सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग केदार 6
दादू दीन लीन कर लीजे, मेटहु सब जंजाल ॥ 3 ॥
132. विनती । त्रिताल
ये मन माधो बरजि बरजि ।
अति गति विषिया सौं रत, उठत जु गरजि गरजि ॥ टेक ॥
विषय विलास अधिक अति आतुर, विलसत शंक न मानैं ।
खाइ हलाहल मगन माया में, विष अमृत कर जानैं ॥ 1 ॥
पंचन के संग बहत चहूँ दिशि, उलट न क बहूँ आवै ।
जहाँ जहाँ काल ये जाइ तहँ तहँ, मृग जल ज्यों मन धावै ॥ 2 ॥
साध कहैं गुरु ज्ञान न मानै, भाव भजन न तुम्हारा ।
दादू के तुम सजन सहाई, कछू न बसाइ हमारा ॥ 3 ॥
133. मन उपदेश । पंचम ताल
हां, हमारे जियरा !
राम गुण गाइ, एही वचन विचारी मान ॥ टेक ॥
केती कहूँ मन कारणैं, तूं छाड़ि रे अभिमान ।
कह समझाऊँ बेर-बेर, तुझ अजहुँ न आवै ज्ञान ॥ 1 ॥
ऐसा संग कहाँ पाइये, गुण गावत आवै तान ।
चरणों सौं चित राखिये, निसदिन हरि को ध्यान ॥ 2 ॥
वे भी लेखा देहिंगे, आप कहावैं खान ।
जन दादू रे गुण गाइये, पूरण है निर्वाण ॥ 3 ॥
134. काल चेतावनी । पंचम ताल
बटाऊ ! चलना आज कि काल ।
समझि न देखे कहा सुख सोवे, रे मन राम संभाल ॥ टेक ॥
जैसे तरुवर वृक्ष बसेरा, पंखी बैठे आइ ।
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