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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 504 में से

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पृष्ठ 432

श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
२९९. बिरही । ललित ताल
विरहणी वपु न सँभारै ।
निशदिन तलफै राम के कारण, अंतर एक विचारै ॥ टेक ॥
आतुर भई मिलन के कारण, कहि कहि राम पुकारै ।
सास उसास निमिष नहिं विसरै, जित तित पंथ निहारै ॥ 1 ॥
फिरै उदास चहुँ दिशि चितवत, नैन नीर भर आवै ।
राम वियोग विरह की जारी, और न कोई भावै ॥ 2 ॥
व्याकुल भई शरीर न समझै, विषम बाण हरि मारे ।
दादू दर्शन बिन क्यों जीवै, राम सनेही हमारे ॥ 3 ॥
३००. मन उपदेश चेतावनी । धीमा ताल
मन रे, राम रटत क्यों रहिये !
यहु तत बार बार क्यों न कहिये ॥ टेक ॥
जब लग जिह्वा वाणी, तो लौं जपिले सारंगपाणी ।
जब पवना चल जावे, तब प्राणी पछतावे ॥ 1 ॥
जब लग श्रवण सुणीजे, तो लौं साध शब्द सुण लीजे ।
श्रवणों सुरति जब जाई, ए तब का सुणि है भाई ॥ 2 ॥
जब लग नैन हुँ पेखे, तो लौं चरण-कमल क्यों न देखे ।
जब नैनहुं कछु न सूझे, ये सब मूरख क्या बूझे ॥ 3 ॥
जब लग तन मन नीका, तो लौं जपिले जीवन जीका ।
जब दादू जीव आवै, तब हरि के मन भावै ॥ 4 ॥
३०१. धीमा ताल
मन रे, तेरा कौन गँवारा, जपि जीवन प्राण आधारा ॥ टेक ॥
रे मात पिता कुल जाती, धन जौबन सजन सगाती ।
रे गृह दारा सुत भाई, हरि बिन सब झूठा है जाई ॥ 1 ॥
रे तूं अंत अकेला जावै, काहू के संग न आवै ।

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