सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग मारू 7
देह गृह हूँ तेने आपूं, जे कोई गोविन्द आणे रे ॥ 2 ॥
जगपति ने जोवा ने काजे, आतुर थई रही रे ।
दादू ने देखाड़ो स्वामी, व्याकुल होई गई रे ॥ 3 ॥
147. विरह विलाप । पंजाबी त्रिताल
कबहुँ ऐसा विरह उपावै रे, पीव बिन देखे जीव जावै रे ॥ टेक ॥
विपति हमारी सुनहु सहेली, पीव बिन चैन न आवै रे ।
ज्यौं जल भिन्न मीन तन तलफै, पीव बिन वज्र बिहावै रे ॥ 1 ॥
ऐसी प्रीति प्रेम की लागै, ज्यौं पंखी पीव सुनावै रे ।
त्यूं मन मेरा रहै निसवासर, कोइ पीव कूं आण मिलावै रे ॥ 2 ॥
तो मन मेरा धीरजधरही, कोइ आगम आण जनावे रे ।
तो सुख जीव दादू का पावै, पल पिवजी आप दिखावे रे ॥ 3 ॥
148. (गुजराती भाषा) पंजाबी त्रिताल
अमे विरहणिया राम तुम्हारड़िया ।
तुम बिन नाथ अनाथ, कांइ बिसारड़िया ॥ टेक ॥
अपने अंग अनल परजाले, नाथ निकट नहिं आवे रे ।
दर्शन कारण विरहनि व्याकुल, और न कोई भावे रे ॥ 1 ॥
आप अपरछन अमने देखे, आपणपो न दिखाड़े रे ।
प्राणी पिंजर लेइ रह्यो रे, आड़ा अन्तर पाड़े रे ॥ 2 ॥
देव देव कर दरशन माँगे, अन्तरजामी आपे रे ।
दादू विरहणी वन वन ढूँढ़े, ये दुख कांइ न कापे रे ॥ 3 ॥
149. विरह प्रश्न । राज विद्याधर ताल
पंथीड़ा बूझै विरहणी, कहिनैं पीव की बात,
कब घरआवै कब मिलूँ, जोऊँ दिन अरु रात, पंथीड़ा ॥ टेक ॥
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