सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-राग भवानी 14
२६१. (गुजराती) जलद त्रिताल
चरण देखाड़ तो प्रमाण ।
स्वामी माहरे नैणें निरखूं, मांगू येज मान ॥ टेक ॥
जोवूं तुझनें आशा मुझनें, लागूं येज ध्यान ।
वाहलो मारो मलो रे सहिये, आवे केवल ज्ञान ॥ 1 ॥
जेणी पेरें हूँ देखूं तुझने, मुझनें आलो जाण ।
पीव तणी हूँ पर नहिं जाणूं, दादू रे अजाण ॥ 2 ॥
२६२. (गुजराती) जलद त्रिताल
ते हरि मलू मारो नाथ !
जोवा ने मारो तन तपे, केवी पेरें पामूं साथ ॥ टेक ॥
ते कारण हूँ आकुल व्याकुल, ऊभी करूं विलाप ।
स्वामी मारो नैणें निरखूं, ते तणों मनें ताप ॥ 1 ॥
एक वार घर आवे वाहला, नव मेलूं कर हाथ।
ये वीनती सांभल स्वामी, दादू तारो दास ॥ 2 ॥
२६३. रंगताल
ते केम पामिये रे, दुर्लभ जे आधार।
ते बिना तारण को नहीं, केम उतरिये पार ॥ टेक ॥
केवी पेरें कीजे आपणो रे, तत्व ते छे सार ।
मन मनोरथ पूरे मारा, तन नो ताप निवार ॥ 1 ॥
संभान्यो आवे रे वाहला, वेला ये अवार।
विरहणी विलाप करे, तेम दादू मन विचार ॥ 2 ॥
इति राग भांणमली सम्पूर्णः ॥ 14 ॥ पद 4 ॥
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राग सारंग
अथ राग सारंग 15
(गायन समय मध्य दिन)
264. गुरु ज्ञान सूर । फख्ता ताल
हो ऐसा ज्ञान ध्यान, गुरु बिना क्यों पावै ।
वार पार, पार वार, दुस्तर तिर आवै हो ।। टेक ।।
भवन गवन, गवन भवन, मन ही मन लावै ।
रवन छवन, छवन रवन, सतगुरु समझावै हो ।। 1 ।।
क्षीर नीर, नीर क्षीर, प्रेम भक्ति भावै ।
प्राण कँवल विकस विकस, गोविन्द गुण गावै हो ।। 2 ।।
ज्योति जुगति बाट घाट, लै समाधि ध्यावै ।
परम नूर परम तेज, दादू दिखलावै हो ।। 3 ।।
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श्री दादूवाणी-राग सारंग 15
265. केवल विनती । पंजाबी त्रिताल
तो निबहै जन सेवक तेरा, ऐसे दया कर साहिब मेरा ॥ टेक ॥
जो हम तोरैं, तो तूँ जोरै, हम तोरैं, पै तूँ नहिं तोरै ॥ 1 ॥
हम विसरैं, पै तूँ न विसारै, हम बिगरैं, पै तूँ न बिगारै ॥ 2 ॥
हम भूलैं, तूँ आन मिलावै, हम बिछुरैं, तूँ अंग लगावै ॥ 3 ॥
तुम्ह भावै सो हम पै नाँहीं, दादू दर्शन देहु गुसांईं ॥ 4 ॥
266. काल चेतावनी । पंजाबी त्रिताल
माया संसार की सब झूठी ।
मात पिता सब ऊभे भाई, तिनहिं देखतां लूटी ॥ टेक ॥
जब लग जीव काया में थारे, ख्रिण बैठी ख्रिण ऊठी ।
हंस जु था सो खेल गया रे, तब तैं संगति छूटी ॥ 1 ॥
ए दिन पूगे आयु घटानी, तब निचिन्त होइ सूती ।
दादू दास कहै ऐसी काया, जैसी गगरिया फूटी ॥ 2 ॥
267. माया मध्य मुक्ति । त्रिताल
ऐसे गृह में क्यों न रहै, मनसा वाचा राम कहै ॥ टेक ॥
संपति विपति नहीं मैं मेरा, हर्ष शोक दोउ नांही ।
राग द्वेष रहित सुख दुःख तैं, बैठा हरि पद मांही ॥ 1 ॥
तन धन माया मोह न बांधे, वैरी मीत न कोई ।
आपा पर सम रहै निरन्तर, निज जन सेवग सोई ॥ 2 ॥
सरवर कमल रहै जल जैसे, दधि मथ घृत कर लीन्हा।
जैसे वन में रहे बटाऊ, काहू हेत न कीन्हा ॥ 3 ॥
भाव भक्ति रहै रस माता, प्रेम मगन गुण गावै ।
जीवत मुक्त होइ जन दादू, अमर अभय पद पावै ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग सारंग 15
२6४. परिचय उपदेश । त्रिताल
चल-चल रे मन तहाँ जाइये । चरण बिन चालिबो,
श्रवण बिन सुनिबो, बिन कर बैन बजाइये ॥ टेक ॥
तन नाहीं जहाँ, मन नाहीं तहँ, प्राण नहीं तहँ आइये ।
शब्द नहीं जहाँ, जीव नहीं तहँ, बिन रसना मुख गाइये ॥ 1 ॥
पवन पावक नहीं, धरणी अंबर नहीं, उभय नहीं तहँ लाइये ।
चन्द नहीं जहाँ, सूर नहीं तहँ, परम ज्योति सुख पाइये ॥ 2 ॥
तेज पुंज सो सुख का सागर, झिलमिल नूर नहाइये ।
तहँ चल दादू अगम अगोचर, तामैं सहज समाइये ॥ 3 ॥
इति राग सारंग सम्पूर्णः ॥ 15 ॥ पद 5 ॥
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अथ राग टोडी (तोडी) 16
(गायन समय दिन 6 से 12)
269. स्मरण उपदेश । राज मृगांक ताल
सो तत सहजैं सुषमन कहणा,
साँच पकड़ मन जुग जुग रहणा ।। टेक ।।
प्रेम प्रीति कर नीका राखै, बारम्बार सहज नर भाषै ।। 1 ।।
मुख हिरदै सो सहज संभारै, तिहि तत रहणा कदे न विसारै ।। 2 ।।
अन्तर सोई नीका जाणै, निमिष न बिसरै ब्रह्म बखाणै ।। 3 ।।
सोई सुजाण सुधा रस पीवै, दादू देखि जुग जुग जीवै ।। 4 ।।
270. नाम महिमा । राज मृंगाक ताल
नाँव रे नाँव रे, नाँव रे नाँव रे,
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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
सकल शिरोमणि नाँव रे, मै बलिहारी जाँव रे ॥ टेक ॥
दुस्तर तारै, पार उतारै, नरक निवारै नाँव रे ॥ 1 ॥
तारणहारा, भवजल पारा, निरमल सारा नाँव रे ॥ 2 ॥
नूर दिखावै, तेज मिलावै, ज्योति जगावै नाँव रे ॥ 3 ॥
सब कुछ दाता, अमृत राता, दादू माता नाँव रे ॥ 4 ॥
271. केवल विनती । राज विद्याधर ताल
राइ रे राइ रे, सकल भुवनपति राइ रे,
अमृत देहु अघाइ रे राइ ॥ टेक ॥
प्रगट राता, प्रगट माता, प्रगट नूर दिखाइ रेराइ ॥ 1 ॥
सुस्थिर ज्ञाना, सुस्थिर ध्याना, सुस्थिर तेज मिलाइ रेराइ ॥ 2 ॥
अविचल मेला, अविचल खेला, अविचल ज्योति समाइ रे राइ ॥ 3 ॥
निहचल बैना, निहचल नैना, दादू बलि बलि जाइ रे राइ ॥ 4 ॥
272. रसिक अवस्था । सवारी ताल
हरि रस माते मगन भये ।
सुमिर सुमिर भये मतवाले, जामण मरण सब भूल गये ॥ टेक ॥
निर्मल भक्ति प्रेम रस पीवैं, आन न दूजा भाव धरैं ।
सहजैं सदा राम रंग राते, मुक्ति वैकुंठैं कहा करैं ॥ 1 ॥
गाइ गाइ रस लीन भये हैं, कछू न मांगैं संत जना ।
और अनेक देहु दत्त आगै, आन न भावै राम बिना ॥ 2 ॥
इक टग ध्यान रहैं ल्यौ लागे, छाकि परे हरि रस पीवैं ।
दादू मगन रहैं रस माते, ऐसे हरि के जन जीवैं ॥ 3 ॥
273. (गुजराती) केवल विनती । सवारी ताल
ते मैं कीधेला राम ! जे तैं वाज्या ते ।
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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
मारग मेल्हि, अमारग अणसरि, अकरम, करम हरे ।। टेक ।।
साधू को संग छाड़ी नें, असंगति अणसरियो।
सुकृत मूकी, अविद्या साधी, बिषिया विस्तारियो ।। 1 ।।
आन कह्युं आन सांभल्युं, नैणैं आन दीठो।
अमृत कड़वो, विष अमी लागो, खातां अति मीठो ।। 2 ।।
राम हृदाथी विसारी नें, माया मन दीधो।
पाँचे प्राण गुरुमुख वरज्या, ते दादू कीधो ।। 3 ।।
274. विरह विनती । त्रिताल
कहो, क्यों जन जीवै सांइयां ? दे चरण-कँवल आधार हो।
डूबत है भव-सागरा, कारी करो करतार हो ।। टेक ।।
मीन मरै बिन पाणियां, तुम बिन यह विचार हो।
जल बिन कैसे जीवहीं, इब तो किती इक बार हो ।। 1 ।।
ज्यों परै पतंगा जोति में, देख देख निज सार हो।
प्यासा बूँद न पावई, तब वन-वन करै पुकार हो ।। 2 ।।
निसदिन पीर पुकार ही, तन की ताप निवार हो।
दादू विपति सुनावही, कर लोचन सन्मुख चार हो ।। 3 ।।
275. केवल विनती । त्रिताल
तूँ साचा साहिब मेरा ।
कर्म करीम कृपालु निहारो, मैं जन बंदा तेरा ।। टेक ।।
तुम्ह दीवान सबहिन की जानो, दीनानाथ दयाला।
दिखाइ दीदार मौज बंदे को, कायम करो निहाला ।। 1 ।।
मालिक सबै मुलिक के सांई, समर्थ सिरजनहारा।
खैर खुदाइ खलक में खेलत, दे दीदार तुम्हारा ।। 2 ।।
मैं शिकस्तः दरगह तेरी, हरि हजूर तूँ कहिये।
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दादू द्वारे दीन पुकारे, काहे न दर्शन लहिये ॥ 3 ॥
276. उपदेश चेतावनी । मकरंद ताल
कुछ चेति रे कहि क्या आया ।
इन में बैठा फूल कर, तैं देखी माया ॥ टेक ॥
तूँ जनि जानैं तन धन मेरा, मूरख देख भुलाया ।
आज काल चल जावै देही, ऐसी सुन्दर काया ॥ 1 ॥
राम नाम निज लीजिये, मैं कहि समझाया ।
दादू हरि की सेवा कीजे, सुन्दर साज मिलाया ॥ 2 ॥
277. मकरंद ताल
नेटि रे माटी में मिलना, मोड़ मोड़ देह काहे को चलना ॥ टेक ॥
काहे को अपना मन डुलावै, यहु तन अपना नीका धरना ।
कोटि वर्ष तूँ काहे न जीवै, विचार देख आगै है मरना ॥ 1 ॥
काहे न अपनी बाट सँवारै, संजम रहना, सुमिरण करणा ।
गहिला ! दादू गर्व न कीजे, यहु संसार पँच दिन भरणा ॥ 2 ॥
278. ब्रह्मयोग ताल
जाइ रे तन जाइ रे ।
जन्म सुफल कर लेहु राम रमि, सुमिर सुमिर गुण गाइ रे ॥ टेक ॥
नर नारायण सकल शिरोमणि, जनम अमोलक आइ रे ।
सो तन जाइ जगत नहिं जानै, सकै तो ठाहर लाइ रे ॥ 1 ॥
जरा काल दिन जाइ गरासै, तासौं कुछ न बसाइ रे ।
छिन छिन छीजत जाइ मुग्ध नर, अंत काल दिन आइ रे ॥ 2 ॥
प्रेम भगति, साधु की संगति, नाम निरंतर गाइ रे ।
जे सिर भाग तो सौंज सुफल कर, दादू विलम्ब न लाइ रे ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
279. त्रिताल
काहे रे बक मूल गँवावै, राम के नाम भलें सचु पावै ॥ टेक ॥
वाद विवाद न कीजे लोई, वाद विवाद न हरि रस होई ।
मैं मैं तेरी मांनै नाँहीं, मैं तैं मेट मिलै हरि मांहीं ॥ 1 ॥
हार जीत सौं हरि रस जाई, समझि देख मेरे मन भाई!
मूल न छाड़ी दादू बौरै, जनि भूलै तूँ बकबे औरै ॥ 2 ॥
२४०. (फारसी) त्रिताल
हुशियार हाकिम न्याव है, सांई के दीवान।
कुल का हिसाब होगा, समझ मुसलमान ॥ टेक ॥
नीयत नेकी सालिकां, रास्ता ईमान।
इखलास अंदर आपणे, रखणां सुबहान ॥ 1 ॥
हुक्म हाजिर होइ बाबा, मुसल्लम महरबान।
अक्ल सेती आपमां, शोध लेहु सुजान ॥ 2 ॥
हक सौं हजूरी हूँणां, देखणां कर ज्ञान।
दोस्त दाना दीन का, मनणां फरमान ॥ 3 ॥
गुस्सा हैवानी दूर कर, छाड़ दे अभिमान।
दुई दरोगां नांहिं खुशियाँ, दादू लेहु पिछान ॥ 4 ॥
२४1. साधु प्रति उपदेश (गुजराती) । ललित ताल
निर्पख रहणा, राम राम कहणा,
काम क्रोध में देह न दहणा ॥ टेक ॥
जेणें मारग संसार जाइला, तेणें प्राणी आप बहाइला ॥ 1 ॥
जे जे करणी जगत करीला, सो करणी संत दूर धरीला ॥ 2 ॥
जेणें पंथैं लोक राता, तेणें पंथैं साधु न जाता ॥ 3 ॥
राम नाम दादू ऐसें कहिये, राम रमत रामहि मिल रहिये ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
282. भेष बिडंबन । ललित ताल
हम पाया, हम पाया रे भाई । भेष बनाय ऐसी मन आई ॥ टेक ॥
भीतर का यहु भेद न जानै, कहै सुहागिनी क्यों मन मानै ॥ 1 ॥
अंतर पीव सौं परिचय नाँहीं, भई सुहागिनी लोगन मांहीं ॥ 2 ॥
सांई स्वप्नै कबहुँ न आवै, कहबा ऐसे महल बुलावै ॥ 3 ॥
इन बातन मोहि अचरज आवै, पटम किये कैसे पीव पावै ॥ 4 ॥
दादू सुहागिनी ऐसे कोई, आपा मेट राम रत होई ॥ 5 ॥
283. आत्म समता । उत्सव ताल
ऐसे बाबा राम रमीजे, आतम सौं अंतर नहीं कीजे ॥ टेक ॥
जैसे आतम आपा लेखै, जीव जंतु ऐसे कर पेखै ॥ 1 ॥
एक राम ऐसे कर जानै, आपा पर अंतर नहिं आनै ॥ 2 ॥
सब घट आतम एक विचारे, राम सनेही प्राण हमारे ॥ 3 ॥
दादू साची राम सगाई, ऐसा भाव हमारे भाई ॥ 4 ॥
284. नाम समता । उत्सव ताल
माधइयो-माधइयो मीठो री माइ, माहवो-माहवो भेटियो आइ ॥ टेक ॥
कान्हइयो-कान्हइयो करता जाइ, केशवो केशवो केशवो धाइ ॥ 1 ॥
भूधरो भूधरो भूधरो भाइ, रमैयो रमैयो रह्यो समाइ ॥ 2 ॥
नरहरि नरहरि नरहरि राइ, गोविन्दो गोविन्दो दादू गाइ ॥ 3 ॥
285. समता । बसंत ताल
एकही एकै भया आनंद, एकही एकै भागे द्वन्द ॥ टेक ॥
एकही एकै एक समान, एकही एकै पद निर्वान ॥ 1 ॥
एकही एकै त्रिभुवन सार, एकही एकै अगम अपार ॥ 2 ॥
एकही एकै निर्भय होइ, एकही एकै काल न कोइ ॥ 3 ॥
एकही एकै घट प्रकास, एकही एकै निरंजन वास ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
एकही एकै आपहि आप, एकही एकै माइ न बाप ॥ 5 ॥
एकही एकै सहज स्वरूप, एकही एकै भये अनूप ॥ 6 ॥
एकही एकै अनत न जाइ, एकही एकै रह्या समाइ ॥ 7 ॥
एकही एकै भये लै लीन, एकही एकै दादू दीन ॥ 8 ॥
286. विनती । वसंत ताल
आदि है आदि अनादि मेरा, संसार सागर भक्ति भेरा ।
आदि है अंत है, अंत है आदि है, बिड़द तेरा ॥ टेक ॥
काल है झाल है, झाल है काल है, राखिले राखिले प्राण घेरा ।
जीव का जन्म का, जन्म का जीव का, आपही आपले भांन झेरा ॥ 1 ॥
मर्म का कर्म का, कर्म का मर्म का, आइबा जाइबा मेट फेरा ।
तार ले पार ले, पार ले तार ले, जीव सौं शिव है निकट नेरा ॥ 2 ॥
आत्मा राम है, राम है आत्मा, ज्योति है युक्ति सौं करो मेला ।
तेज है सेज है, सेज है तेज है, एक रस दादू खेल खेला ॥ 3 ॥
287. परिचय । कोकिल ताल
सुन्दर राम राया ।
परम ज्ञान परम ध्यान, परम प्राण आया ॥ टेक ॥
अकल सकल अति अनूप, छाया नहिं माया ।
निराकार निराधार, वार पार न पाया ॥ 1 ॥
गंभीर धीर निधि शरीर, निर्गुण निरकारा ।
अखिल अमर परम पुरुष, निर्मल निज सारा ॥ 2 ॥
परम नूर परम तेज, परम ज्योति प्रकाशा ।
परम पुंज परापरं, दादू निज दासा ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
२४४. परिचय पराभक्ति । कोकिल ताल
अखिल भाव अखिल भक्ति, अखिल नाम देवा।
अखिल प्रेम अखिल प्रीति,अखिल सुरति सेवा ।। टेक ।।
अखिल अंग अखिल संग, अखिल रंग रामा।
अखिला रत अखिला मत, अखिला निज नामा ।। 1 ।।
अखिल ज्ञान अखिल ध्यान, अखिल आनन्द कीजे।
अखिला लय अखिला में, अखिला रस पीजे ।। 2 ।।
अखिल मगन अखिल मुदित, अखिल गलित सांई।
अखिल दर्श अखिल पर्श, दादू तुम मांहीं ।। 3 ।।
इति राग टोडी सम्पूर्णः ।। 16 ।। पद 20 ।।
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अथ राग हुसेनी बंगाल 17
(गायन समय पहर दिन चढ़े, चंद्रोदय ग्रन्थ के मतानुसार)
२४9. (फारसी) अनन्यता । त्रिताल
है दाना है दाना, दिलदार मेरे कान्हा।
तूँ ही मेरे जान जिगर, यार मेरे खाना ॥ टेक॥
तूँ ही मेरे मादर पिदर, आलम बेगाना।
साहिब शिरताज मेरे, तूँ ही सुलताना ॥ 1 ॥
दोस्त दिल तूँ ही मेरे, किसका खिल खाना।
नूर चश्म जिंद मेरे, तूँ ही रहमाना ॥ 2 ॥
एकै असनाव मेरे, तूँ ही हम जाना।
जानिबा अजीज मेरे, खूब खजाना ॥ 3 ॥
नेक नजर मेहर मीरां, बंदा मैं तेरा।
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श्री दादूवाणी-राग हुसैनी बंगाल 17
दादू दरबार तेरे, खूब साहिब मेरा ॥ 4 ॥
२१०. विनय । त्रिताल
तूँ घर आव सुलक्षण पीव ।
हिक तिल मुख दिखलावहु तेरा, क्या तरसावै जीव ॥ टेक ॥
निशदिन तेरा पंथ निहारूं, तूँ घर मेरे आव ।
हिरदा भीतर हेत सौं रे वाल्हा, तेरा मुख दिखलाव ॥ 1 ॥
वारी फेरी बलि गई रे, शोभित सोइ कपोल ।
दादू ऊपरि दया करीनें, सुनाइ सुहावे बोल ॥ 2 ॥
इति राग हुसेनी बंगाल सम्पूर्णः ॥ 17 ॥ पद 2 ॥
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राग नटनारायण
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अथ राग नट नारायण १४
(गायन समय रात्रि 9 से 12) 291. हित उपदेश । गज ताल
ताको काहे न प्राण संभालै ।
कोटि अपराध कल्प के लागे, मांहि महूरत टालै ॥ टेक ॥
अनेक जन्म के बन्धन बाढ़े, बिन पावक फँध जालै ।
ऐसो है मन नाम हरी को, कबहुँ दुःख न सालै ॥
चिंतामणि जुगति सौं राखै, ज्यूं जननी सुत पालै ।
दादू देखु दया करै ऐसी, जन को जाल न रालै ॥
292. विरह । जय मंगल ताल
गोविन्द कबहुँ मिलै पीव मेरा ।
चरण-कमल क्योंहीं कर देखूं, राखूं नैनहुँ नेरा ॥ टेक ॥
निरखण का मोहि चाव घणेरा, कब मुख देखूं तेरा।
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श्री दादूवाणी-राग नट नारायण 18
प्राण मिलन को भई उदासी, मिल तूँ मीत सवेरा ॥ 1 ॥
व्याकुल तातैं भई तन देही, सिर पर जम का हेरा ।
दादू रे जन राम मिलन को, तपहि तन बहुतेरा ॥ 2 ॥
293. राज मृगांक ताल
कब देखूं नैनहुँ रेख रति, प्राण मिलन को भई मति ।
हरि सौं खेलूं हरि गति,कब मिल हैं मोहि प्राणपति ॥ टेक ॥
बल कीती क्यों देखूंगी रे, मुझ मांही अति बात अनेरी ।
सुन साहिब इक विनती मेरी, जनम-जनम हूँ दासी तेरी ॥ 1 ॥
कहै दादू सो सुनसी सांई, हौं अबला बल मुझ में नांही ।
करम करी घर मेरे आई, तो शोभा पीव तेरे तांई ॥ 2 ॥
294. राज मृगांक ताल (बसंत में)
नीके मोहन सौं प्रीति लाई ।
तन मन प्राण देत बजाई, रंग रस के बनाई ॥ टेक ॥
ये ही जीयरे वे ही पीवरे, छोड्यो न जाई, माई ।
बाण भेद के देत लगाई, देखत ही मुरझाई ॥ 1 ॥
निर्मल नेह पिया सौं लागो, रती न राखी काई ।
दादू रे तिल में तन जावे, संग न छाडूं , माई ॥ 2 ॥
295. परमेश्वर महिमा । राज विद्याधर ताल
तुम बिन ऐसैं कौन करै !
गरीब निवाज गुसांई मेरो,माथै मुकुट धरै ॥ टेक ॥
नीच ऊँच ले करै गुसांई, टार्यो हूँ न टरै ।
हस्त कमल की छाया राखै, काहू तैं न डरै ॥ 1 ॥
जाकी छोत जगत को लागै, तापर तूँ हीं ढरै ।
अमर आप ले करे गुसांई, मार्यो हूँ न मरै ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग नट नारायण 18
नामदेव कबीर जुलाहो, जन रैदास तिरै ।
दादू बेगि बार नहीं लागै, हरि सौं सबै सरै ॥ ३ ॥
२१६. मंगलाचरण । राज विद्याधर ताल
नमो नमो हरि ! नमो नमो ।
ताहि गुसाँई नमो नमो, अकल निरंजन नमो नमो ।
सकल वियापी जिहिं जग कीन्हा, नारायण निज नमो नमो ॥ टेक ॥
जिन सिरजे जल शीश चरण कर, अविगत जीव दियो ।
श्रवण सँवारि नैन रसना मुख, ऐसो चित्र कियो ॥ १ ॥
आप उपाइ किये जगजीवन, सुर नर शंकर साजे ।
पीर पैगम्बर सिद्ध अरु साधक, अपने नाम निवाजे ॥ २ ॥
धरती अम्बर चंद सूर जिन, पाणी पवन किये ।
भाणण घडन पलक में केते, सकल सँवार लिये ॥ ३ ॥
आप अखंडित खंडित नाहीं, सब सम पूर रहे ।
दादू दीन ताहि नइ वंदित, अगम अगाध कहे ॥ ४ ॥
२१७. हैरान । उत्सव ताल
हम तैं दूर रही गति तेरी ।
तुम हो तैसे तुम हीं जानो, कहा बपुरी मति मेरी ॥ टेक ॥
मन तैं अगम दृष्टि अगोचर, मनसा की गम नाँहीं ।
सुरति समाइ बुद्धि बल थाके, वचन न पहुँचे तांहीं ॥ १ ॥
जोग न ध्यान ज्ञान गम नांही, समझ समझ सब हारे ।
उनमनी रहत प्राण घट साधे, पार न गहत तुम्हारे ॥ २ ॥
खोज परे गति जाइ न जानी, अगह गहन कैसे आवे ।
दादू अविगत देहु दया कर, भाग बड़े सो पावे ॥ ३ ॥
इति राग नट नारायण सम्पूर्ण: ॥ १८ ॥ पद ७ ॥
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राग सोरठ
अथ राग सोरठ 19
(गायन समय रात्रि 9 से 12)
298. स्मरण । उत्सव ताल
कोली साल न छाड़ै रे, सब घावर काढै रे ।। टेक ।।
प्रेम पाण लगाई धागै, तत्त्व तेल निज दीया ।
एक मना इस आरंभ लागा, ज्ञान राछ भर लीया ।। 1 ।।
नाँव नली भर बुणकर लागा, अंतरगति रंग राता ।
ताणैं बाणें जीव जुलाहा, परम तत्व सौं माता ।। 2 ।।
सकल शिरोमणि बुनैन विचारा, सान्हाँ सूत न तोड़ै ।
सदा सचेत रहै ल्यौ लागा, ज्यौं टूटै त्यौं जोड़ै ।। 3 ।।
ऐसे तनि बुनि गहर गजीना, सांई के मन भावै ।
दादू कोली करता के संग, बहुरि न इहि जग आवै ।। 4 ।।
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
२९९. बिरही । ललित ताल
विरहणी वपु न सँभारै ।
निशदिन तलफै राम के कारण, अंतर एक विचारै ॥ टेक ॥
आतुर भई मिलन के कारण, कहि कहि राम पुकारै ।
सास उसास निमिष नहिं विसरै, जित तित पंथ निहारै ॥ 1 ॥
फिरै उदास चहुँ दिशि चितवत, नैन नीर भर आवै ।
राम वियोग विरह की जारी, और न कोई भावै ॥ 2 ॥
व्याकुल भई शरीर न समझै, विषम बाण हरि मारे ।
दादू दर्शन बिन क्यों जीवै, राम सनेही हमारे ॥ 3 ॥
३००. मन उपदेश चेतावनी । धीमा ताल
मन रे, राम रटत क्यों रहिये !
यहु तत बार बार क्यों न कहिये ॥ टेक ॥
जब लग जिह्वा वाणी, तो लौं जपिले सारंगपाणी ।
जब पवना चल जावे, तब प्राणी पछतावे ॥ 1 ॥
जब लग श्रवण सुणीजे, तो लौं साध शब्द सुण लीजे ।
श्रवणों सुरति जब जाई, ए तब का सुणि है भाई ॥ 2 ॥
जब लग नैन हुँ पेखे, तो लौं चरण-कमल क्यों न देखे ।
जब नैनहुं कछु न सूझे, ये सब मूरख क्या बूझे ॥ 3 ॥
जब लग तन मन नीका, तो लौं जपिले जीवन जीका ।
जब दादू जीव आवै, तब हरि के मन भावै ॥ 4 ॥
३०१. धीमा ताल
मन रे, तेरा कौन गँवारा, जपि जीवन प्राण आधारा ॥ टेक ॥
रे मात पिता कुल जाती, धन जौबन सजन सगाती ।
रे गृह दारा सुत भाई, हरि बिन सब झूठा है जाई ॥ 1 ॥
रे तूं अंत अकेला जावै, काहू के संग न आवै ।
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श्री दादूवाणी-राग सोरठ 19
रे तूँ ना कर मेरी मेरा, हरि राम बिना को तेरा ॥ 2 ॥
रे तूँ चेत न देखे अंधा, यहु माया मोह सब धंधा ।
रे काल मीच सिर जागे, हरि सुमिरण काहे न लागे ॥ 3 ॥
यहु औसर बहुरि न आवै, फिर मनिषा जन्म न पावै ।
अब दादू ढ़ील न कीजे, हरि राम भजन कर लीजे ॥ 4 ॥
३०२. प्रतिपाल
मन रे, देखत जन्म गयो, तातैं काज न कोई भयो रे ॥ टेक ॥
मन इंद्रिय ज्ञान विचारा, तातैं जन्म जुआ ज्यों हारा ।
मन झूठ साँच कर जानै, हरि साध कहैं, नहिं मानै ॥ 1 ॥
मन रे बादि गहे चतुराई, तातैं मनमुख बात बनाइ ।
मन आप आपको थापै, करता होइ बैठा आपै ॥ 2 ॥
मन स्वादी बहुत बनावै, मैं जान्या विषय बतावै ।
मन मांगै सोई दीजै, हमहिं राम दुखी क्यों कीजै ॥ 3 ॥
मन सबही छाड़ विकारा, प्राणी होइ गुणण तैं न्यारा ।
निर्गुण निज गहि रहिये, दादू साध कहैं, ते कहिये ॥ 4 ॥
३०३. प्रतिपाल
मन रे, अंतकाल दिन आया, तातैं यहु सब भया पराया ॥ टेक ॥
श्रवनों सुनै न नैनहुँ सूझै, रसना कह्या न जाई ।
शीश चरण कर कंपन लागे, सो दिन पहुँच्यो आई ॥ 1 ॥
काले धोले वरण पलटिया, तन मन का बल भागा ।
जौबन गया जरा चल आई, तब पछतावन लागा ॥ 2 ॥
आयु घटै घट छीजै काया, यहु तन भया पुराना ।
पाँचों थाके कह्या न मानैं, ताका मर्म न जाना ॥ 3 ॥
हंस बटाऊ प्राण पयाना, समझि देख मन मांहिं ।
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