सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदादू बलि बलि जाय, सेज सुख दीजिये ॥ 4 ॥
319. निरंजन स्वरूप । त्रिताल
निरंजन यूं रहै, काहू लिप्त न होइ ।
जल थल थावर जंगमा, गुण नहीं लागै कोइ ॥ टेक ॥
धर अंबर लागै नहिं, नहिं लागै शशिहर सूर ।
पाणी पवन लागै नहीं, जहाँ तहाँ भरपूर ॥ 1 ॥
निश वासर लागै नहीं, नहिं लागै शीतल घाम ।
क्षुधा तृषा लागै नहीं, घट-घट आतम राम ॥ 2 ॥
माया मोह लागै नहीं, नहिं लागै काया जीव ।
काल कर्म लागै नहीं, प्रगट मेरा पीव ॥ 3 ॥
इकलस एकै नूर है, इकलस एकै तेज ।
इकलस एकै ज्योति है, दादू खेलै सेज ॥ 4 ॥
320. विनय । त्रिताल
जग जीवन प्राण आधार, वाचा पालना ।
हौं कहाँ पुकारूं जाइ, मेरे लालना ॥ टेक ॥
मेरे वेदन अंग अपार, सो दुख टालना ।
सागर यह निस्तार, गहरा अति घणा ॥ 1 ॥
अंतर है सो टाल, कीजै आपणा ।
मेरे तुम बिन और न कोइ, इहै विचारणा ॥ 2 ॥
तातैं करूं पुकार, यहु तन चालणा ।
दादू को दर्शन देहु, जाय दुख सालणा ॥ 3 ॥
321. मन की नीकी विनती । मल्लिका मोद ताल
मेरे तुम ही राखणहार, दूजा को नहीं ।
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