सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20
ये चंचल चहुँ दिशि जाय, काल तहीं तहीं ॥ टेक ॥
मैं केते किये उपाय, निश्चल ना रहै ।
जहाँ बरजूं तहँ जाय, मद मातो बहै ॥ 1 ॥
जहाँ जाणा तहँ जाय, तुम्ह तैं ना डरै ।
तासौं कहा बसाइ, भावै त्यों करै ॥ 2 ॥
सकल पुकारैं साध, मैं केता कह्या ।
गुरु अंकुश मानै नाहिं, निर्भय है रह्या ॥ 3 ॥
तुम बिन और न कोइ, इस मन को गहै ।
तूँ राखै राखणहार, दादू तो रहै ॥ 4 ॥
३२२. संसार की नीकी विनती । दीपचन्दी ताल
निरंजन, कायर कंपै प्राणिया, देखि यहु दरिया ।
वार पार सूझै नहीं, मन मेरा डरिया ॥ टेक ॥
अति अथाह यह भौजला, आसंघ नहिं आवै ।
देख देख डरपै घणा, प्राणी दुख पावै ॥ 1 ॥
विष जल भरिया सागरा, सब थके सयाना ।
तुम बिन कहु कैसे तिरूं, मैं मूढ़ अयाना ॥ 2 ॥
आगे ही डरपै घणा, मेरी का कहिये ।
कर गहि काढो केशवा, पार तो लहिये ॥ 3 ॥
एक भरोसा तोर है, जे तुम होहु दयाला ।
दादू कहु कैसे तिरै ! तूँ तार गोपाला ॥ 4 ॥
३२३. समर्थ उपदेश । दादरा ताल
समर्थ मेरा सांइयां, सकल अघ जारै,
सुख दाता मेरे प्राण का, संकोच निवारै ॥ टेक ॥
त्रिविध ताप तन की हरै, चौथे जन राखै ।
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