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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 504 में से

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पृष्ठ 440

सुनिये मेरी विनती, इब दर्शन दीजे।
दादू देखन पावही, तैसैं कुछ कीजे ॥ 4 ॥
316. प्रीति अखंडित । दादरा
इहि विधि वेध्यो मोर मना, ज्यों लै भृंगी कीट तना ॥ टेक॥
चातक रटतैं रैन बिहाई, पिंड परै पै बान न जाई ॥ 1 ॥
मरै मीन बिसरै नहि पानी, प्राण तजे उन और न जानी ॥ 2 ॥
जलै शरीर न मोड़े अंगा, ज्योति न छाड़ै पड़ै पतंगा ॥ 3 ॥
दादू अब तै ऐसैं होहि, पिंड परै, नहीं छाडूं तोहि ॥ 4 ॥
317. विरह । त्रिताल
आओ राम दया कर मेरे, बार बार बलिहारी तेरे ॥ टेक॥
विरहनी आतुर पंथ निहारै, राम नाम कह पीव पुकारै ॥ 1 ॥
पंथी बूझै मारग जोवै, नैन नीर जल भर भर रोवै ॥ 2 ॥
निशदिन तलफै रहै उदास, आतम राम तुम्हारे पास ॥ 3 ॥
वपु विसरे तन की सुधि नांही, दादू विरहनी मृतक मांही ॥ 4 ॥
318. केवल विनती । रूपक ताल
निरंजन क्यों रहै, मौन गहे वैराग, केते जुग गये ॥ टेक॥
जागै जगपति राइ, हँस बोलै नहीं।
परगट घूंघट मांहि, पट खोलै नहीं ॥ 1 ॥
सदके करूं संसार, सब जग वारणै।
छाडूं सब परिवार, तेरे कारणै ॥ 2 ॥
वारूं पिंड पराण, पावों सिर धरूं।
ज्यों ज्यों भावै राम, सो सेवा करूं ॥ 3 ॥
दीनानाथ दयाल ! विलंब न कीजिये।