सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग केदार 6
137. उपदेश । त्रिताल
सजनी ! रजनी घटती जाइ ।
पल पल छीजै अवधि दिन आवै, अपनो लाल मनाइ ॥ टेक॥
अति गति नींद कहा सुख सोवै, यहु अवसर चलि जाइ ।
यहु तन विछुरैं बहुरि कहँ पावै, पीछे ही पछिताइ ॥ 1 ॥
प्राण-पति जागे सुन्दरि क्यों सोवे, उठ आतुर गहि पाइ ।
कोमल वचन करुणा कर आगे, नख शिख रहु लपटाइ ॥ 2 ॥
सखी सुहाग सेज सुख पावै, प्रीतम प्रेम बढ़ाइ ।
दादू भाग बड़े पीव पावै, सकल शिरोमणि राइ ॥ 3 ॥
138. प्रश्न उत्तर । दादरा
कोई जानै रे, मर्म माधइये केरो ?
कैसे रहे ? करे का ? सजनी प्राण मेरो ॥ टेक॥
कौन विनोद करत री सजनी, कवननि संग बसेरो ?
संत साधु गम आये उनके, करत जु प्रेम घणेरो ॥ 1 ॥
कहाँ निवास ? वास कहँ ? सजनी गवन तेरो ।
घट घट मांहि रहै निरन्तर, ये दादू नेरो ॥ 2 ॥
139. विरह विनती । त्रिताल
मन वैरागी राम को, संगि रहै सुख होइ हो ॥ टेक॥
हरि कारण मन जोगिया, क्योंहि मिलै मुझ सोइ ।
निरखण का मोहि चाव है, क्यों आप दिखावै मोहि हो ॥ 1 ॥
हिरदै में हरि आव तूँ, मुख देखूं मन धोहि ।
तन मन में तूँ ही बसै, दया न आवै तोहि हो ॥ 2 ॥
निरखण का मोहि चाव है, ये दुख मेरा खोइ ।
दादू तुम्हारा दास है, नैन देखन को रोइ हो ॥ 3 ॥
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