो लहै ॥ टेक ॥
पाँच वायु जे सहज समावै, शशिहर के घर आणै सूर।
शीतल सदा मिलै सुखदाई, अनहद शब्द बजावै तूर ॥ १ ॥
बंकनालि सदा रस पीवै, तब यहु मनवा कहीं न जाइ।
विकसै कमल प्रेम जब उपजै, ब्रह्म जीव की करै सहाइ ॥ २ ॥
बैस गुफा में ज्योति विचारै, तब तेहिं सूझै त्रिभुवन राइ।
अंतर आप मिलै अविनाशी, पद आनन्द काल नहिं खाइ ॥ ३ ॥

  • 477 -