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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 416, कुल 504 में से

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पृष्ठ 416

श्री दादूवाणी-राग सारंग 15
265. केवल विनती । पंजाबी त्रिताल
तो निबहै जन सेवक तेरा, ऐसे दया कर साहिब मेरा ॥ टेक ॥
जो हम तोरैं, तो तूँ जोरै, हम तोरैं, पै तूँ नहिं तोरै ॥ 1 ॥
हम विसरैं, पै तूँ न विसारै, हम बिगरैं, पै तूँ न बिगारै ॥ 2 ॥
हम भूलैं, तूँ आन मिलावै, हम बिछुरैं, तूँ अंग लगावै ॥ 3 ॥
तुम्ह भावै सो हम पै नाँहीं, दादू दर्शन देहु गुसांईं ॥ 4 ॥
266. काल चेतावनी । पंजाबी त्रिताल
माया संसार की सब झूठी ।
मात पिता सब ऊभे भाई, तिनहिं देखतां लूटी ॥ टेक ॥
जब लग जीव काया में थारे, ख्रिण बैठी ख्रिण ऊठी ।
हंस जु था सो खेल गया रे, तब तैं संगति छूटी ॥ 1 ॥
ए दिन पूगे आयु घटानी, तब निचिन्त होइ सूती ।
दादू दास कहै ऐसी काया, जैसी गगरिया फूटी ॥ 2 ॥
267. माया मध्य मुक्ति । त्रिताल
ऐसे गृह में क्यों न रहै, मनसा वाचा राम कहै ॥ टेक ॥
संपति विपति नहीं मैं मेरा, हर्ष शोक दोउ नांही ।
राग द्वेष रहित सुख दुःख तैं, बैठा हरि पद मांही ॥ 1 ॥
तन धन माया मोह न बांधे, वैरी मीत न कोई ।
आपा पर सम रहै निरन्तर, निज जन सेवग सोई ॥ 2 ॥
सरवर कमल रहै जल जैसे, दधि मथ घृत कर लीन्हा।
जैसे वन में रहे बटाऊ, काहू हेत न कीन्हा ॥ 3 ॥
भाव भक्ति रहै रस माता, प्रेम मगन गुण गावै ।
जीवत मुक्त होइ जन दादू, अमर अभय पद पावै ॥ 4 ॥

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