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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 504 में से

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पृष्ठ 358

श्री दादूवाणी-राग केदार 6
ऐसैं यहु सब हाट पसारा, आप आपको जाइ ॥ 1 ॥
कोइ नहिं तेरा सजन संगाती, जनि खोवे मन मूल ।
यहु संसार देखि जनि भूलै, सब ही सैंबल फूल ॥ 2 ॥
तन नहिं तेरा धन नहिं तेरा, कहा रह्यो इहि लाग ।
दादू हरि बिन क्यों सुख सोवे, काहे न देखे जाग ॥ 3 ॥
135. तर्क चेतावनी । प्रतिपाल
जात कत मद को मातो रे ।
तन धन जोबन देख गर्वानो, माया रातो रे ॥ टेक ॥
अपनो हि रूप नैन भर देखै, कामिनी को संग भावै रे ।
बारम्बार विषय रत मानैं, मरबो चित्त न आवै रे ॥ 1 ॥
मैं बड़ आगे और न आवे, करत केत अभिमाना रे ।
मेरी मेरी करि करि फूल्यो, माया मोह भुलानां रे ॥ 2 ॥
मैं मैं करत जन्म सब खोयो, काल सिरहाणे आयो रे ।
दादू देख मूढ़ नर प्राणी, हरि बिन जन्म गँवायो रे ॥ 3 ॥
136. हितोपदेश । त्रिताल
जागत को कदे न मूसै कोई ।
जागत जान जतन कर राखै, चोर न लागू होई ॥ टेक ॥
सोवत साह वस्तु नहिं पावे, चोर मूसै घर घेरा ।
आस पास पहरे को नाहीं, वस्ते कीन नबेरा ॥ 1 ॥
पीछे कहु क्या जागे होई, वस्तु हाथ तैं जाई ।
बीती रैन बहुरि नहिं आवै, तब क्या करि है भाई ॥ 2 ॥
पहले ही पहरे जे जागै, वस्तु कछू नहिं छीजे ।
दादू जुगति जान कर ऐसी, करना है सो कीजे ॥ 3 ॥

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