सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
दिन दिन काल ग्रासै जियरा, दादू चेतै नाँहीं ॥ 4 ॥
304. राज विद्याधर ताल
मन रे, तूँ देखै सो नाँहीं, है सो अगम अगोचर मांहीं ॥ टेक ॥
निशि अँधियारी कछू न सूझै, संशय सर्प दिखावा ।
ऐसे अंध जगत नहिं जानै, जीव जेवड़ी खावा ॥ 1 ॥
मृग जल देख तहाँ मन धावै, दिन दिन झूठी आशा ।
जहाँ जहाँ जाइ तहाँ जल नाँहीं, निश्चय मरै पियासा ॥ 2 ॥
भ्रम विलास बहुत विधि कीन्हा, ज्यों स्वप्नै सुख पावै ।
जागत झूठ तहाँ कुछ नाँहीं, फिर पीछे पछितावै ॥ 3 ॥
जब लग सूता तब लग देखै, जागत भ्रम विलाना ।
दादू अंत इहाँ कुछ नाँहीं, है सो सोध सयाना ॥ 4 ॥
305. उपदेश । त्रिताल
भाई रे, बाजीगर नट खेला, ऐसे आपै रहै अकेला ॥ टेक ॥
यहु बाजी खेल पसारा, सब मोहे कौतुकहारा ।
यहु बाजी खेलदिखावा, बाजीगर किनहुँ न पावा ॥ 1 ॥
इहि बाजी जगत भुलाना, बाजीगर किनहुँ न जाना ।
कुछ नांही सो पेखा, है सो किनहुँ न देखा ॥ 2 ॥
कुछ ऐसा चेटक कीन्हा, तन मन सब हर लीन्हा ।
बाजीगर भुरकी बाही, काहू पै लखी न जाही ॥ 3 ॥
बाजीगर परकासा, यहु बाजी झूठ तमासा ।
दादू पावा सोई, जो इहि बाजी लिप्त न होई ॥ 4 ॥
306. ज्ञान उपदेश । त्रिताल
भाई रे, ऐसा एक विचारा, यूं हरि गुरु कहै हमारा ॥ टेक ॥
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