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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-राग केदार 6
दादू तो अपराधी तारो, नाथ उधारी लीजे रे ॥ 2 ॥
129. (गुजराती) । पंचम ताल
तूँ छे मारो राम गुसांई, पालवे तारे बाँधी रे ।
तुज बिना हूँ आंतरे र-वल्यो, कीधी कमाई लाधी रे ॥ टेक ॥
जीवूं जेटला हरि बिना रे, देहड़ी दुःखे दाधी रे ।
अेणे अवतारे कांई न जाण्यूं, माथे टक्कर खाधी रे ॥ 1 ॥
छूटको मारो क्यारे थाशे, शक्यों न राम अराधी रे ।
दादू ऊपर दया मया कर, हूँ तारो अपराधी रे ॥ 2 ॥
130. (गुजराती) विनती । पंचमताल
तूँ ही तूँ तनि माहरे गुसांई, तूँ बिना तूँ केने कहूँ रे ।
तूँ त्यां तूँ ही थई रह्यो रे, शरण तुम्हारी जाय रहूँ रे ॥ टेक ॥
तन मन मांहि जोइये त्यां तूँ, तुज दीठां हौं सुख लहूँ रे ।
तूँ त्यां जेटली दूर रहूँ रे, तेम तेम त्यां हौं दुःख सहूँ रे ॥ 1 ॥
तुम बिन माहरो कोई नहीं रे, हौं तो ताहरा वैण बहूँ रे ।
दादू रे जण हरि गुण गाता, मैं मेलूँ माहरो मैं हूँ रे ॥ 2 ॥
131. केवल विनती । त्रिताल
हमारे तुम ही हो रखपाल ।
तुम बिन और नहीं को मेरे, भव-दुख मेटणहार ॥ टेक ॥
वैरी पंच निमष नहिं न्यारे, रोक रहे जम काल ।
हा जगदीश ! दास दुख पावै, स्वामी करहु सँभाल ॥ 1 ॥
तुम्ह बिन राम दहैं ये द्वन्दर, दसौं दिशा सब साल ।
देखत दीन दुखी क्यों कीजे, तुम हो दीन-दयाल ॥ 2 ॥
निर्भय नाम हेत हरि दीजे, दर्शन पर्सन लाल ।

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श्री दादूवाणी-राग केदार 6
दादू दीन लीन कर लीजे, मेटहु सब जंजाल ॥ 3 ॥
132. विनती । त्रिताल
ये मन माधो बरजि बरजि ।
अति गति विषिया सौं रत, उठत जु गरजि गरजि ॥ टेक ॥
विषय विलास अधिक अति आतुर, विलसत शंक न मानैं ।
खाइ हलाहल मगन माया में, विष अमृत कर जानैं ॥ 1 ॥
पंचन के संग बहत चहूँ दिशि, उलट न क बहूँ आवै ।
जहाँ जहाँ काल ये जाइ तहँ तहँ, मृग जल ज्यों मन धावै ॥ 2 ॥
साध कहैं गुरु ज्ञान न मानै, भाव भजन न तुम्हारा ।
दादू के तुम सजन सहाई, कछू न बसाइ हमारा ॥ 3 ॥
133. मन उपदेश । पंचम ताल
हां, हमारे जियरा !
राम गुण गाइ, एही वचन विचारी मान ॥ टेक ॥
केती कहूँ मन कारणैं, तूं छाड़ि रे अभिमान ।
कह समझाऊँ बेर-बेर, तुझ अजहुँ न आवै ज्ञान ॥ 1 ॥
ऐसा संग कहाँ पाइये, गुण गावत आवै तान ।
चरणों सौं चित राखिये, निसदिन हरि को ध्यान ॥ 2 ॥
वे भी लेखा देहिंगे, आप कहावैं खान ।
जन दादू रे गुण गाइये, पूरण है निर्वाण ॥ 3 ॥
134. काल चेतावनी । पंचम ताल
बटाऊ ! चलना आज कि काल ।
समझि न देखे कहा सुख सोवे, रे मन राम संभाल ॥ टेक ॥
जैसे तरुवर वृक्ष बसेरा, पंखी बैठे आइ ।

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श्री दादूवाणी-राग केदार 6
ऐसैं यहु सब हाट पसारा, आप आपको जाइ ॥ 1 ॥
कोइ नहिं तेरा सजन संगाती, जनि खोवे मन मूल ।
यहु संसार देखि जनि भूलै, सब ही सैंबल फूल ॥ 2 ॥
तन नहिं तेरा धन नहिं तेरा, कहा रह्यो इहि लाग ।
दादू हरि बिन क्यों सुख सोवे, काहे न देखे जाग ॥ 3 ॥
135. तर्क चेतावनी । प्रतिपाल
जात कत मद को मातो रे ।
तन धन जोबन देख गर्वानो, माया रातो रे ॥ टेक ॥
अपनो हि रूप नैन भर देखै, कामिनी को संग भावै रे ।
बारम्बार विषय रत मानैं, मरबो चित्त न आवै रे ॥ 1 ॥
मैं बड़ आगे और न आवे, करत केत अभिमाना रे ।
मेरी मेरी करि करि फूल्यो, माया मोह भुलानां रे ॥ 2 ॥
मैं मैं करत जन्म सब खोयो, काल सिरहाणे आयो रे ।
दादू देख मूढ़ नर प्राणी, हरि बिन जन्म गँवायो रे ॥ 3 ॥
136. हितोपदेश । त्रिताल
जागत को कदे न मूसै कोई ।
जागत जान जतन कर राखै, चोर न लागू होई ॥ टेक ॥
सोवत साह वस्तु नहिं पावे, चोर मूसै घर घेरा ।
आस पास पहरे को नाहीं, वस्ते कीन नबेरा ॥ 1 ॥
पीछे कहु क्या जागे होई, वस्तु हाथ तैं जाई ।
बीती रैन बहुरि नहिं आवै, तब क्या करि है भाई ॥ 2 ॥
पहले ही पहरे जे जागै, वस्तु कछू नहिं छीजे ।
दादू जुगति जान कर ऐसी, करना है सो कीजे ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग केदार 6
137. उपदेश । त्रिताल
सजनी ! रजनी घटती जाइ ।
पल पल छीजै अवधि दिन आवै, अपनो लाल मनाइ ॥ टेक॥
अति गति नींद कहा सुख सोवै, यहु अवसर चलि जाइ ।
यहु तन विछुरैं बहुरि कहँ पावै, पीछे ही पछिताइ ॥ 1 ॥
प्राण-पति जागे सुन्दरि क्यों सोवे, उठ आतुर गहि पाइ ।
कोमल वचन करुणा कर आगे, नख शिख रहु लपटाइ ॥ 2 ॥
सखी सुहाग सेज सुख पावै, प्रीतम प्रेम बढ़ाइ ।
दादू भाग बड़े पीव पावै, सकल शिरोमणि राइ ॥ 3 ॥
138. प्रश्न उत्तर । दादरा
कोई जानै रे, मर्म माधइये केरो ?
कैसे रहे ? करे का ? सजनी प्राण मेरो ॥ टेक॥
कौन विनोद करत री सजनी, कवननि संग बसेरो ?
संत साधु गम आये उनके, करत जु प्रेम घणेरो ॥ 1 ॥
कहाँ निवास ? वास कहँ ? सजनी गवन तेरो ।
घट घट मांहि रहै निरन्तर, ये दादू नेरो ॥ 2 ॥
139. विरह विनती । त्रिताल
मन वैरागी राम को, संगि रहै सुख होइ हो ॥ टेक॥
हरि कारण मन जोगिया, क्योंहि मिलै मुझ सोइ ।
निरखण का मोहि चाव है, क्यों आप दिखावै मोहि हो ॥ 1 ॥
हिरदै में हरि आव तूँ, मुख देखूं मन धोहि ।
तन मन में तूँ ही बसै, दया न आवै तोहि हो ॥ 2 ॥
निरखण का मोहि चाव है, ये दुख मेरा खोइ ।
दादू तुम्हारा दास है, नैन देखन को रोइ हो ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-राग केदार 6
140. (गुजराती) अधीर उलाहन । त्रिताल
धरणीधर बाह्या धूतो रे, अंग परस नहिं आपे रे ।
कह्यो अमारो कांई न माने, मन भावे ते थापे रे ॥ टेक ॥
वाही वाही ने सर्वस लीधो, अबला कोइ न जाणे रे ।
अलगो रहे येणी परि तेड़े, आपणड़े घर आणे रे ॥ 1 ॥
रमी रमी रे राम रजावी, केन्हों अंत न दीधो रे ।
गोप्य गुह्य ते कोई न जाणै, एह्वो अचरज कीधो रे ॥ 2 ॥
माता बालक रुदन करतां, वाही वाही ने राखे रे ।
जेवो छे तेवो आपणपो, दादू ते नहिं दाखै रे ॥ 3 ॥
141. समर्थाई । राजमृगांक ताल
सिरजनहार तैं सब होइ ।
उत्पत्ति परलै करै आपै, दूसर नांहीं कोइ ॥ टेक ॥
आप होइ कुलाल करता, बूँद तैं सब लोइ ।
आप कर अगोचर बैठा, दुनी मन को मोहि ॥ 1 ॥
आप तैं उपाइ बाजी, निरखि देखै सोइ ।
बाजीगर को यहु भेद आवै, सहज साँज समोइ ॥ 2 ॥
जे कुछ किया सु करै आपै, येह उपजै मोहि ।
दादू रे हरि नाम सेती, मैल कश्मल धोइ ॥ 3 ॥
142. परिचय । राजमृगांक ताल
देहुरे मंझे देव पायो, वस्तु अगोचर लखायो ॥ टेक ॥
अति अनूप ज्योति-पति, सोई अन्तर आयो ।
पिंड ब्रह्माण्ड सम, तुल्य दिखायो ॥ 1 ॥
सदा प्रकाश निवास निरंतर, सब घट मांहि समायो ।
नैन निरख नेरो, हिरदै हेत लायो ॥ 2 ॥
पूरव भाग सुहाग सेज सुख, सो हरि लैन पठायो ।

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४. पद भाग: विभिन्न रागों में रचित भक्ति, विरह एवं ज्ञान-पद संग्रह

श्री दादूवाणी-राग केदार 6
देव को दादू पार न पावै, अहो पै उन्हीं चितायो ॥ ३ ॥
इति राग केदार सम्पूर्ण ॥ ६ ॥ पद २६ ॥

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राग मारू
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अथ राग मारू 7
(गायन समय सायंकाल 6 से 9 रात्रि)
143. उपदेश । झपताल
मना ! जप राम नाम लीजे,
साधु संगति सुमिर सुमिर, रसना रस पीजै ॥ टेक ॥
साधू जन सुमिरन कर, केते जप जागे ।
अगम निगम अमर किये, काल कोइ न लागे ॥ 1 ॥
नीच ऊँच चिन्त न कर, शरणागति लीये ।
भक्ति मुक्ति अपनी गति, ऐसैं जन कीये ॥ 2 ॥
केते तिर तीर लागे, बन्धन भव छूटे ।
कलि मल विष जुग जुग के, राम नाम खूटे ॥ 3 ॥
भरम करम सब निवार, जीवन जप सोई ।
दादू दुख दूर करण, दूजा नहिं कोई ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
144. झपताल
मना, जप राम नाम कहिये ।
राम नाम मन विश्राम, संगी सो गहिये ॥ टेक॥
जाग जाग सोवे कहा, काल कंध तेरे ।
बारम्बार कर पुकार, आवत दिन नेरे ॥ 1 ॥
सोवत सोवत जन्म बीते, अजहूँ न जीव जागे ।
राम सँभार नींद निवार, जन्म जुरा लागे ॥ 2 ॥
आस पास भरम बँध्यो, नारी गृह मेरा ।
अंत काल छाड़ चल्यो, कोई नहिं तेरा ॥ 3 ॥
तज काम क्रोध मोह माया, राम राम करणा ।
जब लग जीव प्राण पिंड, दादू गहि शरणा ॥ 4 ॥
145. विरह । अङ्गुताल
क्यों विसरै मेरा पीव पियारा, जीव की जीवन प्राण हमारा ॥ टेक॥
क्यों कर जीवै मीन जल बिछुरै, तुम्ह बिन प्राण सनेही ।
चिन्तामणि जब कर तैं छूटै, तब दुख पावै देही ॥ 1 ॥
माता बालक दूध न देवै, सो कैसे कर पीवै ।
निर्धन का धन अनत भुलाना, सो कैसे कर जीवै ॥ 2 ॥
बरषहु राम सदा सुख अमृत, नीझर निर्मल धारा ।
प्रेम पियाला भर भर दीजे, दादू दास तुम्हारा ॥ 3 ॥
146. अत्यन्त विरह (गुजराती भाषा) । अङ्गुताल
कोई कहो रे मारा नाथ ने, नारी नैण निहारे बाट रे ॥ टेक॥
दीन दुखिया सुन्दरी, करुणा वचन कहे रे ।
तुम बिन नाह विरहणी व्याकुल, केम कर नाथ रहे रे ॥ 1 ॥
भूधर बिन भावे नहिं कोई, हरि बिन और न जाणे रे ।

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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
देह गृह हूँ तेने आपूं, जे कोई गोविन्द आणे रे ॥ 2 ॥
जगपति ने जोवा ने काजे, आतुर थई रही रे ।
दादू ने देखाड़ो स्वामी, व्याकुल होई गई रे ॥ 3 ॥
147. विरह विलाप । पंजाबी त्रिताल
कबहुँ ऐसा विरह उपावै रे, पीव बिन देखे जीव जावै रे ॥ टेक ॥
विपति हमारी सुनहु सहेली, पीव बिन चैन न आवै रे ।
ज्यौं जल भिन्न मीन तन तलफै, पीव बिन वज्र बिहावै रे ॥ 1 ॥
ऐसी प्रीति प्रेम की लागै, ज्यौं पंखी पीव सुनावै रे ।
त्यूं मन मेरा रहै निसवासर, कोइ पीव कूं आण मिलावै रे ॥ 2 ॥
तो मन मेरा धीरजधरही, कोइ आगम आण जनावे रे ।
तो सुख जीव दादू का पावै, पल पिवजी आप दिखावे रे ॥ 3 ॥
148. (गुजराती भाषा) पंजाबी त्रिताल
अमे विरहणिया राम तुम्हारड़िया ।
तुम बिन नाथ अनाथ, कांइ बिसारड़िया ॥ टेक ॥
अपने अंग अनल परजाले, नाथ निकट नहिं आवे रे ।
दर्शन कारण विरहनि व्याकुल, और न कोई भावे रे ॥ 1 ॥
आप अपरछन अमने देखे, आपणपो न दिखाड़े रे ।
प्राणी पिंजर लेइ रह्यो रे, आड़ा अन्तर पाड़े रे ॥ 2 ॥
देव देव कर दरशन माँगे, अन्तरजामी आपे रे ।
दादू विरहणी वन वन ढूँढ़े, ये दुख कांइ न कापे रे ॥ 3 ॥
149. विरह प्रश्न । राज विद्याधर ताल
पंथीड़ा बूझै विरहणी, कहिनैं पीव की बात,
कब घरआवै कब मिलूँ, जोऊँ दिन अरु रात, पंथीड़ा ॥ टेक ॥

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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
कहाँ मेरा प्रीतम कहाँ बसै, कहाँ रहै कर वास?
कहँ ढूँढूँ कहँ पाइये, कहाँ रहे किस पास, पंथीड़ा ॥ 1 ॥
कवन देश कहँ जाइये, कीजे कौन उपाय ?
कौन अंग कैसे रहे, कहा करै, समझाइ, पंथीड़ा ॥ 2 ॥
परम सनेही प्राण का, सो कत देहु दिखाइ ।
जीवनि मेरे जीव की, सो मुझ आनि मिलाइ, पंथीड़ा ॥ 3 ॥
नैन न आवै नींदड़ी, निशदिन तलफत जाइ ।
दादू आतुर विरहणी, क्यूं करि रैन विहाइ, पंथीड़ा ॥ 4 ॥
150. समुच्चय उत्तर । राज विद्याधर ताल
पंथीड़ा पंथ पिछाणी रे पीव का, गहि विरहै की बाट ।
जीवत मृतकह्वै चले, लंघे औघट घाट, पंथीड़ा ॥ टेक ॥
सतगुरु सिर पर राखिये, निर्मल ज्ञान विचार ।
प्रेम भक्ति कर प्रीत सौं, सन्मुख सिरजनहार, पंथीड़ा ॥ 1 ॥
पर आतम सौं आत्मा, ज्यों जल जलहि समाइ ।
मन हीं सौं मन लाइये, लै के मारग जाइ, पंथीड़ा ॥ 2 ॥
तालाबेली ऊपजै, आतुर पीड़ पुकार ।
सुमिर सनेही आपणा, निशदिन बारम्बार, पंथीड़ा ॥ 3 ॥
देखि देखि पग राखिये, मारग खांडे धार ।
मनसा वाचा कर्मणा, दादू लंघे पार, पंथीड़ा ॥ 4 ॥
151. अनुक्रम से उत्तर । राज मृगांक ताल
साध कहैं उपदेश विरहणी !
तन भूले तब पाइये, निकट भया परदेश, विरहणी ॥ टेक ॥
तुम ही माहैं ते बसैं, तहाँ रहे कर वास ।
तहँ ढूँढ़े पीव पाइये, जीवन जीव के पास, विरहणी ॥ 1 ॥

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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
परम देश तहँ जाइये, आतम लीन उपाइ।
एक अंग ऐसे रहै, ज्यों जल जलहि समाइ, विरहणी ॥ 2 ॥
सदा संगाती आपणा, कबहूँ दूर न जाइ।
प्राण सनेही पाइये, तन मन लेहु लगाइ, विरहणी ॥ 3 ॥
जागै जगपति देखिये, प्रकट मिल है आइ।
दादू सन्मुख ह्वै रहै, आनन्द अंग न माइ, विरहणी ॥ 4 ॥
152. विरह विनती । गुजराती मकरन्द ताल
गोविन्दा ! गाइबा दे रे,
आडड़ी आन निवार, गोविन्दा गाइबा दे रे।
अनुदिन अंतर आनन्द कीजे, भक्ति प्रेम रस सार रे ॥ टेक ॥
अनभै आत्म अभै एक रस, निर्भय कांइ न कीजै रे।
अमी महारस अमृत आपै, अम्हे रसिक रस पीजे रे ॥ 1 ॥
अविचल अमर अखै अविनाशी, ते रस कांइ न दीजे रे।
आतम राम अधार अम्हारो, जन्म सुफल कर लीजे रे ॥ 2 ॥
देव दयाल कृपाल दमोदर, प्रेम बिना क्यों रहिये रे।
दादू रंग भर राम रमाड़ो, भक्त-बछल तूँ कहिये रे ॥ 3 ॥
153. (गुजराती भाषा) । मकरन्द ताल
गोविन्दा जोइबा देरे, जे बरजे ते वारी रे । गोविन्दा जोइबा दे रे।
आदि पुरुष तूँ अच्छय अम्हारो, कंत तुम्हारी नारी रे ॥ टेक ॥
अंगै संगै रंगै रमिये, देवा दूर न कीजे रे।
रस मांही रस इम थई रहिये, ये सुख अमने दीजे रे ॥ 1 ॥
सेजड़िये सुख रंग भर रमिये, प्रेम भक्ति रस लीजे रे।
एकमेक रस केलि करतां, अम्हे अबला इम जीजे रे ॥ 2 ॥
समर्थ स्वामी अन्तरजामी, बार बार कांइ बाहे रे।

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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
आदैं अन्तैं तेज तुम्हारो, दादू देखे गाये रे ॥ 3 ॥
154. (गुजराती भाषा) । शूल ताल
तुम्ह सरसी रंग रमाड़ ।
आप अपरछन थई करी, मने मा भरमाड़ ॥ टेक ॥
मन भोलवे कांइ थई वेगलो, आपणपो देखाड़ ।
केम जीवूं हौं एकली, बिरहणिया नार ॥ 1 ॥
मने बाहिश मा अलगो थई, आत्मा उद्धार ।
दादू सूं रमिये सदा, येणे परें तार ॥ 2 ॥
155. काल चेतावनी । तुरंग लील ताल
जाग रे, किस नींदड़ी सूता,
रैण बिहाई सब गई, दिन आइ पहूँता ॥ टेक ॥
सो क्यों सोवे नींदड़ी, जिस मरणा होवे रे ।
जोरा वैरी जागणा, जीव तूँ क्यों सोवे रे ॥ 1 ॥
जाके सिर पर जम खड़ा, शर सांधे मारे रे ।
सो क्यों सोवे नींदड़ी, कहि क्यूं न पुकारे रे ॥ 2 ॥
दिन प्रति निशि काल झंपै, जीव न जागे रे ।
दादू सूता नींदड़ी, उस अंग न लागे रे ॥ 3 ॥
156. तुरंग । लील ताल
जाग रे सब रैण बिहाणी, जाइ जन्म अंजलि को पाणी ॥ टेक ॥
घड़ी घड़ी घड़ियाल बजावै, जे दिन जाइ सो बहुरि न आवै ॥ 1 ॥
सूरज चंद कहैं समझाइ, दिन दिन आयु घटती जाइ ॥ 2 ॥
सरवर पाणी तरवर छाया, निशिदिन काल गिरासै काया ॥ 3 ॥
हंस बटाऊ प्राण पयाना, दादू आतम राम न जाना ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग मारू 7

  1. चौताल
    आदि काल अंत काल, मध्य काल भाई।
    जन्म काल जुरा काल, काल संग सदाई ॥ टेक ॥
    जागत काल सोवत काल, काल झंपै आई।
    काल चलत काल फिरत, कबहूँ ले जाई ॥ 1 ॥
    आवत काल जावत काल, काल कठिन खाई।
    लेत काल देत काल, काल ग्रसै धाई ॥ 2 ॥
    कहत काल सुनत काल, करत काल सगाई।
    काम काल क्रोध काल, काल जाल छाई ॥ 3 ॥
    काल आगै काल पीछैं, काल संग समाई।
    काल रहित राम गहित, दादू ल्यौ लाई ॥ 4 ॥
  2. हित उपदेश । त्रिताल
    तो को केता कह्या मन मेरे ।
    क्षण इक मांही जाइ अनेरे, प्राण उधारी ले रे ॥ टेक ॥
    आगे है मन खरी विमासणि, लेखा मांगै दे रे।
    काहे सोवे नींद भरी रे, कृत विचारे तेरे ॥ 1 ॥
    ते परि कीजे मन विचारे, राखै चरणहु नेरे।
    रती इक जीवन मोहि न सूझै, दादू चेत सवेरे ॥ 2 ॥
  3. (गुजराती) । त्रिताल
    मन वाहला रे, कछू विचारी खेल, पड़सी रे गढ़ भेल ॥ टेक ॥
    बहु भाँति दुख देइगा वाहला, ज्यों तिल माँ लीजे तेल।
    करणी ताहरी सोधसी रे, होसी रे सिर हेल ॥ 1 ॥
    अब ही तैं कर लीजिये रे वाहला, सांई सेती मेल।
    दादू संग न छाड़ि पीव का, पाई है गुण की बेल ॥ 2 ॥
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श्री दादूवाणी-राग मारू 7
160. उदीक्षण । ताल
मन बावरे हो, अनत जनि जाइ,
तो तूँ जीवै अमीरस पीवै, अमर फल काहे न खाइ ॥ टेक ॥
रहु चरण शरण सुख पावै, देखहु नैन अघाइ।
भाग तेरे पीव नेरे, थीर थान बताइ ॥ 1 ॥
संग तेरे रहै घेरे, सहजैं अंग समाइ।
शरीर मांही शोध सांई, अनहद ध्यान लगाइ ॥ 2 ॥
पीव पास आवै सुख पावै, तन की तप्त बुझाइ।
दादू रे जहाँ नाद ऊपजै, पीव पास दिखाइ ॥ 3 ॥
161. भ्रम विध्वंसन । उदीक्षण ताल
निरंजन अंजन कीन्हा रे, सब आतम लीन्हा रे ॥ टेक ॥
अंजन माया अंजन काया, अंजन छाया रे ।
अंजन राते अंजन माते, अंजन पाया रे ॥ 1 ॥
अंजन मेरा अंजन तेरा, अंजन मेला रे ।
अंजन लीया अंजन दीया, अंजन खेला रे ॥ 2 ॥
अंजन देवा अंजन सेवा, अंजन पूजा रे ।
अंजन ज्ञाना अंजन ध्याना, अंजन दूजा रे ॥ 3 ॥
अंजन वक्ता अंजन श्रोता, अंजन भावै रे ।
अंजन राम निरंजन कीन्हा, दादू गावै रे ॥ 4 ॥
162. निज वचन । महिमा चौताल ध्रुपद में
ऐन बैन चैन होवै, सुणतां सुख लागै रे ।
तीन गुण त्रिविधि तिमिर, भरम करम भागै रे ॥ टेक ॥
होइ प्रकास अति उजास, परम तत्व सूझै ।
परम सार निर्विकार, विरला कोई बूझै ॥ 1 ॥

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परम थान सुख निधान, परम शून्य खेलै ।
सहज भाइ सुख समाइ, जीव ब्रह्म मेलै ॥ 2 ॥
अगम निगम होइ सुगम, दुस्तर तिर आवै ।
आदि पुरुष दरस परस, दादू सो पावै ॥ 3 ॥
163. साधु साँई हेरे त्रिताल
कोई राम का राता रे, कोई प्रेम का माता रे ॥ टेक ॥
कोई मन को मारे रे, कोई तन को तारे रे, कोई आप उबारे रे ॥ 1 ॥
कोई जोग जुगंता रे, कोई मोक्ष मुकंता रे, कोई है भगवंता रे ॥ 2 ॥
कोई सद्गति सारा रे, कोई तारणहारा रे, कोई पीव का प्यारा रे ॥ 3 ॥
कोई पार को पाया रे, कोई मिलकरआया रे, कोई मन को भाया रे ॥ 4 ॥
कोई है बड़भागी रे, कोई सेज सुहागी रे, कोई है अनुरागी रे ॥ 5 ॥
कोई सब सुख दाता रे, कोई रूप विधाता रे, कोई अमृत खाता रे ॥ 6 ॥
कोई नूर पिछाणैं रे, कोई तेज कों जाणैं रे, कोई ज्योति बखाणैं रे ॥ 7 ॥
कोई साहिब जैसा रे, कोई सांई तैसा रे, कोई दादू ऐसा रे ॥ 8 ॥
164. साधु लक्षण । दीपचन्दी
सद्गति साधवा रे, सन्मुख सिरजनहार ।
भौजल आप तिरैं ते तारैं, प्राण उधारनहार ॥ टेक ॥
पूरण ब्रह्म राम रंग राते, निर्मल नाम अधार ।
सुख संतोष सदा सत संजम, मति गति वार न पार ॥ 1 ॥
जुग जुग राते, जुग जुग माते, जुग जुग संगति सार ।
जुग जुग मेला, जुग जुग जीवन, जुग जुग ज्ञान विचार ॥ 2 ॥
सकल शिरोमणि सब सुख दाता, दुर्लभ इहि संसार ।
दादू हंस रहैं सुख सागर, आये पर उपकार ॥ 3 ॥

श्री दादूवाणी-राग मारू 7
165. परिचय उत्साह मंगल । दीपचन्दी
अम्ह घर पाहुणां ये, आव्या आतम राम ॥ टेक ॥
चहुँ दिशि मंगलाचार, आनन्द अति घणा ये।
वरत्या जै जैकार, विरुद वधावणां ये ॥ 1 ॥
कनक कलश रस मांहिं, सखी भर ल्यावज्यो ये।
आनन्द अंग न माइ, अम्हारे आवज्यो ये ॥ 2 ॥
भावै भक्ति अपार, सेवा कीजिये ये।
सन्मुख सिरजनहार, सदा सुख लीजिये ये ॥ 3 ॥
धन्य अम्हारा भाग, आव्या अम्ह भणी ये।
दादू सेज सुहाग, तूँ त्रिभुवन धणी ये ॥ 4 ॥
166. फरोदस्त ताल
गावहु मंगलाचार, आज बधावणां ये।
सुपनों देख्यो साँच, पीव घर आवणां ये ॥ टेक ॥
भाव कलश जल प्रेम का, सब सखियन के शीश।
गावत चली बधावणां, जै जै जै जगदीश ॥ 1 ॥
पदम कोटि रवि झिलमिलै, अंग अंग तेज अनन्त।
विगसि वदन विरहनी मिली, घर आये हरि कंत ॥ 2 ॥
सुन्दरि सुरति सिंगार कर, सन्मुख परसे पीव।
मो मंदिर मोहन आविया, वारूं तन मन जीव ॥ 3 ॥
कवल निरन्तर नरहरी, प्रकट भये भगवंत।
जहाँ विरहनी गुण वीनवे, खेले फाग बसन्त ॥ 4 ॥
वर आयो विरहनी मिली, अरस परस सब अंग।
दादू सुन्दरी सुख भया, जुगि जुगि यहु रस रंग ॥ 5 ॥
इति राग मारू सम्पूर्ण ॥ 7 ॥ पद 24 ॥

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अथ राग रामकली ४
(गायन समय प्रभात 3 से 6 )
167. सद्गुरु शब्द महिमा । दादरा
शब्द समाना जो रहै, गुरु बाइक बीधा ।
उनही लागा एक सौं, सोई जन सीधा ॥ टेक ॥
ऐसी लागी मर्म की, तन मन सब भूला ।
जीवत-मृतक है रहै, गह आत्म मूला ॥ 1 ॥
चेतन चितहि न बीसरे, महारस मीठा ।
शब्द निरंजन गह रह्या, उन साहिब दीठा ॥ 2 ॥
एक शब्द जन ऊधरे, सुनि सहजैं जागे ।
अंतर राते एक सौं, सर सन्मुख लागे ॥ 3 ॥
शब्द समाना सन्मुख रहै, पर आतम आगे ।
दादू सीझै देखतां, अविनाशी लागे ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8
168. नाम महिमा । त्रिताल
अहो नर नीका है हरि नाम ।
दूजा नहीं राम बिन नीका, कहले केवल राम ॥ टेक ॥
निर्मल सदा एक अविनाशी, अजर अकल रस ऐसा ।
दिढ़ गहि राख मूल मन मांहीं, निरख देख निज कैसा ॥ 1 ॥
यहु रस मीठा महा अमीरस, अमर अनूपम पीवे ।
राता रहै प्रेम सौं माता, ऐसे जुग-जुग जीवे ॥ 2 ॥
दूजा नहीं और को ऐसा, गुरु अंजन कर सूझे ।
दादू मोटे भाग हमारे, दास विवेकी बूझे ॥ 3 ॥
169. अत्यन्त विरह । त्रिताल
कब आवेगा कब आवेगा ?
पीव प्रकट आप दिखावेगा, मिठड़ा मुझको भावेगा ॥ टेक ॥
कंठड़े लाग रहूँ रे, नैनों में बाहि धरूं रे, पीव तुझ बिन झूर मरूं रे ॥ 1 ॥
पावों मस्तक मेरा रे, तन मन पीवजी तेरा रे, हौं राखूं नैनहुं नेरा रे ॥ 2 ॥
हियड़े हेत लगाऊँ रे, अब कै जे पीव पाऊँ रे, तो बेर बेर बलि जाऊँ रे ॥ 3 ॥
सेजड़िये पीव आवे रे, तब आनन्द अंग न मावे रे, दादू दरस दिखावे रे ॥ 4 ॥
170. (सिन्धी भाषा) । मल्लिका मोद ताल
पिरी तूं पाण पसाइड़े, मूं तनि लागी भाहिड़े ॥ टेक ॥
पांधी वींदो निकरीला, असां साण गल्हाइड़े ।
सांई सिकां सड़केला, गुझी गालि सुनाइड़े ॥ 1 ॥
पसां पाक दीदार केला, सिक असां जी लाहिड़े ।
दादू मंझि कलूब मेला, तोड़े बीयां न काइड़े ॥ 2 ॥
171. (सिन्धी भाषा) । मल्लिका मोद ताल
को मेड़ीदो सज्जणा,

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सुहारी सुरति केला, लगे डीहु घणां ॥ टेक॥
पीरीयां संदी गाल्हड़ीला, पांधीड़ा पूछं ।
कड़ी ईंदो मूं गरेला, डीडों बांह असां ॥ 1 ॥
आहे सिक दीदार जीला, पिरी पूर पसां ।
इयें दादू जे ज्यंद येला, सजण सांण रहां ॥ 2 ॥
172. विनती पंजाबी । त्रिताल
हरि हाँ दिखाओ नैना,
सुन्दर मूरति मोहना, बोलि सुनाओ बैना ॥ टेक॥
प्रकट पुरातन खंडना, महीमान सुख मंडना ॥ 1 ॥
अविनाशी अपरम्परा, दीनदयाल गगन धरा ॥ 2 ॥
पारब्रह्म परिपूरणां, दर्श देहु दुख दूरणां ॥ 3 ॥
कर कृपा करुणामई, तब दादू देखे तुम दई ॥ 4 ॥
173. निस्पृहता पंजाबी । त्रिताल
राम सुख सेवक जानै रे, दूजा दुख कर माने रे ॥ टेक॥
और अग्नि की झाला, फंद रोपे हैं जम जाला ।
सम काल कठिन शर पेखें, यह सिंह रूप सब देखें ॥ 1 ॥
विष सागर लहर तरंगा, यहु ऐसा कूप भुवंगा ।
भयभीत भयानक भारी, रिपु करवत मीच विचारी ॥ 2 ॥
यहु ऐसा रूप छलावा, ठग पासीहारा आवा ।
सब ऐसा देख विचारे, ये प्राण घात बटपारे ॥ 3 ॥
ऐसा जन सेवक सोई, मन और न भावै कोई ।
हरि प्रेम मगन रंग राता, दादू राम रमै रस माता ॥ 4 ॥
174. साधु महिमा । जय मंगल ताल
आप निरंजन यों कहै, कीरति करतार ।

श्री दादूवाणी-राग रामकली 8

मैं जन सेवक द्वै नहीं, एकै अंग सार ॥ टेक ॥
मम कारण सब परिहरै, आपा अभिमान ।
सदा अखंडित उर धरै, बोले भगवान ॥ 1 ॥
अन्तर पट जीवै नहीं, तब ही मर जाइ ।
बिछुरे तलफै मीन ज्यूं, जीवै जल आइ ॥ 2 ॥
क्षीर नीर ज्यूं मिल रहै, जल जलहि समान ।
आतम पाणी लौण ज्यों, दूजा नांही आन ॥ 3 ॥
मैं जन सेवक द्वै नहीं, मेरा विश्राम ।
मेरा जन मुझ सारिखा, दादू कहै राम ॥ 4 ॥
175. परिचय विनती । जय मंगल ताल
शरण तुम्हारी केशवा, मैं अनन्त सुख पाया ।
भाग बड़े तूं भेटिया, हौं चरणौं आया ॥ टेक ॥
मेरी तप्त मिटी तुम्ह देखतां, शीतल भयो भारी ।
भव बंधन मुक्ता भया, जब मिल्या मुरारी ॥ 1 ॥
भरम भेद सब भूलिया, चेतन चित लाया ।
पारस सौं परचा भया, उन सहज लखाया ॥ 2 ॥
मेरा चंचल चित निश्चल भया, अब अनत न जाई ।
मगन भया सर बेधिया, रस पीया अघाई ॥ 3 ॥
सन्मुख ह्वै तैं सुख दिया, यहु दया तुम्हारी ।
दादू दरसन पावई, पीव प्राण अधारी ॥ 4 ॥
176. परस्पर गोष्टी परिचय विनती । तिलवाड़ा ताल
गोविन्द राखो अपणी ओट ।
काम क्रोध भये बटपारे, तकि मारैं उर चोट ॥ टेक ॥
बैरी पंच सबल संग मेरे, मारग रोक रहे ।

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