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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 504 में से

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पृष्ठ 368

श्री दादूवाणी-राग मारू 7

  1. चौताल
    आदि काल अंत काल, मध्य काल भाई।
    जन्म काल जुरा काल, काल संग सदाई ॥ टेक ॥
    जागत काल सोवत काल, काल झंपै आई।
    काल चलत काल फिरत, कबहूँ ले जाई ॥ 1 ॥
    आवत काल जावत काल, काल कठिन खाई।
    लेत काल देत काल, काल ग्रसै धाई ॥ 2 ॥
    कहत काल सुनत काल, करत काल सगाई।
    काम काल क्रोध काल, काल जाल छाई ॥ 3 ॥
    काल आगै काल पीछैं, काल संग समाई।
    काल रहित राम गहित, दादू ल्यौ लाई ॥ 4 ॥
  2. हित उपदेश । त्रिताल
    तो को केता कह्या मन मेरे ।
    क्षण इक मांही जाइ अनेरे, प्राण उधारी ले रे ॥ टेक ॥
    आगे है मन खरी विमासणि, लेखा मांगै दे रे।
    काहे सोवे नींद भरी रे, कृत विचारे तेरे ॥ 1 ॥
    ते परि कीजे मन विचारे, राखै चरणहु नेरे।
    रती इक जीवन मोहि न सूझै, दादू चेत सवेरे ॥ 2 ॥
  3. (गुजराती) । त्रिताल
    मन वाहला रे, कछू विचारी खेल, पड़सी रे गढ़ भेल ॥ टेक ॥
    बहु भाँति दुख देइगा वाहला, ज्यों तिल माँ लीजे तेल।
    करणी ताहरी सोधसी रे, होसी रे सिर हेल ॥ 1 ॥
    अब ही तैं कर लीजिये रे वाहला, सांई सेती मेल।
    दादू संग न छाड़ि पीव का, पाई है गुण की बेल ॥ 2 ॥
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