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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
241. गुरु ज्ञान । वर्ण भिन्न ताल
मेरा गुरु ऐसा ज्ञान बतावै ।
काल न लागै, संशय भागै, ज्यों है त्यों समझावै ॥ टेक ॥
अमर गुरु के आसन रहिये, परम ज्योति तहँ लहिये ।
परम तेज सो दृढ़ कर गहिये, गहिये लहिये रहिये ॥ 1 ॥
मन पवना गहि आतम खेला, सहज शून्य घर मेला ।
अगम अगोचर आप अकेला, अकेला मेला खेला ॥ 2 ॥
धरती अम्बर चंद न सूरा, सकल निरंतर पूरा ।
शब्द अनाहद बाजहिं तूरा, तूरा पूरा सूरा ॥ 3 ॥
अविचल अमर अभय पद दाता, तहाँ निरंजन राता ।
ज्ञान गुरु ले दादू माता, माता राता दाता ॥ 4 ॥
242. राज विद्याधर ताल
मेरा गुरु आप अकेला खेलै ।
आपै देवै आपै लेवै, आपै द्वै कर मेलै ॥ टेक ॥
आपै आप उपावै माया, पंच तत्त्व कर काया ।
जीव जन्म ले जग में आया, आया काया माया ॥ 1 ॥
धरती अंबर महल उपाया, सब जग धंधै लाया ।
आपै अलख निरंजन राया, राया लाया पाया ॥ 2 ॥
चन्द सूर दोइ दीपक कीन्हा, रात दिवस कर लीन्हा ।
राजिक रिजक सबन को दीन्हा, दीन्हा लीन्हा कीन्हा ॥ 3 ॥
परम गुरु सो प्राण हमारा, सब सुख देवै सारा ।
दादू खेलै अनन्त अपारा, अपारा सारा हमारा ॥ 4 ॥
243. हैरान । राज विद्याधर ताल
थकित भयो मन कह्यो न जाई, सहज समाधि रह्यो ल्यौ लाई ॥ टेक ॥

  • 401 -

श्री दादूवाणी-राग आसावरी 9
....................................................................................................................................
जे कुछ कहिये सोच विचारा, ज्ञान अगोचर अगम अपारा ॥ 1 ॥
साइर बूँद कैसे कर तोलै, आप अबोल कहा कहि बोलै ॥ 2 ॥
अनल पंखि परै पर दूर, ऐसे राम रह्या भरपूर ॥ 3 ॥
अब मन मेरा ऐसे रे भाई, दादू कहबा कहण न जाई ॥ 4 ॥
244. मल्लिका मोद ताल
अविगत की गति कोइ न लहै, सब अपना उनमान कहै ॥ टेक ॥
केते ब्रह्मा वेद विचारैं, केते पंडित पाठ पढ़ें।
केते अनुभव आतम खोजैं, केते सुर नर नाम रटैं ॥ 1 ॥
केते ईश्वर आसन बैठे, केते जोगी ध्यान धरैं ।
केते मुनिवर मन को मारैं, केते ज्ञानी ज्ञान करैं ॥ 2 ॥
केते पीर केते पैगम्बर, केते पढ़ें कुराना ।
केते काजी केते मुल्लां, केते शेख शयाना ॥ 3 ॥
केते पारिख अन्त न पावैं, वार पार कछु नांहीं ।
दादू कीमत कोई न जानैं, केते आवैं जांहीं ॥ 4 ॥
245. मल्लिका मोद ताल
ए हौं बूझि रही पीव जैसा है, तैसा कोइ न कहै रे ।
अगम अगाध अपार अगोचर, सुधि बुधि कोइ न लहै रे ॥ टेक ॥
वार पार कोइ अन्त न पावै, आदि अन्त मधि नांही रे ।
खरे सयाने भये दिवाने, कैसा कहाँ रहै रे ॥ 1 ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बूझै, केता कोई बतावै रे ।
शेख मुशायक पीर पैगम्बर, है कोइ अगह गहै रे ॥ 2 ॥
अम्बर धरती सूर ससि बूझै, बाव वर्ण सब सोधै रे ।
दादू चक्रित है हैराना, को है कर्म दहै रे ॥ 3 ॥
इति राग आसावरी सम्पूर्ण ॥ 9 ॥ पद 32 ॥

  • 402 -

राग सिन्दूरा
अथ राग सिन्दूरा 10
(गायन समय रात्रि 12 से 3)
246. परिचय । झपताल
हंस सरोवर तहाँ रमै, सुभर हरि जल नीर।
प्राणी आप पखालिये, निर्मल सदा होइ शरीर ॥ टेक॥
मुक्ताहल मन मानिया, चुगैं हंस सुजान।
मध्य निरंतर झूलिये, मधुर विमल रस पान ॥ 1 ॥
भँवर कमल रस वासना, रातो राम पीवंत।
अरस परस आनन्द करैं, तहँ मन सदा होइ जीवंत ॥ 2 ॥
मीन मगन मांहीं रहैं, मुदित सरोवर मांहिं।
सुख सागर क्रीड़ा करैं, पूरण परिमित नांहिं ॥ 3 ॥
निर्भय तहाँ भय को नहीं, विलसैं बारम्बार।
दादू दर्शन कीजिये, सन्मुख सिरजनहार ॥ 4 ॥

  • 403 -

श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10
247. झपताल
सुख सागर में झूलबो, कश्मल झड़ै हो अपार ।
निर्मल प्राणी होइबो, मिलिबो सिरजनहार ॥ टेक ॥
तिहिं संजम पावन सदा, पंक न लागै प्राण ।
कँवल बिगासे तिहि तणौं, उपजे ब्रह्म गियान ॥ 1 ॥
आगम निगम तहँ गम करै, तत्त्वैं तत्त्व मिलान ।
आसन गुरु के आइबो, मुक्तैं महल समान ॥ 2 ॥
प्राणी परि पूजा करै, पूरै प्रेम विलास ।
सहजैं सुन्दर सेविये, लागी लै कविलास ॥ 3 ॥
रैण दिवस दीसै नहीं, सहजैं पुंज प्रकास ।
दादू दर्शन देखिये, इहि रस रातो हो दास ॥ 4 ॥
248. शूल ताल
अविनाशी संग आत्मा, रमे हो रैण दिन राम ।
एक निरंतर ते भजे, हरि हरि प्राणी नाम ॥ टेक ॥
सदा अखंडित उर बसै, सो मन जाणी ले ।
सकल निरंतर पूरि सब, आतम रातो ते ॥ 1 ॥
निराधार निज बैसणों, जिहिं तत आसन पूर ।
गुरु सिख आनन्द ऊपजै, सन्मुख सदा हजूर ॥ 2 ॥
निश्चल ते चालै नहीं, प्राणी ते परिमाण ।
साथी साथैं ते रहें, जाणैं जाण सुजाण ॥ 3 ॥
ते निर्गुण आगुण धरी, मांहैं कौतुकहार ।
देह अछत अलगो रहै, दादू सेव अपार ॥ 4 ॥
249. शूल ताल
पारब्रह्म भज प्राणिया, अविगत एक अपार ।

  • 404 -

श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10
अविनाशी गुरु सेविये, सहजैं प्राण अधार ॥ टेक ॥
ते पुर प्राणी तेहनो, अविचल सदा रहंत ।
आदि पुरुष ते आपणों, पूरण परम अनंत ॥ 1 ॥
अविगत आसण कीजिये, आपैं आप निधान।
निरालम्ब भजि तेहनों, आनंद आत्मराम ॥ 2 ॥
निर्गुण निश्चल थिर रहै, निराकार निज सोइ।
ते सति प्राणी सेविये, लै समाधि रत होइ ॥ 3 ॥
अमर आप रमता रमै, घट घट सिरजनहार ।
गुणातीत भज प्राणिया, दादू येह विचार ॥ 4 ॥
250. शूरतान झपताल
क्यूं भाजै सेवक तेरा, ऐसा सिर साहिब मेरा ॥ टेक ॥
जाके धरती गगन आकाशा, जाके चंद सूर कविलाशा।
जाके तेज पवन जल साजा, जाके पंच तत्त्व के बाजा ॥ 1 ॥
जाके अठारह भार वनमाला, गिरि पर्वत दीनदयाला।
जाके सायर अनन्त तरंगा, जाके चौरासी लख संगा ॥ 2 ॥
जाके ऐसे लोक अनन्ता, रचि राखै विधि बहु भंता।
जाके ऐसा खेल पसारा, सब देखै कौतुकहारा ॥ 3 ॥
जाके काल मीच डर नांहीं, सो बरत रह्या सब मांहीं।
मन भावै खेलै खेला, ऐसा है आप अकेला ॥ 4 ॥
जाके ब्रह्मा ईश्वर बंदा, सब मुनिजन लागे अंगा।
जाके साध सिद्ध सब मांहीं, परिपूरण परिमित नांहीं ॥ 5 ॥
सोई भानै घड़ै संवारै, जुग केते कबहुँ न हारै।
ऐसा हरि साहिब पूरा, सब जीवनि आतम मूरा ॥ 6 ॥
सो सबहिन की सुधि जानै, जो जैसा तैसी बानै।
सर्वंगी राम सयाना, हरि करै सो होइ निदाना ॥ 7 ॥

  • 405 -

श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10
जे हरि जन सेवक भाजै, तो ऐसा साहिब लाजै ।
अब मरण माँड हरि आगे, तो दादू बाण न लागे ॥ 8 ॥
251. झपताल
हरि भजतां किमि भाजिये, भाजे भल नांहीं ।
भाजे भल क्यूं पाइये, पछतावै मांहीं ॥ टेक ॥
सूरा सो सहजैं भिड़ै, सार उर झेलै ।
रण रोकै भाजै नहीं, ते बाण न मेलै ॥ 1 ॥
सती सत साचा गहै, मरणे न डराई ।
प्राण तजै जग देखतां, पियड़ो उर लाई ॥ 2 ॥
प्राण पतंगा यों तजै, वो अंग न मोड़ै ।
जौवन जारै ज्योति सूं, नैना भल जोड़ै ॥ 3 ॥
सेवक सो स्वामी भजै, तन मन तजि आसा ।
दादू दर्शन ते लहैं, सुख संगम पासा ॥ 4 ॥
252. चेतावनी । रुद्र ताल
सुन तूँ मना रे, मूरख मूढ़ विचार,
आवै लहरि बिहावणी, दमै देह अपार ॥ टेक ॥
करिबो है तिमि कीजिये रे, सुमिर सो आधार ॥ 1 ॥
चरण बिहूणो चालबो रे, संभारी ले सार ॥ 2 ॥
दादू तेहज लीजिये रे, सांचो सिरजनहार ॥ 3 ॥
253. (गुजराती) रुद्र । ताल
रे मन साथी माहरा, तूनें समझायो कै बारो रे ।
रातो रंग कसुंभ के, तैं बिसार्यो आधारो रे ॥ टेक ॥
स्वप्ना सुख के कारणे, फिर पीछे दुख होई रे ।

  • 406 -

श्री दादूवाणी-राग सिन्दूरा 10
दीपक दृष्टि पतंग ज्यों, यों भ्रमि जले जनि कोई रे ॥ 1 ॥
जिह्वा स्वारथ आपने, ज्यूं मीन मरे तज नीरो रे।
मांहैं जाल न जाणियो, तातैं उपनों दुःख शरीरो रे ॥ 2 ॥
स्वादैं ही संकट पर्यो देखत ही नर अंधो रे।
मूरख मूठी छाड़ि दे, होइ रह्यो निर्बंधो रे ॥ 3 ॥
मान सिखावणि माहरी, तू हरि भज मूल न हारी रे।
सुख सागर सोई सेविये, जन दादू राम सँभारी रे ॥ 4 ॥
इति राग सिन्दूरा सम्पूर्ण ॥ 10 ॥ पद 8 ॥

  • 407 -

अथ राग देवगांधार ११
(गायन समय प्रातः 6 से 9)
254. विनती अनन्य शरण । त्रिताल
शरण तुम्हारी आइ परे ।
जहाँ तहाँ हम सब फिर आये, राखि राखि हम दुखित खरे ॥ टेक॥
कस कस काया तप व्रत कर कर, भ्रमत भ्रमत हम भूल परे ।
कहुँ शीतल कहुँ तप्त दहे तन, कहुँ हम करवत सीस धरे ॥ 1 ॥
कहुँ वन तीरथ फिर फिर थाके, कहुँ गिरि पर्वत जाइ चढ़े ।
कहुँ शिखर चढ़ परे धरणि पर, कहुँ हत आपा प्राण हरे ॥ 2 ॥
अंध भये हम, निकट न सूझै, ताथैं तुम्ह तज जाइ जरे ।
हा हा ! हरि अब दीन लीन कर, दादू बहु अपराध भरे ॥ 3 ॥

  • 408 -

श्री दादूवाणी-राग देवगांधार 11
255. पतिव्रत उपदेश । त्रिताल
बौरी ! तूँ बार बार बौरानी।
सखी ! सुहाग न पावै ऐसे, कैसे भरमि भुलानी ॥ टेक॥
चरणों चेरी चित नहिं राख्यो, पतिव्रत नांहि न जान्यो ।
सुन्दरि सेज संग नहिं जानै, पीव सौं मन नहिं मान्यो ॥ 1 ॥
तन मन सबै शरीर न सौंप्यो, शीश नाइ नहिं ठाढ़ी।
इकरस प्रीति रही नहिं कबहुँ, प्रेम उमंग न बाढ़ी ॥ 2 ॥
प्रीतम अपनो परम सनेही, नैन निरख न अघानी।
निशि-वास आनिउर अंतर, परम पूज्य नहिं जानी ॥ 3 ॥
पतिव्रत आगे जिन जिन पाल्यो, सुन्दरी तिन सब छाजै।
दादू पीव बिन और न जानै, ताहि सुहाग विराजै ॥ 4 ॥
256. उपदेश चेतावनी । रंग ताल
मन मूरखा ! तैं योंही जन्म गँवायो,
सांई केरी सेवा न कीन्हीं, इहि कलि काहे को आयो ॥ टेक॥
जिन बातन तेरो छूटिक नाँहीं, सोइ मन तेरे भायो।
कामी ह्वै विषया संग लागो, रोम रोम लपटायो ॥ 1 ॥
कुछ इक चेति विचारि देखो, कहा पाप जीय लायो।
दादू दास भजन करलीजे, स्वप्नै जगडहकायो ॥ 2 ॥
इति राग गूजरी (देवगांधार) सम्पूर्णः ॥ 11 ॥ पद 3 ॥

  • 409 -

अथ राग (कल्हेरौ) कालिंगड़ा 12
(गायन समय प्रभात 3 से 6)
257. (गुजराती) विनती। रंग ताल
वाल्हा, हूँ ताहरी, तूँ माहरो नाथ ।
तुम सौं पहली प्रीतड़ी, पूरबलो साथ ॥ टेक ॥
वाल्हा मैं तूँ म्हारो ओलखियो रे, राखिस तूँनें हृदा मंझारि ।
हूँ पामूं पीव आपणों रे, त्रिभुवन दाता देव मुरारि ॥ 1 ॥
वाल्हा मन माहरो मन मांही राखिस, आत्म एक निरंजन देव ।
चित मांहैं चित सदा निरंतर, येणी पेरे तुम्हारी सेव ॥ 2 ॥
वाल्हा भाव भक्ति हरि भजन तुम्हारो, प्रेमें पूरि कँवल विगास।
अभि-अंतर आनन्द अविनाशी, दादू नी एह्रैं पूरवी आस ॥ 3 ॥

  • 410 -

श्री दादूवाणी-राग कलिंगड़ा 12
258. (गुजराती) उपदेश चेतावनी। वर्ण भिन्नताल
वारीवार कहूँ रे गहिला, राम राम कांइ विसाऱ्यो रे ।
जनम अमोलक पामियो, एह्वो रतन कांई हाऱ्यो रे ॥ टेक ॥
विषया बाह्यो नें तहँ धायो, कीधो नहिं मारो वाऱ्यो रे ।
माया धन जोई नें भूल्यो, सर्वस येणें हाऱ्यो रे ॥ 1 ॥
गर्भवास देह दमतो प्राणी, आश्रम तेह संभाऱ्यो रे ।
दादू रे जन राम भणीजे, नहिं तो जथा विधि हाऱ्यो रे ॥ 2 ॥
इति राग कालिंगडा सम्पूर्णः ॥ 12 ॥ 2 पद ॥

  • 411 -

राग परजिया
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अथ राग परजिया (परज) 13
(गायन समय रात्रि 3 से 6)
259. परिचय । खेमटा ताल
नूर रह्या भरपूर, अमी रस पीजिये,
रस मांही रस होइ, लाहा लीजिये ॥ टेक ॥
प्रकट तेज अनन्त, पार नहिं पाइये ।
झिलमिल झिलमिल होइ, तहाँ मन लाइये ॥ 1 ॥
सहजैं सदा प्रकाश, ज्योति जल पूरिया ।
तहाँ रहें निज दास, सेवक सूरिया ॥ 2 ॥
सुख सागर वार न पार, हमारा वास है ।
हंस रहें ता मांहिं, दादू दास है ॥ 3 ॥
इति राग परजिया सम्पूर्णः ॥ 13 ॥ पद 1 ॥

  • 412 -

राग भवानी
www.dadooram.org
अथ राग भांणमली (भवानी) 14
(गायन समय मध्यरात्रि, राग मंजरी मतानुसार)
260. (गुजराती) विनती । कौव्वाली ताल
मारा वाल्हा रे ! तारे शरणि रहेश ।
बीनतड़ी वाल्हा नें कहतां, अनंत सुख लहेश ॥ टेक ॥
स्वामी तणों हूँ संग न मेलूं, बिनतड़ी कहेश ।
हूँ अबला तूँ बलवंत राजा, तारा बना वहेश ॥ 1 ॥
संग रहूँ तां सब सुख पामूं, अंतर थैं दहेश ।
दादू ऊपर दया करीनें, आवो एणढ़ वेश ॥ 2 ॥

  • 413 -

श्री दादूवाणी-राग भवानी 14

२६१. (गुजराती) जलद त्रिताल
चरण देखाड़ तो प्रमाण ।
स्वामी माहरे नैणें निरखूं, मांगू येज मान ॥ टेक ॥
जोवूं तुझनें आशा मुझनें, लागूं येज ध्यान ।
वाहलो मारो मलो रे सहिये, आवे केवल ज्ञान ॥ 1 ॥
जेणी पेरें हूँ देखूं तुझने, मुझनें आलो जाण ।
पीव तणी हूँ पर नहिं जाणूं, दादू रे अजाण ॥ 2 ॥
२६२. (गुजराती) जलद त्रिताल
ते हरि मलू मारो नाथ !
जोवा ने मारो तन तपे, केवी पेरें पामूं साथ ॥ टेक ॥
ते कारण हूँ आकुल व्याकुल, ऊभी करूं विलाप ।
स्वामी मारो नैणें निरखूं, ते तणों मनें ताप ॥ 1 ॥
एक वार घर आवे वाहला, नव मेलूं कर हाथ।
ये वीनती सांभल स्वामी, दादू तारो दास ॥ 2 ॥
२६३. रंगताल
ते केम पामिये रे, दुर्लभ जे आधार।
ते बिना तारण को नहीं, केम उतरिये पार ॥ टेक ॥
केवी पेरें कीजे आपणो रे, तत्व ते छे सार ।
मन मनोरथ पूरे मारा, तन नो ताप निवार ॥ 1 ॥
संभान्यो आवे रे वाहला, वेला ये अवार।
विरहणी विलाप करे, तेम दादू मन विचार ॥ 2 ॥
इति राग भांणमली सम्पूर्णः ॥ 14 ॥ पद 4 ॥

  • 414 -

राग सारंग
अथ राग सारंग 15
(गायन समय मध्य दिन)
264. गुरु ज्ञान सूर । फख्ता ताल
हो ऐसा ज्ञान ध्यान, गुरु बिना क्यों पावै ।
वार पार, पार वार, दुस्तर तिर आवै हो ।। टेक ।।
भवन गवन, गवन भवन, मन ही मन लावै ।
रवन छवन, छवन रवन, सतगुरु समझावै हो ।। 1 ।।
क्षीर नीर, नीर क्षीर, प्रेम भक्ति भावै ।
प्राण कँवल विकस विकस, गोविन्द गुण गावै हो ।। 2 ।।
ज्योति जुगति बाट घाट, लै समाधि ध्यावै ।
परम नूर परम तेज, दादू दिखलावै हो ।। 3 ।।

  • 415 -

श्री दादूवाणी-राग सारंग 15
265. केवल विनती । पंजाबी त्रिताल
तो निबहै जन सेवक तेरा, ऐसे दया कर साहिब मेरा ॥ टेक ॥
जो हम तोरैं, तो तूँ जोरै, हम तोरैं, पै तूँ नहिं तोरै ॥ 1 ॥
हम विसरैं, पै तूँ न विसारै, हम बिगरैं, पै तूँ न बिगारै ॥ 2 ॥
हम भूलैं, तूँ आन मिलावै, हम बिछुरैं, तूँ अंग लगावै ॥ 3 ॥
तुम्ह भावै सो हम पै नाँहीं, दादू दर्शन देहु गुसांईं ॥ 4 ॥
266. काल चेतावनी । पंजाबी त्रिताल
माया संसार की सब झूठी ।
मात पिता सब ऊभे भाई, तिनहिं देखतां लूटी ॥ टेक ॥
जब लग जीव काया में थारे, ख्रिण बैठी ख्रिण ऊठी ।
हंस जु था सो खेल गया रे, तब तैं संगति छूटी ॥ 1 ॥
ए दिन पूगे आयु घटानी, तब निचिन्त होइ सूती ।
दादू दास कहै ऐसी काया, जैसी गगरिया फूटी ॥ 2 ॥
267. माया मध्य मुक्ति । त्रिताल
ऐसे गृह में क्यों न रहै, मनसा वाचा राम कहै ॥ टेक ॥
संपति विपति नहीं मैं मेरा, हर्ष शोक दोउ नांही ।
राग द्वेष रहित सुख दुःख तैं, बैठा हरि पद मांही ॥ 1 ॥
तन धन माया मोह न बांधे, वैरी मीत न कोई ।
आपा पर सम रहै निरन्तर, निज जन सेवग सोई ॥ 2 ॥
सरवर कमल रहै जल जैसे, दधि मथ घृत कर लीन्हा।
जैसे वन में रहे बटाऊ, काहू हेत न कीन्हा ॥ 3 ॥
भाव भक्ति रहै रस माता, प्रेम मगन गुण गावै ।
जीवत मुक्त होइ जन दादू, अमर अभय पद पावै ॥ 4 ॥

  • 416 -

श्री दादूवाणी-राग सारंग 15
२6४. परिचय उपदेश । त्रिताल
चल-चल रे मन तहाँ जाइये । चरण बिन चालिबो,
श्रवण बिन सुनिबो, बिन कर बैन बजाइये ॥ टेक ॥
तन नाहीं जहाँ, मन नाहीं तहँ, प्राण नहीं तहँ आइये ।
शब्द नहीं जहाँ, जीव नहीं तहँ, बिन रसना मुख गाइये ॥ 1 ॥
पवन पावक नहीं, धरणी अंबर नहीं, उभय नहीं तहँ लाइये ।
चन्द नहीं जहाँ, सूर नहीं तहँ, परम ज्योति सुख पाइये ॥ 2 ॥
तेज पुंज सो सुख का सागर, झिलमिल नूर नहाइये ।
तहँ चल दादू अगम अगोचर, तामैं सहज समाइये ॥ 3 ॥
इति राग सारंग सम्पूर्णः ॥ 15 ॥ पद 5 ॥

  • 417 -

अथ राग टोडी (तोडी) 16
(गायन समय दिन 6 से 12)
269. स्मरण उपदेश । राज मृगांक ताल
सो तत सहजैं सुषमन कहणा,
साँच पकड़ मन जुग जुग रहणा ।। टेक ।।
प्रेम प्रीति कर नीका राखै, बारम्बार सहज नर भाषै ।। 1 ।।
मुख हिरदै सो सहज संभारै, तिहि तत रहणा कदे न विसारै ।। 2 ।।
अन्तर सोई नीका जाणै, निमिष न बिसरै ब्रह्म बखाणै ।। 3 ।।
सोई सुजाण सुधा रस पीवै, दादू देखि जुग जुग जीवै ।। 4 ।।
270. नाम महिमा । राज मृंगाक ताल
नाँव रे नाँव रे, नाँव रे नाँव रे,

  • 418 -

श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
सकल शिरोमणि नाँव रे, मै बलिहारी जाँव रे ॥ टेक ॥
दुस्तर तारै, पार उतारै, नरक निवारै नाँव रे ॥ 1 ॥
तारणहारा, भवजल पारा, निरमल सारा नाँव रे ॥ 2 ॥
नूर दिखावै, तेज मिलावै, ज्योति जगावै नाँव रे ॥ 3 ॥
सब कुछ दाता, अमृत राता, दादू माता नाँव रे ॥ 4 ॥
271. केवल विनती । राज विद्याधर ताल
राइ रे राइ रे, सकल भुवनपति राइ रे,
अमृत देहु अघाइ रे राइ ॥ टेक ॥
प्रगट राता, प्रगट माता, प्रगट नूर दिखाइ रेराइ ॥ 1 ॥
सुस्थिर ज्ञाना, सुस्थिर ध्याना, सुस्थिर तेज मिलाइ रेराइ ॥ 2 ॥
अविचल मेला, अविचल खेला, अविचल ज्योति समाइ रे राइ ॥ 3 ॥
निहचल बैना, निहचल नैना, दादू बलि बलि जाइ रे राइ ॥ 4 ॥
272. रसिक अवस्था । सवारी ताल
हरि रस माते मगन भये ।
सुमिर सुमिर भये मतवाले, जामण मरण सब भूल गये ॥ टेक ॥
निर्मल भक्ति प्रेम रस पीवैं, आन न दूजा भाव धरैं ।
सहजैं सदा राम रंग राते, मुक्ति वैकुंठैं कहा करैं ॥ 1 ॥
गाइ गाइ रस लीन भये हैं, कछू न मांगैं संत जना ।
और अनेक देहु दत्त आगै, आन न भावै राम बिना ॥ 2 ॥
इक टग ध्यान रहैं ल्यौ लागे, छाकि परे हरि रस पीवैं ।
दादू मगन रहैं रस माते, ऐसे हरि के जन जीवैं ॥ 3 ॥
273. (गुजराती) केवल विनती । सवारी ताल
ते मैं कीधेला राम ! जे तैं वाज्या ते ।

  • 419 -

श्री दादूवाणी-राग टोडी(तोडी) 16
मारग मेल्हि, अमारग अणसरि, अकरम, करम हरे ।। टेक ।।
साधू को संग छाड़ी नें, असंगति अणसरियो।
सुकृत मूकी, अविद्या साधी, बिषिया विस्तारियो ।। 1 ।।
आन कह्युं आन सांभल्युं, नैणैं आन दीठो।
अमृत कड़वो, विष अमी लागो, खातां अति मीठो ।। 2 ।।
राम हृदाथी विसारी नें, माया मन दीधो।
पाँचे प्राण गुरुमुख वरज्या, ते दादू कीधो ।। 3 ।।
274. विरह विनती । त्रिताल
कहो, क्यों जन जीवै सांइयां ? दे चरण-कँवल आधार हो।
डूबत है भव-सागरा, कारी करो करतार हो ।। टेक ।।
मीन मरै बिन पाणियां, तुम बिन यह विचार हो।
जल बिन कैसे जीवहीं, इब तो किती इक बार हो ।। 1 ।।
ज्यों परै पतंगा जोति में, देख देख निज सार हो।
प्यासा बूँद न पावई, तब वन-वन करै पुकार हो ।। 2 ।।
निसदिन पीर पुकार ही, तन की ताप निवार हो।
दादू विपति सुनावही, कर लोचन सन्मुख चार हो ।। 3 ।।
275. केवल विनती । त्रिताल
तूँ साचा साहिब मेरा ।
कर्म करीम कृपालु निहारो, मैं जन बंदा तेरा ।। टेक ।।
तुम्ह दीवान सबहिन की जानो, दीनानाथ दयाला।
दिखाइ दीदार मौज बंदे को, कायम करो निहाला ।। 1 ।।
मालिक सबै मुलिक के सांई, समर्थ सिरजनहारा।
खैर खुदाइ खलक में खेलत, दे दीदार तुम्हारा ।। 2 ।।
मैं शिकस्तः दरगह तेरी, हरि हजूर तूँ कहिये।

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