सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
- चौताल
आदि काल अंत काल, मध्य काल भाई।
जन्म काल जुरा काल, काल संग सदाई ॥ टेक ॥
जागत काल सोवत काल, काल झंपै आई।
काल चलत काल फिरत, कबहूँ ले जाई ॥ 1 ॥
आवत काल जावत काल, काल कठिन खाई।
लेत काल देत काल, काल ग्रसै धाई ॥ 2 ॥
कहत काल सुनत काल, करत काल सगाई।
काम काल क्रोध काल, काल जाल छाई ॥ 3 ॥
काल आगै काल पीछैं, काल संग समाई।
काल रहित राम गहित, दादू ल्यौ लाई ॥ 4 ॥ - हित उपदेश । त्रिताल
तो को केता कह्या मन मेरे ।
क्षण इक मांही जाइ अनेरे, प्राण उधारी ले रे ॥ टेक ॥
आगे है मन खरी विमासणि, लेखा मांगै दे रे।
काहे सोवे नींद भरी रे, कृत विचारे तेरे ॥ 1 ॥
ते परि कीजे मन विचारे, राखै चरणहु नेरे।
रती इक जीवन मोहि न सूझै, दादू चेत सवेरे ॥ 2 ॥ - (गुजराती) । त्रिताल
मन वाहला रे, कछू विचारी खेल, पड़सी रे गढ़ भेल ॥ टेक ॥
बहु भाँति दुख देइगा वाहला, ज्यों तिल माँ लीजे तेल।
करणी ताहरी सोधसी रे, होसी रे सिर हेल ॥ 1 ॥
अब ही तैं कर लीजिये रे वाहला, सांई सेती मेल।
दादू संग न छाड़ि पीव का, पाई है गुण की बेल ॥ 2 ॥
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