सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग मारू 7
165. परिचय उत्साह मंगल । दीपचन्दी
अम्ह घर पाहुणां ये, आव्या आतम राम ॥ टेक ॥
चहुँ दिशि मंगलाचार, आनन्द अति घणा ये।
वरत्या जै जैकार, विरुद वधावणां ये ॥ 1 ॥
कनक कलश रस मांहिं, सखी भर ल्यावज्यो ये।
आनन्द अंग न माइ, अम्हारे आवज्यो ये ॥ 2 ॥
भावै भक्ति अपार, सेवा कीजिये ये।
सन्मुख सिरजनहार, सदा सुख लीजिये ये ॥ 3 ॥
धन्य अम्हारा भाग, आव्या अम्ह भणी ये।
दादू सेज सुहाग, तूँ त्रिभुवन धणी ये ॥ 4 ॥
166. फरोदस्त ताल
गावहु मंगलाचार, आज बधावणां ये।
सुपनों देख्यो साँच, पीव घर आवणां ये ॥ टेक ॥
भाव कलश जल प्रेम का, सब सखियन के शीश।
गावत चली बधावणां, जै जै जै जगदीश ॥ 1 ॥
पदम कोटि रवि झिलमिलै, अंग अंग तेज अनन्त।
विगसि वदन विरहनी मिली, घर आये हरि कंत ॥ 2 ॥
सुन्दरि सुरति सिंगार कर, सन्मुख परसे पीव।
मो मंदिर मोहन आविया, वारूं तन मन जीव ॥ 3 ॥
कवल निरन्तर नरहरी, प्रकट भये भगवंत।
जहाँ विरहनी गुण वीनवे, खेले फाग बसन्त ॥ 4 ॥
वर आयो विरहनी मिली, अरस परस सब अंग।
दादू सुन्दरी सुख भया, जुगि जुगि यहु रस रंग ॥ 5 ॥
इति राग मारू सम्पूर्ण ॥ 7 ॥ पद 24 ॥
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