सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
अथ राग हुसेनी बंगाल 17
(गायन समय पहर दिन चढ़े, चंद्रोदय ग्रन्थ के मतानुसार)
२४9. (फारसी) अनन्यता । त्रिताल
है दाना है दाना, दिलदार मेरे कान्हा।
तूँ ही मेरे जान जिगर, यार मेरे खाना ॥ टेक॥
तूँ ही मेरे मादर पिदर, आलम बेगाना।
साहिब शिरताज मेरे, तूँ ही सुलताना ॥ 1 ॥
दोस्त दिल तूँ ही मेरे, किसका खिल खाना।
नूर चश्म जिंद मेरे, तूँ ही रहमाना ॥ 2 ॥
एकै असनाव मेरे, तूँ ही हम जाना।
जानिबा अजीज मेरे, खूब खजाना ॥ 3 ॥
नेक नजर मेहर मीरां, बंदा मैं तेरा।
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श्री दादूवाणी-राग हुसैनी बंगाल 17
दादू दरबार तेरे, खूब साहिब मेरा ॥ 4 ॥
२१०. विनय । त्रिताल
तूँ घर आव सुलक्षण पीव ।
हिक तिल मुख दिखलावहु तेरा, क्या तरसावै जीव ॥ टेक ॥
निशदिन तेरा पंथ निहारूं, तूँ घर मेरे आव ।
हिरदा भीतर हेत सौं रे वाल्हा, तेरा मुख दिखलाव ॥ 1 ॥
वारी फेरी बलि गई रे, शोभित सोइ कपोल ।
दादू ऊपरि दया करीनें, सुनाइ सुहावे बोल ॥ 2 ॥
इति राग हुसेनी बंगाल सम्पूर्णः ॥ 17 ॥ पद 2 ॥
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राग नटनारायण
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अथ राग नट नारायण १४
(गायन समय रात्रि 9 से 12) 291. हित उपदेश । गज ताल
ताको काहे न प्राण संभालै ।
कोटि अपराध कल्प के लागे, मांहि महूरत टालै ॥ टेक ॥
अनेक जन्म के बन्धन बाढ़े, बिन पावक फँध जालै ।
ऐसो है मन नाम हरी को, कबहुँ दुःख न सालै ॥
चिंतामणि जुगति सौं राखै, ज्यूं जननी सुत पालै ।
दादू देखु दया करै ऐसी, जन को जाल न रालै ॥
292. विरह । जय मंगल ताल
गोविन्द कबहुँ मिलै पीव मेरा ।
चरण-कमल क्योंहीं कर देखूं, राखूं नैनहुँ नेरा ॥ टेक ॥
निरखण का मोहि चाव घणेरा, कब मुख देखूं तेरा।
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श्री दादूवाणी-राग नट नारायण 18
प्राण मिलन को भई उदासी, मिल तूँ मीत सवेरा ॥ 1 ॥
व्याकुल तातैं भई तन देही, सिर पर जम का हेरा ।
दादू रे जन राम मिलन को, तपहि तन बहुतेरा ॥ 2 ॥
293. राज मृगांक ताल
कब देखूं नैनहुँ रेख रति, प्राण मिलन को भई मति ।
हरि सौं खेलूं हरि गति,कब मिल हैं मोहि प्राणपति ॥ टेक ॥
बल कीती क्यों देखूंगी रे, मुझ मांही अति बात अनेरी ।
सुन साहिब इक विनती मेरी, जनम-जनम हूँ दासी तेरी ॥ 1 ॥
कहै दादू सो सुनसी सांई, हौं अबला बल मुझ में नांही ।
करम करी घर मेरे आई, तो शोभा पीव तेरे तांई ॥ 2 ॥
294. राज मृगांक ताल (बसंत में)
नीके मोहन सौं प्रीति लाई ।
तन मन प्राण देत बजाई, रंग रस के बनाई ॥ टेक ॥
ये ही जीयरे वे ही पीवरे, छोड्यो न जाई, माई ।
बाण भेद के देत लगाई, देखत ही मुरझाई ॥ 1 ॥
निर्मल नेह पिया सौं लागो, रती न राखी काई ।
दादू रे तिल में तन जावे, संग न छाडूं , माई ॥ 2 ॥
295. परमेश्वर महिमा । राज विद्याधर ताल
तुम बिन ऐसैं कौन करै !
गरीब निवाज गुसांई मेरो,माथै मुकुट धरै ॥ टेक ॥
नीच ऊँच ले करै गुसांई, टार्यो हूँ न टरै ।
हस्त कमल की छाया राखै, काहू तैं न डरै ॥ 1 ॥
जाकी छोत जगत को लागै, तापर तूँ हीं ढरै ।
अमर आप ले करे गुसांई, मार्यो हूँ न मरै ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग नट नारायण 18
नामदेव कबीर जुलाहो, जन रैदास तिरै ।
दादू बेगि बार नहीं लागै, हरि सौं सबै सरै ॥ ३ ॥
२१६. मंगलाचरण । राज विद्याधर ताल
नमो नमो हरि ! नमो नमो ।
ताहि गुसाँई नमो नमो, अकल निरंजन नमो नमो ।
सकल वियापी जिहिं जग कीन्हा, नारायण निज नमो नमो ॥ टेक ॥
जिन सिरजे जल शीश चरण कर, अविगत जीव दियो ।
श्रवण सँवारि नैन रसना मुख, ऐसो चित्र कियो ॥ १ ॥
आप उपाइ किये जगजीवन, सुर नर शंकर साजे ।
पीर पैगम्बर सिद्ध अरु साधक, अपने नाम निवाजे ॥ २ ॥
धरती अम्बर चंद सूर जिन, पाणी पवन किये ।
भाणण घडन पलक में केते, सकल सँवार लिये ॥ ३ ॥
आप अखंडित खंडित नाहीं, सब सम पूर रहे ।
दादू दीन ताहि नइ वंदित, अगम अगाध कहे ॥ ४ ॥
२१७. हैरान । उत्सव ताल
हम तैं दूर रही गति तेरी ।
तुम हो तैसे तुम हीं जानो, कहा बपुरी मति मेरी ॥ टेक ॥
मन तैं अगम दृष्टि अगोचर, मनसा की गम नाँहीं ।
सुरति समाइ बुद्धि बल थाके, वचन न पहुँचे तांहीं ॥ १ ॥
जोग न ध्यान ज्ञान गम नांही, समझ समझ सब हारे ।
उनमनी रहत प्राण घट साधे, पार न गहत तुम्हारे ॥ २ ॥
खोज परे गति जाइ न जानी, अगह गहन कैसे आवे ।
दादू अविगत देहु दया कर, भाग बड़े सो पावे ॥ ३ ॥
इति राग नट नारायण सम्पूर्ण: ॥ १८ ॥ पद ७ ॥
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राग सोरठ
अथ राग सोरठ 19
(गायन समय रात्रि 9 से 12)
298. स्मरण । उत्सव ताल
कोली साल न छाड़ै रे, सब घावर काढै रे ।। टेक ।।
प्रेम पाण लगाई धागै, तत्त्व तेल निज दीया ।
एक मना इस आरंभ लागा, ज्ञान राछ भर लीया ।। 1 ।।
नाँव नली भर बुणकर लागा, अंतरगति रंग राता ।
ताणैं बाणें जीव जुलाहा, परम तत्व सौं माता ।। 2 ।।
सकल शिरोमणि बुनैन विचारा, सान्हाँ सूत न तोड़ै ।
सदा सचेत रहै ल्यौ लागा, ज्यौं टूटै त्यौं जोड़ै ।। 3 ।।
ऐसे तनि बुनि गहर गजीना, सांई के मन भावै ।
दादू कोली करता के संग, बहुरि न इहि जग आवै ।। 4 ।।
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
२९९. बिरही । ललित ताल
विरहणी वपु न सँभारै ।
निशदिन तलफै राम के कारण, अंतर एक विचारै ॥ टेक ॥
आतुर भई मिलन के कारण, कहि कहि राम पुकारै ।
सास उसास निमिष नहिं विसरै, जित तित पंथ निहारै ॥ 1 ॥
फिरै उदास चहुँ दिशि चितवत, नैन नीर भर आवै ।
राम वियोग विरह की जारी, और न कोई भावै ॥ 2 ॥
व्याकुल भई शरीर न समझै, विषम बाण हरि मारे ।
दादू दर्शन बिन क्यों जीवै, राम सनेही हमारे ॥ 3 ॥
३००. मन उपदेश चेतावनी । धीमा ताल
मन रे, राम रटत क्यों रहिये !
यहु तत बार बार क्यों न कहिये ॥ टेक ॥
जब लग जिह्वा वाणी, तो लौं जपिले सारंगपाणी ।
जब पवना चल जावे, तब प्राणी पछतावे ॥ 1 ॥
जब लग श्रवण सुणीजे, तो लौं साध शब्द सुण लीजे ।
श्रवणों सुरति जब जाई, ए तब का सुणि है भाई ॥ 2 ॥
जब लग नैन हुँ पेखे, तो लौं चरण-कमल क्यों न देखे ।
जब नैनहुं कछु न सूझे, ये सब मूरख क्या बूझे ॥ 3 ॥
जब लग तन मन नीका, तो लौं जपिले जीवन जीका ।
जब दादू जीव आवै, तब हरि के मन भावै ॥ 4 ॥
३०१. धीमा ताल
मन रे, तेरा कौन गँवारा, जपि जीवन प्राण आधारा ॥ टेक ॥
रे मात पिता कुल जाती, धन जौबन सजन सगाती ।
रे गृह दारा सुत भाई, हरि बिन सब झूठा है जाई ॥ 1 ॥
रे तूं अंत अकेला जावै, काहू के संग न आवै ।
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
रे तूँ ना कर मेरी मेरा, हरि राम बिना को तेरा ॥ 2 ॥
रे तूँ चेत न देखे अंधा, यहु माया मोह सब धंधा ।
रे काल मीच सिर जागे, हरि सुमिरण काहे न लागे ॥ 3 ॥
यहु औसर बहुरि न आवै, फिर मनिषा जन्म न पावै ।
अब दादू ढ़ील न कीजे, हरि राम भजन कर लीजे ॥ 4 ॥
३०२. प्रतिपाल
मन रे, देखत जन्म गयो, तातैं काज न कोई भयो रे ॥ टेक ॥
मन इंद्रिय ज्ञान विचारा, तातैं जन्म जुआ ज्यों हारा ।
मन झूठ साँच कर जानै, हरि साध कहैं, नहिं मानै ॥ 1 ॥
मन रे बादि गहे चतुराई, तातैं मनमुख बात बनाइ ।
मन आप आपको थापै, करता होइ बैठा आपै ॥ 2 ॥
मन स्वादी बहुत बनावै, मैं जान्या विषय बतावै ।
मन मांगै सोई दीजै, हमहिं राम दुखी क्यों कीजै ॥ 3 ॥
मन सबही छाड़ विकारा, प्राणी होइ गुणण तैं न्यारा ।
निर्गुण निज गहि रहिये, दादू साध कहैं, ते कहिये ॥ 4 ॥
३०३. प्रतिपाल
मन रे, अंतकाल दिन आया, तातैं यहु सब भया पराया ॥ टेक ॥
श्रवनों सुनै न नैनहुँ सूझै, रसना कह्या न जाई ।
शीश चरण कर कंपन लागे, सो दिन पहुँच्यो आई ॥ 1 ॥
काले धोले वरण पलटिया, तन मन का बल भागा ।
जौबन गया जरा चल आई, तब पछतावन लागा ॥ 2 ॥
आयु घटै घट छीजै काया, यहु तन भया पुराना ।
पाँचों थाके कह्या न मानैं, ताका मर्म न जाना ॥ 3 ॥
हंस बटाऊ प्राण पयाना, समझि देख मन मांहिं ।
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
दिन दिन काल ग्रासै जियरा, दादू चेतै नाँहीं ॥ 4 ॥
304. राज विद्याधर ताल
मन रे, तूँ देखै सो नाँहीं, है सो अगम अगोचर मांहीं ॥ टेक ॥
निशि अँधियारी कछू न सूझै, संशय सर्प दिखावा ।
ऐसे अंध जगत नहिं जानै, जीव जेवड़ी खावा ॥ 1 ॥
मृग जल देख तहाँ मन धावै, दिन दिन झूठी आशा ।
जहाँ जहाँ जाइ तहाँ जल नाँहीं, निश्चय मरै पियासा ॥ 2 ॥
भ्रम विलास बहुत विधि कीन्हा, ज्यों स्वप्नै सुख पावै ।
जागत झूठ तहाँ कुछ नाँहीं, फिर पीछे पछितावै ॥ 3 ॥
जब लग सूता तब लग देखै, जागत भ्रम विलाना ।
दादू अंत इहाँ कुछ नाँहीं, है सो सोध सयाना ॥ 4 ॥
305. उपदेश । त्रिताल
भाई रे, बाजीगर नट खेला, ऐसे आपै रहै अकेला ॥ टेक ॥
यहु बाजी खेल पसारा, सब मोहे कौतुकहारा ।
यहु बाजी खेलदिखावा, बाजीगर किनहुँ न पावा ॥ 1 ॥
इहि बाजी जगत भुलाना, बाजीगर किनहुँ न जाना ।
कुछ नांही सो पेखा, है सो किनहुँ न देखा ॥ 2 ॥
कुछ ऐसा चेटक कीन्हा, तन मन सब हर लीन्हा ।
बाजीगर भुरकी बाही, काहू पै लखी न जाही ॥ 3 ॥
बाजीगर परकासा, यहु बाजी झूठ तमासा ।
दादू पावा सोई, जो इहि बाजी लिप्त न होई ॥ 4 ॥
306. ज्ञान उपदेश । त्रिताल
भाई रे, ऐसा एक विचारा, यूं हरि गुरु कहै हमारा ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
जागत सूते, सोवत सूते, जब लग राम न जाना ।
जागत जागे, सोवत जागे, जब राम नाम मन माना ॥ 1 ॥
देखत अंधे, अंध भी अंधे, जब लग सत्य न सूझै ।
देखत देखे, अंध भी देखे, जब राम सनेही बूझै ॥ 2 ॥
बोलत गूंगे, गूंगे भी गूंगे, जब लग सत्य न चीन्हा ।
बोलत बोले, गूंगे भी बोले, जब राम नाम कह दीन्हा ॥ 3 ॥
जीवत मूये, मूये भी मूये, जब लग नहीं प्रकासा ।
जीवत जीये, मुये भी जीये, दादू राम निवासा ॥ 4 ॥
307. नाम महिमा । एक ताल
रामजी ! नाम बिना दुख भारी, तेरे साधुन कही विचारी ॥ टेक ॥
केई जोग ध्यान गह रहिया, केई कुल के मारग बहिया ।
केई सकल देव को ध्यावैं, केई रिधि सिधि चाहैं पावैं ॥ 1 ॥
केई वेद पुराणों माते, केई माया के संग राते ।
केई देश दिशंतर डोलैं, केई ज्ञानी ह्वै बहु बोलैं ॥ 2 ॥
केई काया कसैं अपारा, केई मरैं खड्ग की धारा ।
केई अनंत जीवन की आशा, केई करैं गुफा में वासा ॥ 3 ॥
आदि अंत जे जागे, सो तो राम नाम ल्यौ लागे ।
इब दादू इहै विचारा, हरि लागा प्राण हमारा ॥ 4 ॥
308. भ्रम विध्वंसन । एक ताल
साधो ! हरि सौं हेत हमारा, जिन यहु कीन्ह पसारा ॥ टेक ॥
जा कारण व्रत कीजे, तिल तिल यहु तन छीजे ।
सहजैं ही सो जाना, हरि जानत ही मन माना ॥ 1 ॥
जा कारण तप जइये, धूप सीत सिर सहिये ।
सहजैं ही सो आवा, हरि आवत ही सचु पावा ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
जा कारण बहु फिरिये, कर तीरथ भ्रमि भ्रमि मरिये ।
सहजैं ही सो चीन्हा, हरि चीन्ह सबै सुख लीन्हा ॥ 3 ॥
प्रेम भक्ति जिन जानी, सो काहे भरमै प्राणी ।
हरि सहजैं ही भल मानैं, तातैं दादू और न जानैं ॥ 4 ॥
३०९. परिचय विनती । वर्ण भिन्न ताल
राम जी जनि भरमावो हम को, तातैं करूं विनती तुमको ॥ टेक ॥
चरण तुम्हारे सब ही देखूं, तप तीरथ व्रत दाना ।
गंग जमुन पास पाइन के, तहाँ देहु अस्नाना ॥ 1 ॥
संग तुम्हारे सब ही लागे, योग यज्ञ जे कीजे ।
साधन सकल येही सब मेरे, संग आपनो दीजैं ॥ 2 ॥
पूजा पाती देवी देवल, सब देखूं तुम मांहिं ।
मोको ओट आपणी दीजे, चरण कवल की छांहीं ॥ 3 ॥
ये अरदास दास की सुनिये, दूर करो भ्रम मेरा ।
दादू तुम बिन और न जानै, राखो चरणों नेरा ॥ 4 ॥
३१०. उपास्य परिचय । वर्ण भिन्न ताल
सोई देव पूजूं, जे टांची नहिं घड़िया, गर्भवास नहीं औतरिया ॥ टेक ॥
बिन जल संजम सदा सोइ देवा, भाव भक्ति करूं हरि सेवा ॥ 1 ॥
पाती प्राण हरि देव चढ़ाऊँ, सहज समाधि प्रेम ल्यौ लाऊँ ॥ 2 ॥
इहि विधि सेवा सदा तहँ होई, अलख निरंजन लखै न कोई ॥ 3 ॥
ये पूजा मेरे मन मानै, जिहि विधि होइ सु दादू न जानै ॥ 4 ॥
३११. परिचय हैरान । खेमटा ताल
राम राइ ! मोको अचरज आवै, तेरा पार न कोई पावै ॥ टेक ॥
ब्रह्मादिक सनकादिक नारद, नेति नेति जे गावै ।
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
शरण तुम्हारी रहै निशवासर, तिनको तूँ न लखावै ॥ 1 ॥
शंकर शेष सबै सुर मुनिजन, तिनको तूँ न जनावै ।
तीन लोक रटैं रसना भर, तिनको तूँ न दिखावै ॥ 2 ॥
दीन लीन राम रंग राते, तिनको तूँ संग लावै ।
अपने अंग की युक्ति न जानै, सो मन तेरे भावै ॥ 3 ॥
सेवा संजम करें जप पूजा, शब्द न तिनको सुनावै ।
मैं अछोप हीन मति मेरी, दादू को दिखलावै ॥ 4 ॥
इति राग सोरठ सम्पूर्णः ॥ 19 ॥ पद 14 ॥
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अथ राग गुंड (गौंड) २०
(गायन समय वर्षा ऋतु में सब समय, संगीत प्रकाश के मतानुसार)
३12. भक्ति निष्काम । सुरफाख्ता ताल
दर्शन दे राम ! दर्शन दे, हौं तो तेरी मुक्ति न माँगूं रे ।। टेक ।।
सिद्धि न माँगूं, रिद्धि न माँगूं, तुम्ह ही माँगूं, गोविन्दा ।। 1 ।।
जोग न माँगूं, भोग न माँगूं, तुम्ह ही माँगूं, रामजी ।। 2 ।।
घर नहीं माँगूं, वन नहीं माँगूं, तुम्ह ही माँगूं, देवजी ।। 3 ।।
दादू तुम बिन और न माँगूं, दर्शन माँगूं देहुजी ।। 4 ।।
३1३. विरह विनती । सुरफाख्ता ताल
तूँ आपैं ही विचार, तुझ बिन क्यों रहूँ ?
मेरे और न दूजा कोइ, दुःख किसको कहूँ ।। टेक ।।
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20
मीत हमारा सोइ, आदैं जे पीया ।
मुझे मिलावै कोइ, वै जीवन जीया ॥ 1 ॥
तेरे नैन दिखाइ, जीऊँ जिस आस रे ।
सो धन जीवै क्यों, नहीं जिस पास रे ॥ 2 ॥
पिंजर मांहैं प्राण, तुझ बिन जाइसी ।
जन दादू माँगे मान, कब घर आइसी ॥ 3 ॥
३14. (गुजराती) सुरफाख्ता ताल
हौं जोइ रही रे बाट, तूँ घर आवनें ।
तारा दर्शन थी सुख होइ, ते तूँ ल्यावनें ॥ टेक ॥
चरण जोवा नें खांत, ते तूँ देखाड़नें ।
तुझ बिना जीव देइ, दुहेली कामिनी ॥ 1 ॥
नैणें निहारूं बाट, ऊभी चावनी ।
तूँ अंतर थी ऊरो आव, देही जावनी ॥ 2 ॥
तूँ दया करी घर आव, दासी गाँवनी ।
जन दादू राम संभाल, बैन सुहाँवनी ॥ 3 ॥
३15. झपताल
पीव देखे बिन क्यों रहूँ, जिय तलफै मेरा ।
सब सुख आनन्द पाइये, मुख देखूं तेरा ॥ टेक ॥
पीव बिन कैसा जीवना, मोहि चैन न आवै ।
निर्धन ज्यों धन पाइये, जब दरस दिखावै ॥ 1 ॥
तुम बिन क्यों धीरज धरूं, जो लौं तोहि न पाऊँ ।
सन्मुख ह्वै सुख दीजिये, बलिहारी जाऊँ ॥ 2 ॥
विरह वियोग न सह सकूँ, कायर घट काचा ।
पावन परस न पाइये, सुनि साहिब साँचा ॥ 3 ॥
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सुनिये मेरी विनती, इब दर्शन दीजे।
दादू देखन पावही, तैसैं कुछ कीजे ॥ 4 ॥
316. प्रीति अखंडित । दादरा
इहि विधि वेध्यो मोर मना, ज्यों लै भृंगी कीट तना ॥ टेक॥
चातक रटतैं रैन बिहाई, पिंड परै पै बान न जाई ॥ 1 ॥
मरै मीन बिसरै नहि पानी, प्राण तजे उन और न जानी ॥ 2 ॥
जलै शरीर न मोड़े अंगा, ज्योति न छाड़ै पड़ै पतंगा ॥ 3 ॥
दादू अब तै ऐसैं होहि, पिंड परै, नहीं छाडूं तोहि ॥ 4 ॥
317. विरह । त्रिताल
आओ राम दया कर मेरे, बार बार बलिहारी तेरे ॥ टेक॥
विरहनी आतुर पंथ निहारै, राम नाम कह पीव पुकारै ॥ 1 ॥
पंथी बूझै मारग जोवै, नैन नीर जल भर भर रोवै ॥ 2 ॥
निशदिन तलफै रहै उदास, आतम राम तुम्हारे पास ॥ 3 ॥
वपु विसरे तन की सुधि नांही, दादू विरहनी मृतक मांही ॥ 4 ॥
318. केवल विनती । रूपक ताल
निरंजन क्यों रहै, मौन गहे वैराग, केते जुग गये ॥ टेक॥
जागै जगपति राइ, हँस बोलै नहीं।
परगट घूंघट मांहि, पट खोलै नहीं ॥ 1 ॥
सदके करूं संसार, सब जग वारणै।
छाडूं सब परिवार, तेरे कारणै ॥ 2 ॥
वारूं पिंड पराण, पावों सिर धरूं।
ज्यों ज्यों भावै राम, सो सेवा करूं ॥ 3 ॥
दीनानाथ दयाल ! विलंब न कीजिये।
दादू बलि बलि जाय, सेज सुख दीजिये ॥ 4 ॥
319. निरंजन स्वरूप । त्रिताल
निरंजन यूं रहै, काहू लिप्त न होइ ।
जल थल थावर जंगमा, गुण नहीं लागै कोइ ॥ टेक ॥
धर अंबर लागै नहिं, नहिं लागै शशिहर सूर ।
पाणी पवन लागै नहीं, जहाँ तहाँ भरपूर ॥ 1 ॥
निश वासर लागै नहीं, नहिं लागै शीतल घाम ।
क्षुधा तृषा लागै नहीं, घट-घट आतम राम ॥ 2 ॥
माया मोह लागै नहीं, नहिं लागै काया जीव ।
काल कर्म लागै नहीं, प्रगट मेरा पीव ॥ 3 ॥
इकलस एकै नूर है, इकलस एकै तेज ।
इकलस एकै ज्योति है, दादू खेलै सेज ॥ 4 ॥
320. विनय । त्रिताल
जग जीवन प्राण आधार, वाचा पालना ।
हौं कहाँ पुकारूं जाइ, मेरे लालना ॥ टेक ॥
मेरे वेदन अंग अपार, सो दुख टालना ।
सागर यह निस्तार, गहरा अति घणा ॥ 1 ॥
अंतर है सो टाल, कीजै आपणा ।
मेरे तुम बिन और न कोइ, इहै विचारणा ॥ 2 ॥
तातैं करूं पुकार, यहु तन चालणा ।
दादू को दर्शन देहु, जाय दुख सालणा ॥ 3 ॥
321. मन की नीकी विनती । मल्लिका मोद ताल
मेरे तुम ही राखणहार, दूजा को नहीं ।
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20
ये चंचल चहुँ दिशि जाय, काल तहीं तहीं ॥ टेक ॥
मैं केते किये उपाय, निश्चल ना रहै ।
जहाँ बरजूं तहँ जाय, मद मातो बहै ॥ 1 ॥
जहाँ जाणा तहँ जाय, तुम्ह तैं ना डरै ।
तासौं कहा बसाइ, भावै त्यों करै ॥ 2 ॥
सकल पुकारैं साध, मैं केता कह्या ।
गुरु अंकुश मानै नाहिं, निर्भय है रह्या ॥ 3 ॥
तुम बिन और न कोइ, इस मन को गहै ।
तूँ राखै राखणहार, दादू तो रहै ॥ 4 ॥
३२२. संसार की नीकी विनती । दीपचन्दी ताल
निरंजन, कायर कंपै प्राणिया, देखि यहु दरिया ।
वार पार सूझै नहीं, मन मेरा डरिया ॥ टेक ॥
अति अथाह यह भौजला, आसंघ नहिं आवै ।
देख देख डरपै घणा, प्राणी दुख पावै ॥ 1 ॥
विष जल भरिया सागरा, सब थके सयाना ।
तुम बिन कहु कैसे तिरूं, मैं मूढ़ अयाना ॥ 2 ॥
आगे ही डरपै घणा, मेरी का कहिये ।
कर गहि काढो केशवा, पार तो लहिये ॥ 3 ॥
एक भरोसा तोर है, जे तुम होहु दयाला ।
दादू कहु कैसे तिरै ! तूँ तार गोपाला ॥ 4 ॥
३२३. समर्थ उपदेश । दादरा ताल
समर्थ मेरा सांइयां, सकल अघ जारै,
सुख दाता मेरे प्राण का, संकोच निवारै ॥ टेक ॥
त्रिविध ताप तन की हरै, चौथे जन राखै ।
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20
आप समागम सेवका, साधू यूं भाखै ॥ 1 ॥
आप करै प्रतिपालना, दारुण दुख टारै।
इच्छा जन की पूरवै, सब कारज सारै ॥ 2 ॥
कर्म कोटि भय भंजना, सुख मंडन सोई।
मन मनोरथ पूरणा, ऐसा और न कोई ॥ 3 ॥
ऐसा और न देखिहौं, सब पूरण कामा।
दादू साधु संगी किये, उन आतम रामा ॥ 4 ॥
324. (गुजराती) मन स्थिरार्थ विनती । त्रिताल
तुम बिन राम कवन कलि मांही, विषिया थैं कोइ वारे रे।
मुनियर मोटा मनवैं बाह्या, येन्हा कौन मनोरथ मारे रे ॥ टेक ॥
छिन एकैं मनवो मर्कट माहरो, घर घरबार नचावे रे।
छिन एकैं मनवो चंचल माहरो, छिन एकैं घरमां आवे रे ॥ 1 ॥
छिन एकैं मनवो मीन अम्हारो, सचराचर मां धाये रे।
छिन एकैं मनवो उदमद मातो, स्वादैं लागो खाये रे ॥ 2 ॥
छिन एकैं मनवो ज्योति पतंगा, भ्रम भ्रम स्वादैं दाझे रे।
छिन एकैं मनवो लोभैं लागो, आपा पर में बाझे रे ॥ 3 ॥
छिन एकैं मनवो कुंजर माहरो, वन वन मांहिं भ्रमाड़े रे।
छिन एकैं मनवो कामी माहरो, विषिया रंग रमाड़े रे ॥ 4 ॥
छिन एकैं मनवो मिरग अम्हारो, नादैं मोह्यो जाये रे।
छिन एकैं मनवो माया रातो, छिन एकैं हमनें बाहे रे ॥ 5 ॥
छिन एकैं मनवो भँवर अम्हारो, बासैं कंवल बँधाणें रे।
छिन एकैं मनवो चहुँ दिशि जाये, मनवा नें कोई आणें रे ॥ 6 ॥
तुम बिन राखै कौन विधाता, मुनिवर साखी आणें रे।
दादू मृतक छिन में जीवे, मनवा चरित न जाणें रे ॥ 7 ॥
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20
325. बेखर्च व्यसनी । ब्रह्म ताल
करणी पोच, सोच सुख करई, लौह की नाव कैसे भौजल तिरई ॥ टेक ॥
दक्षिण जात पश्चिम कैसे आवै, नैन बिन भूल बाट कित पावै ॥ 1 ॥
विष वन बेलि, अमृत फल चाहै, खाइ हलाहल, अमर उमाहै ॥ 2 ॥
अग्नि गृह पैसि कर सुख क्यों सोवै, जलन लागी घणी, सीत क्यों होवै ॥ 3 ॥
पाप पाखंड कीये, पुण्य क्यों पाइये, कूप खन पड़िबा, गगन क्यों जाइये ॥ 4 ॥
कहै दादू मोहि अचरज भारी, हिरदै कपट क्यों मिलै मुरारी ॥ 5 ॥
326. परिचय प्राप्ति । खेमटा ताल
मेरा मन के मन सौं मन लागा, शब्द के शब्द सौं नाद बागा ॥ टेक ॥
श्रवण के श्रवण सुन सुख पाया, नैन के नैन सौं निरख राया ॥ 1 ॥
प्राण के प्राण सौं खेल प्राणी, मुख के मुख सौं बोल वाणी ॥ 2 ॥
जीव के जीव सौं रंग राता, चित्त के चित्त सौं प्रेम माता ॥ 3 ॥
शीश के शीश सौं शीश मेरा, देखि रे दादू वा भाग तेरा ॥ 4 ॥
327. मन को उपदेश । त्रिताल मल्हार में
मेरे शिखर चढ़ बोल मन मोरा, राम जल वर्षे शब्द सुण तोरा ॥ टेक ॥
आरत आतुर पीव पुकारै, सोवत जागत पंथ निहारै ॥ 1 ॥
निशवासर कह अमृत वाणी, राम नाम ल्यौ लाइ ले प्राणी ॥ 2 ॥
टेर मन भाई, जब लग जीवे, प्रीति कर गाढ़ी प्रेम रस पीवे ॥ 3 ॥
दादू अवसर जे जन जागे, राम घटा-जल वरषण लागे ॥ 4 ॥
328. वैराग्य उपदेश त्रिताल
नारी नेह न कीजिये, जे तुझ राम पियारा,
माया मोह न बंधिये, तजिये संसारा ॥ टेक ॥
विषिया रंग राचै नहीं, नहीं करै पसारा।
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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20
देह गेह परिवार में, सब तैं रहै नियारा ॥ 1 ॥
आपा पर उरझै नहीं, नाहीं मैं मेरा।
मनसा वाचा कर्मना, सांई सब तेरा ॥ 2 ॥
मन इन्द्रिय स्थिर करे, कतहूं नहिं डोले।
जग विकार सब परिहरे, मिथ्या नहिं बोले ॥ 3 ॥
रहे निरंतर राम सौं, अंतरगति राता।
गावे गुण गोविन्द का, दादू रस माता ॥ 4 ॥
329. आज्ञाकारी । झपताल
तूं राखै त्यों ही रहैं, तेई जन तेरा।
तुम्ह बिन और न जानहीं, सो सेवक नेरा ॥ टेक ॥
अम्बर आपै ही धन्या, अजहूँ उपकारी।
धरती धारी आप तैं, सबही सुखकारी ॥ 1 ॥
पवन पास सब के चलै, जैसे तुम कीन्हा।
पानी परकट देखिहूँ, सब सौं रहै भीना ॥ 2 ॥
चंद चिराकी चहुँ दिशा, सब शीतल जानै।
सूरज भी सेवा करै, जैसे भल मानै ॥ 3 ॥
ये निज सेवक तेरड़े, सब आज्ञाकारी।
मोको ऐसे कीजिये, दादू बलिहारी ॥ 4 ॥
330. निन्दक । झपताल
निदंक बाबा बीर हमारा, बिनही कौड़े बहै बिचारा ॥ टेक ॥
कर्म कोटि के कश्मल काटे, काज सँवारै बिन ही साटे ॥ 1 ॥
आपण डूबै और को तारे, ऐसा प्रीतम पार उतारे ॥ 2 ॥
जुग जुग जीवो निन्दक मोरा, राम देव तुम करो निहोरा ॥ 3 ॥
निदंक बपुरा पर उपकारी, दादू निंदा करै हमारी ॥ 4 ॥
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