सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग केदार 6
140. (गुजराती) अधीर उलाहन । त्रिताल
धरणीधर बाह्या धूतो रे, अंग परस नहिं आपे रे ।
कह्यो अमारो कांई न माने, मन भावे ते थापे रे ॥ टेक ॥
वाही वाही ने सर्वस लीधो, अबला कोइ न जाणे रे ।
अलगो रहे येणी परि तेड़े, आपणड़े घर आणे रे ॥ 1 ॥
रमी रमी रे राम रजावी, केन्हों अंत न दीधो रे ।
गोप्य गुह्य ते कोई न जाणै, एह्वो अचरज कीधो रे ॥ 2 ॥
माता बालक रुदन करतां, वाही वाही ने राखे रे ।
जेवो छे तेवो आपणपो, दादू ते नहिं दाखै रे ॥ 3 ॥
141. समर्थाई । राजमृगांक ताल
सिरजनहार तैं सब होइ ।
उत्पत्ति परलै करै आपै, दूसर नांहीं कोइ ॥ टेक ॥
आप होइ कुलाल करता, बूँद तैं सब लोइ ।
आप कर अगोचर बैठा, दुनी मन को मोहि ॥ 1 ॥
आप तैं उपाइ बाजी, निरखि देखै सोइ ।
बाजीगर को यहु भेद आवै, सहज साँज समोइ ॥ 2 ॥
जे कुछ किया सु करै आपै, येह उपजै मोहि ।
दादू रे हरि नाम सेती, मैल कश्मल धोइ ॥ 3 ॥
142. परिचय । राजमृगांक ताल
देहुरे मंझे देव पायो, वस्तु अगोचर लखायो ॥ टेक ॥
अति अनूप ज्योति-पति, सोई अन्तर आयो ।
पिंड ब्रह्माण्ड सम, तुल्य दिखायो ॥ 1 ॥
सदा प्रकाश निवास निरंतर, सब घट मांहि समायो ।
नैन निरख नेरो, हिरदै हेत लायो ॥ 2 ॥
पूरव भाग सुहाग सेज सुख, सो हरि लैन पठायो ।
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