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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 504 में से

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पृष्ठ 420

श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
मारग मेल्हि, अमारग अणसरि, अकरम, करम हरे ।। टेक ।।
साधू को संग छाड़ी नें, असंगति अणसरियो।
सुकृत मूकी, अविद्या साधी, बिषिया विस्तारियो ।। 1 ।।
आन कह्युं आन सांभल्युं, नैणैं आन दीठो।
अमृत कड़वो, विष अमी लागो, खातां अति मीठो ।। 2 ।।
राम हृदाथी विसारी नें, माया मन दीधो।
पाँचे प्राण गुरुमुख वरज्या, ते दादू कीधो ।। 3 ।।
274. विरह विनती । त्रिताल
कहो, क्यों जन जीवै सांइयां ? दे चरण-कँवल आधार हो।
डूबत है भव-सागरा, कारी करो करतार हो ।। टेक ।।
मीन मरै बिन पाणियां, तुम बिन यह विचार हो।
जल बिन कैसे जीवहीं, इब तो किती इक बार हो ।। 1 ।।
ज्यों परै पतंगा जोति में, देख देख निज सार हो।
प्यासा बूँद न पावई, तब वन-वन करै पुकार हो ।। 2 ।।
निसदिन पीर पुकार ही, तन की ताप निवार हो।
दादू विपति सुनावही, कर लोचन सन्मुख चार हो ।। 3 ।।
275. केवल विनती । त्रिताल
तूँ साचा साहिब मेरा ।
कर्म करीम कृपालु निहारो, मैं जन बंदा तेरा ।। टेक ।।
तुम्ह दीवान सबहिन की जानो, दीनानाथ दयाला।
दिखाइ दीदार मौज बंदे को, कायम करो निहाला ।। 1 ।।
मालिक सबै मुलिक के सांई, समर्थ सिरजनहारा।
खैर खुदाइ खलक में खेलत, दे दीदार तुम्हारा ।। 2 ।।
मैं शिकस्तः दरगह तेरी, हरि हजूर तूँ कहिये।

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