सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
४. पद भाग: विभिन्न रागों में रचित भक्ति, विरह एवं ज्ञान-पद संग्रह
श्री दादूवाणी-राग केदार 6
देव को दादू पार न पावै, अहो पै उन्हीं चितायो ॥ ३ ॥
इति राग केदार सम्पूर्ण ॥ ६ ॥ पद २६ ॥
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राग मारू
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अथ राग मारू 7
(गायन समय सायंकाल 6 से 9 रात्रि)
143. उपदेश । झपताल
मना ! जप राम नाम लीजे,
साधु संगति सुमिर सुमिर, रसना रस पीजै ॥ टेक ॥
साधू जन सुमिरन कर, केते जप जागे ।
अगम निगम अमर किये, काल कोइ न लागे ॥ 1 ॥
नीच ऊँच चिन्त न कर, शरणागति लीये ।
भक्ति मुक्ति अपनी गति, ऐसैं जन कीये ॥ 2 ॥
केते तिर तीर लागे, बन्धन भव छूटे ।
कलि मल विष जुग जुग के, राम नाम खूटे ॥ 3 ॥
भरम करम सब निवार, जीवन जप सोई ।
दादू दुख दूर करण, दूजा नहिं कोई ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
144. झपताल
मना, जप राम नाम कहिये ।
राम नाम मन विश्राम, संगी सो गहिये ॥ टेक॥
जाग जाग सोवे कहा, काल कंध तेरे ।
बारम्बार कर पुकार, आवत दिन नेरे ॥ 1 ॥
सोवत सोवत जन्म बीते, अजहूँ न जीव जागे ।
राम सँभार नींद निवार, जन्म जुरा लागे ॥ 2 ॥
आस पास भरम बँध्यो, नारी गृह मेरा ।
अंत काल छाड़ चल्यो, कोई नहिं तेरा ॥ 3 ॥
तज काम क्रोध मोह माया, राम राम करणा ।
जब लग जीव प्राण पिंड, दादू गहि शरणा ॥ 4 ॥
145. विरह । अङ्गुताल
क्यों विसरै मेरा पीव पियारा, जीव की जीवन प्राण हमारा ॥ टेक॥
क्यों कर जीवै मीन जल बिछुरै, तुम्ह बिन प्राण सनेही ।
चिन्तामणि जब कर तैं छूटै, तब दुख पावै देही ॥ 1 ॥
माता बालक दूध न देवै, सो कैसे कर पीवै ।
निर्धन का धन अनत भुलाना, सो कैसे कर जीवै ॥ 2 ॥
बरषहु राम सदा सुख अमृत, नीझर निर्मल धारा ।
प्रेम पियाला भर भर दीजे, दादू दास तुम्हारा ॥ 3 ॥
146. अत्यन्त विरह (गुजराती भाषा) । अङ्गुताल
कोई कहो रे मारा नाथ ने, नारी नैण निहारे बाट रे ॥ टेक॥
दीन दुखिया सुन्दरी, करुणा वचन कहे रे ।
तुम बिन नाह विरहणी व्याकुल, केम कर नाथ रहे रे ॥ 1 ॥
भूधर बिन भावे नहिं कोई, हरि बिन और न जाणे रे ।
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
देह गृह हूँ तेने आपूं, जे कोई गोविन्द आणे रे ॥ 2 ॥
जगपति ने जोवा ने काजे, आतुर थई रही रे ।
दादू ने देखाड़ो स्वामी, व्याकुल होई गई रे ॥ 3 ॥
147. विरह विलाप । पंजाबी त्रिताल
कबहुँ ऐसा विरह उपावै रे, पीव बिन देखे जीव जावै रे ॥ टेक ॥
विपति हमारी सुनहु सहेली, पीव बिन चैन न आवै रे ।
ज्यौं जल भिन्न मीन तन तलफै, पीव बिन वज्र बिहावै रे ॥ 1 ॥
ऐसी प्रीति प्रेम की लागै, ज्यौं पंखी पीव सुनावै रे ।
त्यूं मन मेरा रहै निसवासर, कोइ पीव कूं आण मिलावै रे ॥ 2 ॥
तो मन मेरा धीरजधरही, कोइ आगम आण जनावे रे ।
तो सुख जीव दादू का पावै, पल पिवजी आप दिखावे रे ॥ 3 ॥
148. (गुजराती भाषा) पंजाबी त्रिताल
अमे विरहणिया राम तुम्हारड़िया ।
तुम बिन नाथ अनाथ, कांइ बिसारड़िया ॥ टेक ॥
अपने अंग अनल परजाले, नाथ निकट नहिं आवे रे ।
दर्शन कारण विरहनि व्याकुल, और न कोई भावे रे ॥ 1 ॥
आप अपरछन अमने देखे, आपणपो न दिखाड़े रे ।
प्राणी पिंजर लेइ रह्यो रे, आड़ा अन्तर पाड़े रे ॥ 2 ॥
देव देव कर दरशन माँगे, अन्तरजामी आपे रे ।
दादू विरहणी वन वन ढूँढ़े, ये दुख कांइ न कापे रे ॥ 3 ॥
149. विरह प्रश्न । राज विद्याधर ताल
पंथीड़ा बूझै विरहणी, कहिनैं पीव की बात,
कब घरआवै कब मिलूँ, जोऊँ दिन अरु रात, पंथीड़ा ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
कहाँ मेरा प्रीतम कहाँ बसै, कहाँ रहै कर वास?
कहँ ढूँढूँ कहँ पाइये, कहाँ रहे किस पास, पंथीड़ा ॥ 1 ॥
कवन देश कहँ जाइये, कीजे कौन उपाय ?
कौन अंग कैसे रहे, कहा करै, समझाइ, पंथीड़ा ॥ 2 ॥
परम सनेही प्राण का, सो कत देहु दिखाइ ।
जीवनि मेरे जीव की, सो मुझ आनि मिलाइ, पंथीड़ा ॥ 3 ॥
नैन न आवै नींदड़ी, निशदिन तलफत जाइ ।
दादू आतुर विरहणी, क्यूं करि रैन विहाइ, पंथीड़ा ॥ 4 ॥
150. समुच्चय उत्तर । राज विद्याधर ताल
पंथीड़ा पंथ पिछाणी रे पीव का, गहि विरहै की बाट ।
जीवत मृतकह्वै चले, लंघे औघट घाट, पंथीड़ा ॥ टेक ॥
सतगुरु सिर पर राखिये, निर्मल ज्ञान विचार ।
प्रेम भक्ति कर प्रीत सौं, सन्मुख सिरजनहार, पंथीड़ा ॥ 1 ॥
पर आतम सौं आत्मा, ज्यों जल जलहि समाइ ।
मन हीं सौं मन लाइये, लै के मारग जाइ, पंथीड़ा ॥ 2 ॥
तालाबेली ऊपजै, आतुर पीड़ पुकार ।
सुमिर सनेही आपणा, निशदिन बारम्बार, पंथीड़ा ॥ 3 ॥
देखि देखि पग राखिये, मारग खांडे धार ।
मनसा वाचा कर्मणा, दादू लंघे पार, पंथीड़ा ॥ 4 ॥
151. अनुक्रम से उत्तर । राज मृगांक ताल
साध कहैं उपदेश विरहणी !
तन भूले तब पाइये, निकट भया परदेश, विरहणी ॥ टेक ॥
तुम ही माहैं ते बसैं, तहाँ रहे कर वास ।
तहँ ढूँढ़े पीव पाइये, जीवन जीव के पास, विरहणी ॥ 1 ॥
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परम देश तहँ जाइये, आतम लीन उपाइ।
एक अंग ऐसे रहै, ज्यों जल जलहि समाइ, विरहणी ॥ 2 ॥
सदा संगाती आपणा, कबहूँ दूर न जाइ।
प्राण सनेही पाइये, तन मन लेहु लगाइ, विरहणी ॥ 3 ॥
जागै जगपति देखिये, प्रकट मिल है आइ।
दादू सन्मुख ह्वै रहै, आनन्द अंग न माइ, विरहणी ॥ 4 ॥
152. विरह विनती । गुजराती मकरन्द ताल
गोविन्दा ! गाइबा दे रे,
आडड़ी आन निवार, गोविन्दा गाइबा दे रे।
अनुदिन अंतर आनन्द कीजे, भक्ति प्रेम रस सार रे ॥ टेक ॥
अनभै आत्म अभै एक रस, निर्भय कांइ न कीजै रे।
अमी महारस अमृत आपै, अम्हे रसिक रस पीजे रे ॥ 1 ॥
अविचल अमर अखै अविनाशी, ते रस कांइ न दीजे रे।
आतम राम अधार अम्हारो, जन्म सुफल कर लीजे रे ॥ 2 ॥
देव दयाल कृपाल दमोदर, प्रेम बिना क्यों रहिये रे।
दादू रंग भर राम रमाड़ो, भक्त-बछल तूँ कहिये रे ॥ 3 ॥
153. (गुजराती भाषा) । मकरन्द ताल
गोविन्दा जोइबा देरे, जे बरजे ते वारी रे । गोविन्दा जोइबा दे रे।
आदि पुरुष तूँ अच्छय अम्हारो, कंत तुम्हारी नारी रे ॥ टेक ॥
अंगै संगै रंगै रमिये, देवा दूर न कीजे रे।
रस मांही रस इम थई रहिये, ये सुख अमने दीजे रे ॥ 1 ॥
सेजड़िये सुख रंग भर रमिये, प्रेम भक्ति रस लीजे रे।
एकमेक रस केलि करतां, अम्हे अबला इम जीजे रे ॥ 2 ॥
समर्थ स्वामी अन्तरजामी, बार बार कांइ बाहे रे।
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
आदैं अन्तैं तेज तुम्हारो, दादू देखे गाये रे ॥ 3 ॥
154. (गुजराती भाषा) । शूल ताल
तुम्ह सरसी रंग रमाड़ ।
आप अपरछन थई करी, मने मा भरमाड़ ॥ टेक ॥
मन भोलवे कांइ थई वेगलो, आपणपो देखाड़ ।
केम जीवूं हौं एकली, बिरहणिया नार ॥ 1 ॥
मने बाहिश मा अलगो थई, आत्मा उद्धार ।
दादू सूं रमिये सदा, येणे परें तार ॥ 2 ॥
155. काल चेतावनी । तुरंग लील ताल
जाग रे, किस नींदड़ी सूता,
रैण बिहाई सब गई, दिन आइ पहूँता ॥ टेक ॥
सो क्यों सोवे नींदड़ी, जिस मरणा होवे रे ।
जोरा वैरी जागणा, जीव तूँ क्यों सोवे रे ॥ 1 ॥
जाके सिर पर जम खड़ा, शर सांधे मारे रे ।
सो क्यों सोवे नींदड़ी, कहि क्यूं न पुकारे रे ॥ 2 ॥
दिन प्रति निशि काल झंपै, जीव न जागे रे ।
दादू सूता नींदड़ी, उस अंग न लागे रे ॥ 3 ॥
156. तुरंग । लील ताल
जाग रे सब रैण बिहाणी, जाइ जन्म अंजलि को पाणी ॥ टेक ॥
घड़ी घड़ी घड़ियाल बजावै, जे दिन जाइ सो बहुरि न आवै ॥ 1 ॥
सूरज चंद कहैं समझाइ, दिन दिन आयु घटती जाइ ॥ 2 ॥
सरवर पाणी तरवर छाया, निशिदिन काल गिरासै काया ॥ 3 ॥
हंस बटाऊ प्राण पयाना, दादू आतम राम न जाना ॥ 4 ॥
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- चौताल
आदि काल अंत काल, मध्य काल भाई।
जन्म काल जुरा काल, काल संग सदाई ॥ टेक ॥
जागत काल सोवत काल, काल झंपै आई।
काल चलत काल फिरत, कबहूँ ले जाई ॥ 1 ॥
आवत काल जावत काल, काल कठिन खाई।
लेत काल देत काल, काल ग्रसै धाई ॥ 2 ॥
कहत काल सुनत काल, करत काल सगाई।
काम काल क्रोध काल, काल जाल छाई ॥ 3 ॥
काल आगै काल पीछैं, काल संग समाई।
काल रहित राम गहित, दादू ल्यौ लाई ॥ 4 ॥ - हित उपदेश । त्रिताल
तो को केता कह्या मन मेरे ।
क्षण इक मांही जाइ अनेरे, प्राण उधारी ले रे ॥ टेक ॥
आगे है मन खरी विमासणि, लेखा मांगै दे रे।
काहे सोवे नींद भरी रे, कृत विचारे तेरे ॥ 1 ॥
ते परि कीजे मन विचारे, राखै चरणहु नेरे।
रती इक जीवन मोहि न सूझै, दादू चेत सवेरे ॥ 2 ॥ - (गुजराती) । त्रिताल
मन वाहला रे, कछू विचारी खेल, पड़सी रे गढ़ भेल ॥ टेक ॥
बहु भाँति दुख देइगा वाहला, ज्यों तिल माँ लीजे तेल।
करणी ताहरी सोधसी रे, होसी रे सिर हेल ॥ 1 ॥
अब ही तैं कर लीजिये रे वाहला, सांई सेती मेल।
दादू संग न छाड़ि पीव का, पाई है गुण की बेल ॥ 2 ॥
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160. उदीक्षण । ताल
मन बावरे हो, अनत जनि जाइ,
तो तूँ जीवै अमीरस पीवै, अमर फल काहे न खाइ ॥ टेक ॥
रहु चरण शरण सुख पावै, देखहु नैन अघाइ।
भाग तेरे पीव नेरे, थीर थान बताइ ॥ 1 ॥
संग तेरे रहै घेरे, सहजैं अंग समाइ।
शरीर मांही शोध सांई, अनहद ध्यान लगाइ ॥ 2 ॥
पीव पास आवै सुख पावै, तन की तप्त बुझाइ।
दादू रे जहाँ नाद ऊपजै, पीव पास दिखाइ ॥ 3 ॥
161. भ्रम विध्वंसन । उदीक्षण ताल
निरंजन अंजन कीन्हा रे, सब आतम लीन्हा रे ॥ टेक ॥
अंजन माया अंजन काया, अंजन छाया रे ।
अंजन राते अंजन माते, अंजन पाया रे ॥ 1 ॥
अंजन मेरा अंजन तेरा, अंजन मेला रे ।
अंजन लीया अंजन दीया, अंजन खेला रे ॥ 2 ॥
अंजन देवा अंजन सेवा, अंजन पूजा रे ।
अंजन ज्ञाना अंजन ध्याना, अंजन दूजा रे ॥ 3 ॥
अंजन वक्ता अंजन श्रोता, अंजन भावै रे ।
अंजन राम निरंजन कीन्हा, दादू गावै रे ॥ 4 ॥
162. निज वचन । महिमा चौताल ध्रुपद में
ऐन बैन चैन होवै, सुणतां सुख लागै रे ।
तीन गुण त्रिविधि तिमिर, भरम करम भागै रे ॥ टेक ॥
होइ प्रकास अति उजास, परम तत्व सूझै ।
परम सार निर्विकार, विरला कोई बूझै ॥ 1 ॥
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परम थान सुख निधान, परम शून्य खेलै ।
सहज भाइ सुख समाइ, जीव ब्रह्म मेलै ॥ 2 ॥
अगम निगम होइ सुगम, दुस्तर तिर आवै ।
आदि पुरुष दरस परस, दादू सो पावै ॥ 3 ॥
163. साधु साँई हेरे त्रिताल
कोई राम का राता रे, कोई प्रेम का माता रे ॥ टेक ॥
कोई मन को मारे रे, कोई तन को तारे रे, कोई आप उबारे रे ॥ 1 ॥
कोई जोग जुगंता रे, कोई मोक्ष मुकंता रे, कोई है भगवंता रे ॥ 2 ॥
कोई सद्गति सारा रे, कोई तारणहारा रे, कोई पीव का प्यारा रे ॥ 3 ॥
कोई पार को पाया रे, कोई मिलकरआया रे, कोई मन को भाया रे ॥ 4 ॥
कोई है बड़भागी रे, कोई सेज सुहागी रे, कोई है अनुरागी रे ॥ 5 ॥
कोई सब सुख दाता रे, कोई रूप विधाता रे, कोई अमृत खाता रे ॥ 6 ॥
कोई नूर पिछाणैं रे, कोई तेज कों जाणैं रे, कोई ज्योति बखाणैं रे ॥ 7 ॥
कोई साहिब जैसा रे, कोई सांई तैसा रे, कोई दादू ऐसा रे ॥ 8 ॥
164. साधु लक्षण । दीपचन्दी
सद्गति साधवा रे, सन्मुख सिरजनहार ।
भौजल आप तिरैं ते तारैं, प्राण उधारनहार ॥ टेक ॥
पूरण ब्रह्म राम रंग राते, निर्मल नाम अधार ।
सुख संतोष सदा सत संजम, मति गति वार न पार ॥ 1 ॥
जुग जुग राते, जुग जुग माते, जुग जुग संगति सार ।
जुग जुग मेला, जुग जुग जीवन, जुग जुग ज्ञान विचार ॥ 2 ॥
सकल शिरोमणि सब सुख दाता, दुर्लभ इहि संसार ।
दादू हंस रहैं सुख सागर, आये पर उपकार ॥ 3 ॥
श्री दादूवाणी-राग मारू 7
165. परिचय उत्साह मंगल । दीपचन्दी
अम्ह घर पाहुणां ये, आव्या आतम राम ॥ टेक ॥
चहुँ दिशि मंगलाचार, आनन्द अति घणा ये।
वरत्या जै जैकार, विरुद वधावणां ये ॥ 1 ॥
कनक कलश रस मांहिं, सखी भर ल्यावज्यो ये।
आनन्द अंग न माइ, अम्हारे आवज्यो ये ॥ 2 ॥
भावै भक्ति अपार, सेवा कीजिये ये।
सन्मुख सिरजनहार, सदा सुख लीजिये ये ॥ 3 ॥
धन्य अम्हारा भाग, आव्या अम्ह भणी ये।
दादू सेज सुहाग, तूँ त्रिभुवन धणी ये ॥ 4 ॥
166. फरोदस्त ताल
गावहु मंगलाचार, आज बधावणां ये।
सुपनों देख्यो साँच, पीव घर आवणां ये ॥ टेक ॥
भाव कलश जल प्रेम का, सब सखियन के शीश।
गावत चली बधावणां, जै जै जै जगदीश ॥ 1 ॥
पदम कोटि रवि झिलमिलै, अंग अंग तेज अनन्त।
विगसि वदन विरहनी मिली, घर आये हरि कंत ॥ 2 ॥
सुन्दरि सुरति सिंगार कर, सन्मुख परसे पीव।
मो मंदिर मोहन आविया, वारूं तन मन जीव ॥ 3 ॥
कवल निरन्तर नरहरी, प्रकट भये भगवंत।
जहाँ विरहनी गुण वीनवे, खेले फाग बसन्त ॥ 4 ॥
वर आयो विरहनी मिली, अरस परस सब अंग।
दादू सुन्दरी सुख भया, जुगि जुगि यहु रस रंग ॥ 5 ॥
इति राग मारू सम्पूर्ण ॥ 7 ॥ पद 24 ॥
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अथ राग रामकली ४
(गायन समय प्रभात 3 से 6 )
167. सद्गुरु शब्द महिमा । दादरा
शब्द समाना जो रहै, गुरु बाइक बीधा ।
उनही लागा एक सौं, सोई जन सीधा ॥ टेक ॥
ऐसी लागी मर्म की, तन मन सब भूला ।
जीवत-मृतक है रहै, गह आत्म मूला ॥ 1 ॥
चेतन चितहि न बीसरे, महारस मीठा ।
शब्द निरंजन गह रह्या, उन साहिब दीठा ॥ 2 ॥
एक शब्द जन ऊधरे, सुनि सहजैं जागे ।
अंतर राते एक सौं, सर सन्मुख लागे ॥ 3 ॥
शब्द समाना सन्मुख रहै, पर आतम आगे ।
दादू सीझै देखतां, अविनाशी लागे ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
168. नाम महिमा । त्रिताल
अहो नर नीका है हरि नाम ।
दूजा नहीं राम बिन नीका, कहले केवल राम ॥ टेक ॥
निर्मल सदा एक अविनाशी, अजर अकल रस ऐसा ।
दिढ़ गहि राख मूल मन मांहीं, निरख देख निज कैसा ॥ 1 ॥
यहु रस मीठा महा अमीरस, अमर अनूपम पीवे ।
राता रहै प्रेम सौं माता, ऐसे जुग-जुग जीवे ॥ 2 ॥
दूजा नहीं और को ऐसा, गुरु अंजन कर सूझे ।
दादू मोटे भाग हमारे, दास विवेकी बूझे ॥ 3 ॥
169. अत्यन्त विरह । त्रिताल
कब आवेगा कब आवेगा ?
पीव प्रकट आप दिखावेगा, मिठड़ा मुझको भावेगा ॥ टेक ॥
कंठड़े लाग रहूँ रे, नैनों में बाहि धरूं रे, पीव तुझ बिन झूर मरूं रे ॥ 1 ॥
पावों मस्तक मेरा रे, तन मन पीवजी तेरा रे, हौं राखूं नैनहुं नेरा रे ॥ 2 ॥
हियड़े हेत लगाऊँ रे, अब कै जे पीव पाऊँ रे, तो बेर बेर बलि जाऊँ रे ॥ 3 ॥
सेजड़िये पीव आवे रे, तब आनन्द अंग न मावे रे, दादू दरस दिखावे रे ॥ 4 ॥
170. (सिन्धी भाषा) । मल्लिका मोद ताल
पिरी तूं पाण पसाइड़े, मूं तनि लागी भाहिड़े ॥ टेक ॥
पांधी वींदो निकरीला, असां साण गल्हाइड़े ।
सांई सिकां सड़केला, गुझी गालि सुनाइड़े ॥ 1 ॥
पसां पाक दीदार केला, सिक असां जी लाहिड़े ।
दादू मंझि कलूब मेला, तोड़े बीयां न काइड़े ॥ 2 ॥
171. (सिन्धी भाषा) । मल्लिका मोद ताल
को मेड़ीदो सज्जणा,
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सुहारी सुरति केला, लगे डीहु घणां ॥ टेक॥
पीरीयां संदी गाल्हड़ीला, पांधीड़ा पूछं ।
कड़ी ईंदो मूं गरेला, डीडों बांह असां ॥ 1 ॥
आहे सिक दीदार जीला, पिरी पूर पसां ।
इयें दादू जे ज्यंद येला, सजण सांण रहां ॥ 2 ॥
172. विनती पंजाबी । त्रिताल
हरि हाँ दिखाओ नैना,
सुन्दर मूरति मोहना, बोलि सुनाओ बैना ॥ टेक॥
प्रकट पुरातन खंडना, महीमान सुख मंडना ॥ 1 ॥
अविनाशी अपरम्परा, दीनदयाल गगन धरा ॥ 2 ॥
पारब्रह्म परिपूरणां, दर्श देहु दुख दूरणां ॥ 3 ॥
कर कृपा करुणामई, तब दादू देखे तुम दई ॥ 4 ॥
173. निस्पृहता पंजाबी । त्रिताल
राम सुख सेवक जानै रे, दूजा दुख कर माने रे ॥ टेक॥
और अग्नि की झाला, फंद रोपे हैं जम जाला ।
सम काल कठिन शर पेखें, यह सिंह रूप सब देखें ॥ 1 ॥
विष सागर लहर तरंगा, यहु ऐसा कूप भुवंगा ।
भयभीत भयानक भारी, रिपु करवत मीच विचारी ॥ 2 ॥
यहु ऐसा रूप छलावा, ठग पासीहारा आवा ।
सब ऐसा देख विचारे, ये प्राण घात बटपारे ॥ 3 ॥
ऐसा जन सेवक सोई, मन और न भावै कोई ।
हरि प्रेम मगन रंग राता, दादू राम रमै रस माता ॥ 4 ॥
174. साधु महिमा । जय मंगल ताल
आप निरंजन यों कहै, कीरति करतार ।
श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
मैं जन सेवक द्वै नहीं, एकै अंग सार ॥ टेक ॥
मम कारण सब परिहरै, आपा अभिमान ।
सदा अखंडित उर धरै, बोले भगवान ॥ 1 ॥
अन्तर पट जीवै नहीं, तब ही मर जाइ ।
बिछुरे तलफै मीन ज्यूं, जीवै जल आइ ॥ 2 ॥
क्षीर नीर ज्यूं मिल रहै, जल जलहि समान ।
आतम पाणी लौण ज्यों, दूजा नांही आन ॥ 3 ॥
मैं जन सेवक द्वै नहीं, मेरा विश्राम ।
मेरा जन मुझ सारिखा, दादू कहै राम ॥ 4 ॥
175. परिचय विनती । जय मंगल ताल
शरण तुम्हारी केशवा, मैं अनन्त सुख पाया ।
भाग बड़े तूं भेटिया, हौं चरणौं आया ॥ टेक ॥
मेरी तप्त मिटी तुम्ह देखतां, शीतल भयो भारी ।
भव बंधन मुक्ता भया, जब मिल्या मुरारी ॥ 1 ॥
भरम भेद सब भूलिया, चेतन चित लाया ।
पारस सौं परचा भया, उन सहज लखाया ॥ 2 ॥
मेरा चंचल चित निश्चल भया, अब अनत न जाई ।
मगन भया सर बेधिया, रस पीया अघाई ॥ 3 ॥
सन्मुख ह्वै तैं सुख दिया, यहु दया तुम्हारी ।
दादू दरसन पावई, पीव प्राण अधारी ॥ 4 ॥
176. परस्पर गोष्टी परिचय विनती । तिलवाड़ा ताल
गोविन्द राखो अपणी ओट ।
काम क्रोध भये बटपारे, तकि मारैं उर चोट ॥ टेक ॥
बैरी पंच सबल संग मेरे, मारग रोक रहे ।
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
काल अहेडी बधिक है लागे, ज्यूं जीव बाज गहे ॥ 1 ॥
ग्यान ध्यान हिरदै हरि लीना, संग ही घेर रहे।
समझि न परई बाप रमैया, तुम्ह बिन शूल सहे ॥ 2 ॥
शरण तुम्हारी राखो गोविन्द, इन सौं संग न दीजे।
इनके संग बहुत दुख पाया, दादू को गहि लीजे ॥ 3 ॥
177. भयमान विनती । रंगताल
राम कृपा कर होहु दयाला, दर्शन देहु करहु प्रतिपाला ॥ टेक ॥
बालक दूध न देइ माता, तो वह क्यों कर जीवै विधाता ॥ 1 ॥
गुण औगुण हरि कुछ न विचारै, अंतर हेत प्रीति कर पालै ॥ 2 ॥
अपणो जान करै प्रतिपाला, नैन निकट उर धरै गोपाला ॥ 3 ॥
दादू कहै नहीं वश मेरा, तूं माता मैं बालक तेरा ॥ 4 ॥
178 (गुजराती) विनती । त्रिताल
भक्ति मांगूं बाप भक्ति मांगूं, मूने ताहरा नांऊं नों प्रेम लाग्यो।
शिवपुर ब्रह्मपुर सर्व सौं कीजिये, अमर थावा नहींलोक मांगूं ॥ टेक ॥
आप अवलंबन ताहरा अंगनों, भक्ति संजीवनी रंग राचूं।
देहनें गेहनौं बास बैकुंठ तणौं, इन्द्र आसण नहीं मुक्ति जाचूं ॥ 1 ॥
भक्ति वाहली खरी आप अविचल हरि, निर्मलो नाउं रस पान भावे।
सिद्धि नें रिद्धि नें राज रूड़ो नहीं, देव पद माहरे काज न आवे ॥ 2 ॥
आत्मा अंतर सदा निरंतर, ताहरी बापजी भक्ति दीजे।
कहै दादू हिवे कौड़ी दत आपे, तुम्ह बिना ते म्हें नहीं लीजे ॥ 3 ॥
179. (गुजराती) राज विद्याधर ताल
एह्वो एक तूँ राम जी नाम रूड़ो।
ताहरा नाम बिना बीजो सबै ही कूड़ो ॥ टेक ॥
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
तुम्ह बिन अवर कोई कलि मां नहीं, सुमरतां संत नें साद आपे ।
कर्म कीधा कोटि छोड़वे बाँधो, नाम लेतां ख्रिणत ही ये कापे ॥ 1 ॥
संत नें सांकड़ो दुष्ट पीड़ा करे, वाहरे वाहलो वेगि आवे ।
पापनां पुंज पह्वां करी लीधो, भाजिया भै भर्म जोनि न आवे ॥ 2 ॥
साधनें दुहेलो तहाँ तूँ आकुलो, माहरो माहरो करीनें धाए ।
दुष्ट नें मारिबा संत नें तारिबा, प्रकट थावा तहाँ आप जाए ॥ 3 ॥
नाम लेतां ख्रिण नाथ तें एकले, कोटिनां कर्मनां छेद कीधा ।
कहै दादू हिवें तुम्ह बिना को नहीं, साखी बोलें जे शरण लीधा ॥ 4 ॥
180. परिचय विनती राज । विद्याधर ताल
हरि नाम देहु निरंजन तेरा, हरि हर्ष जपै जिय मेरा ॥ टेक ॥
भाव भक्ति हेत हरि दीजे, प्रेम उमंग मन आवे ।
कोमल वचन दीनता दीजे, राम रसायन भावे ॥ 1 ॥
विरह बैराग्य प्रीति मोहि दीजे, हृदय सांच सत भाखूं ।
चित चरणों चिंतामणि दीजे, अंतर दिढ़ कर राखूं ॥ 2 ॥
सहज संतोष सील सब दीजे, मन निश्चल तुम्ह लागे ।
चेतन चिंतन सदा निवासी, संग तुम्हारे जागे ॥ 3 ॥
ज्ञान ध्यान मोहन मोहि दीजे, सुरति सदा सँग तेरे ।
दीन दयाल दादू को दीजे, परम ज्योति घट मेरे ॥ 4 ॥
181. आशीर्वाद मंगल । झपताल
जय जय जय जगदीश तूँ, तूँ समर्थ सांई ।
सकल भुवन भानैं घड़ै, दूजा को नांहीं ॥ टेक ॥
काल मीच करुणा करै, जम किंकर माया ।
महा जोध बलवंत बली, भय कंपै राया ॥ 1 ॥
जरा मरण तुम तैं डरै, मन को भय भारी ।
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
काम दलन करुणामयी, तूँ देव मुरारी ॥ 2 ॥
सब कंपैं करतार तैं, भव-बंधन पाशा।
अरि रिपु भंजन भय गता, सब विघ्न विनाशा ॥ 3 ॥
सिर ऊपर सांई खड़ा, सोई हम माहीं।
दादू सेवक राम का निर्भय, न डराहीं ॥ 4 ॥
182. हितोपदेश । त्रिताल
हरि के चरण पकर मन मेरा, यहु अविनाशी घर तेरा ॥ टेक ॥
जब चरण कमल रज पावै, तब काल व्याल बौरावै।
तब त्रिविध ताप तन नाशौ, तब सुख की राशि विलासै ॥ 1 ॥
जब चरण क मल चित लागै, तब माथै मीच न जागै।
तब जनम जरा सब क्षीना, तब पद पावन उर लीना ॥ 2 ॥
जब चरण कमल रस पीवै, तब माया न व्यापै जीवै।
तब भरम करम भय भाजै, तब तीनों लोक विराजै ॥ 3 ॥
जब चरण कमल रुचि तेरी, तब चार पदारथ चेरी।
तब दादू और न बांछै, जब मन लागै सांचै ॥ 4 ॥
183. संत उपदेश । राज मृगांक ताल
संतों ! और कहो क्या कहिये ।
हम तुम्ह सीख इहै सतगुरु की, निकट राम के रहिये ॥ टेक ॥
हम तुम मांहि बसै सो स्वामी, सांचे सौं सचु लहिये।
दर्शन परसन जुग जुग कीजे, काहे को दुख सहिये ॥ 1 ॥
हम तुम संग निकट रहैं नेरे, हरि केवल कर गहिये।
चरण कमल छाड़ि कर ऐसे, अनत काहे को बहिये ॥ 2 ॥
हम तुम तारन तेज घन सुन्दर, नीके सौं निरबहिये।
दादू देख और दुख सब ही, तामें तन क्यों दहिये ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
184. मन प्रति उपदेश । राज मृगांक ताल
मन रे, बहुरि न ऐसे होई ।
पीछे फिर पछतावेगा रे, नींद भरे जनि सोई ॥ टेक ॥
आगम सारे संचु करीले, तो सुख होवै तोही ।
प्रीति करि पीव पाइये, चरणों राखो मोही ॥ 1 ॥
संसार सागर विषम अति भारी, जनि राखै मन मोही ।
दादू रे जन राम नाम सौं, कश्मल देही धोई ॥ 2 ॥
185. काल चेतावनी । भंगताल
साथी ! सावधान है रहिये ।
पलक मांहि परमेश्वर जाणै, कहा होइ कहा कहिये ॥ टेक ॥
बाबा, बाट घाट कुछ समझ न आवै, दूर गवन हम जाना ।
परदेशी पंथी चलै अकेला, औघट घाट पयाना ॥ 1 ॥
बाबा, संग न साथी कोई नहीं तेरा, यहु सब हाट पसारा ।
तरवर पंखी सबै सिधाये, तेरा कौण गँवारा ॥ 2 ॥
बाबा, सबै बटाऊ पंथ सिरानैं, सुस्थिर नांहीं कोई ।
अंति काल को आगे पीछे, बिछुरत बार न होई ॥ 3 ॥
बाबा, काची काया कौण भरोसा, रैन गई क्या सोवे ।
दादू संबल सुकृत लीजे, सावधान किन होवे ॥ 4 ॥
186. (गुजराती) तर्क चेतावनी । शूलताल
मेरा मेरा काहे को कीजे रे, जे कुछ संग न आवे ।
अनत करी नें धन धरीला रे, तेंऊ तो रीता जावे ॥ टेक ॥
माया बंधन अंध न चेते रे, मेर मांहिं लपटाया ।
ते जाणै हूँ यह बिलासौं, अनत विरोधे खाया ॥ 1 ॥
आप स्वारथ यह विलूधा रे, आगम मरम न जाणे ।
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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
जम कर माथे बाण धरीला, ते तो मन ना आणे ॥ 2 ॥
मन विचारि सारी ते लीजे, तिल मांहीं तन पड़िबा।
दादू रे तहँ तन ताड़ीजे, जेणें मारग चढ़िबा ॥ 3 ॥
187. हितोपदेश । शूलताल
सन्मुख भइला रे, तब दुख गइला रे, ते मेरे प्राण अधारी।
निराकार निरंजन देवा रे, लेवा तेह विचारी ॥ टेक ॥
अपरम्पार परम निज सोई, अलख तोर विस्तारं।
अंकुर बीजे सहज समाना रे, ऐसा समर्थ सारं ॥ 1 ॥
जे तैं किन्हा किन्हि इक चीन्हा रे, भइला ते परिमाणं।
अविगत तोरी विगति न जाणूं, मैं मूरख अयानं ॥ 2 ॥
सहजें तोरा ए मन मोरा, साधन सौं रंग आई।
दादू तोरी गति नहिं जानैं, निर्बाहो कर लाई ॥ 3 ॥
188. मन प्रति सूरतन । त्रिताल
हरि मारग मस्तक दीजिये, तब निकट परम पद लीजिये ॥ टेक ॥
इस मारग मांहीं मरणा, तिल पीछे पाँव न धरणा।
अब आगे होई सो होई, पीछे सोच न करणा कोई ॥ 1 ॥
ज्यों शूरा रण झूझै, तब आपा पर नहिं बूझै।
सिर साहिब काज संवारै, घण घावां आपा डारै ॥ 2 ॥
सती सत गहि साचा बोलै, मन निश्चल कदे न डोलै।
वाके सोच पोच जिय ना आवै, जग देखत आप जलावै ॥ 3 ॥
इस सिर सौं साटा कीजे, तब अविनाशी पद लीजे।
ताका सब सिर साबित होवे, जब दादू आपा खोवे ॥ 4 ॥
189. कलियुगी । त्रिताल
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