सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग नट नारायण 18
प्राण मिलन को भई उदासी, मिल तूँ मीत सवेरा ॥ 1 ॥
व्याकुल तातैं भई तन देही, सिर पर जम का हेरा ।
दादू रे जन राम मिलन को, तपहि तन बहुतेरा ॥ 2 ॥
293. राज मृगांक ताल
कब देखूं नैनहुँ रेख रति, प्राण मिलन को भई मति ।
हरि सौं खेलूं हरि गति,कब मिल हैं मोहि प्राणपति ॥ टेक ॥
बल कीती क्यों देखूंगी रे, मुझ मांही अति बात अनेरी ।
सुन साहिब इक विनती मेरी, जनम-जनम हूँ दासी तेरी ॥ 1 ॥
कहै दादू सो सुनसी सांई, हौं अबला बल मुझ में नांही ।
करम करी घर मेरे आई, तो शोभा पीव तेरे तांई ॥ 2 ॥
294. राज मृगांक ताल (बसंत में)
नीके मोहन सौं प्रीति लाई ।
तन मन प्राण देत बजाई, रंग रस के बनाई ॥ टेक ॥
ये ही जीयरे वे ही पीवरे, छोड्यो न जाई, माई ।
बाण भेद के देत लगाई, देखत ही मुरझाई ॥ 1 ॥
निर्मल नेह पिया सौं लागो, रती न राखी काई ।
दादू रे तिल में तन जावे, संग न छाडूं , माई ॥ 2 ॥
295. परमेश्वर महिमा । राज विद्याधर ताल
तुम बिन ऐसैं कौन करै !
गरीब निवाज गुसांई मेरो,माथै मुकुट धरै ॥ टेक ॥
नीच ऊँच ले करै गुसांई, टार्यो हूँ न टरै ।
हस्त कमल की छाया राखै, काहू तैं न डरै ॥ 1 ॥
जाकी छोत जगत को लागै, तापर तूँ हीं ढरै ।
अमर आप ले करे गुसांई, मार्यो हूँ न मरै ॥ 2 ॥
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