सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30
आतम अंतर आव तूं, या है तेरी ठौर।
दादू सुन्दरी पीव तूं, दूजा नांही और ॥ 4 ॥
दादू पीव न देख्या नैन भर, कंठ न लागी धाइ।
सूती नहीं गल बाँह दे, बीच हि गई बिलाइ ॥ 5 ॥
सुरति पुकारै सुन्दरी, अगम अगोचर जाइ।
दादू विरहनी आत्मा, उठ उठ आतुर धाइ ॥ 6 ॥
साँई कारण सेज सँवारी, सब तैं सुन्दर ठौर।
दादू नारी नाह बिन, आण बिठाये और ॥ 7 ॥
कोई अवगुण मन बस्या, चित तैं धरी उतार।
दादू पति बिन सुन्दरी, हाँडै घर-घर बार ॥ 8 ॥
अन्य लगन व्यभिचार
प्रेम प्रीति सनेह बिन, सब झूठे श्रृंगार।
दादू आतम रत नहीं, क्यों मानै भरतार ॥ 9 ॥
दादू हौं सुख सूती नींद भर, जागै मेरा पीव।
क्यों कर मेला होइगा, जागै नांही जीव ॥ 10 ॥
सखी न खेलै सुन्दरी, अपने पीव सौं जाग।
स्वाद न पाया प्रेम का, रही नहीं उर लाग ॥ 11 ॥
पंच दिहाड़े पीव सौं, मिल काहे न खेले।
दादू गहली सुन्दरी, क्यों रहै अकेले ॥ 12 ॥
सखी सुहागिन सब कहैं, हौं री दुहागिन आहि।
पिव का महल न पाइये, कहाँ पुकारूँ जाहि ॥ 13 ॥
सखी सुहागिन सब कहैं, कंत न बूझै बात।
मनसा वाचा कर्मणा, मूर्च्छ मूर्च्छ जीव जात ॥ 14 ॥
सखी सुहागिन सब कहैं, पीव सौं परस न होइ।
निशवासर दुख पाइये, यहु व्यथा न जान कोइ ॥ 15 ॥
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श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30
सखी सुहागिन सब कहैं, प्रकट न खेलै पीव।
सेज सुहाग न पाइये, दुखिया मेरा जीव ॥ 16 ॥
अन्य लग्न व्यभिचार
पुरुष पुरातन छाड़ कर, चली आन के साथ।
सो भी संग तैं बीछुट्या, खड़ी मरोड़े हाथ ॥ 17 ॥
सुन्दरी विलाप
सुन्दरी कबहुँ कंत का, मुख सौं नाम न लेइ।
अपने पीव के कारणैं, दादू तन मन देइ ॥ 18 ॥
नैन बैन कर वारणै, तन मन पिंड पराण।
दादू सुन्दरी बलि गई, तुम पर कंत सुजान ॥ 19 ॥
तन भी तेरा, मन भी तेरा, तेरा पिंड पराण।
सब कुछ तेरा, तूँ है मेरा, यहु दादू का ज्ञान ॥ 20 ॥
सुन्दरी मोहे पीव को, बहुत भाँति भरतार।
त्यों दादू रिझवै राम को, अनन्त कला करतार ॥ 21 ॥
नदियाँ नीर उलंघ कर, दरिया पैली पार।
दादू सुन्दरी सो भली, जाइ मिले भरतार ॥ 22 ॥
सुन्दरी सुहाग
प्रेम लहर गह ले गई, अपने प्रीतम पास।
आत्म सुन्दरी पीव को, विलसै दादू दास ॥ 23 ॥
सुन्दरी को साँई मिल्या, पाया सेज सुहाग।
पींव सौं खेलै प्रेम रस, दादू मोटे भाग ॥ 24 ॥
दादू सुन्दरी देह में, साँई को सेवै।
राती अपने पीव सौं, प्रेम रस लेवै ॥ 25 ॥
दादू निर्मल सुन्दरी, निर्मल मेरा नाह।
दोन्यों निर्मल मिल रहे, निर्मल प्रेम प्रवाह ॥ 26 ॥
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श्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30
साँई सुन्दरी सेज पर, सदा एक रस होइ ।
दादू खेलै पीव सौं, ता सम और न कोइ ॥ 27 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
तीसवां सुन्दरी का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 30 ॥ साखी 27 ॥
- 278 -
कस्तूरिया मृग
का
अंग
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अथ कस्तूरिया मृग का अंग ३१
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ।। 1 ।।
दादू घट कस्तूरी मृग के, भ्रमत फिरै उदास ।
अन्तरगति जाणै नहीं, तातैं सूंघै घास ।। 2 ।।
सब घट में गोविन्द है, संग रहै हरि पास ।
कस्तूरी मृग में बसै, सूंघत डोलै घास ।। 3 ।।
दादू जीव न जानै राम को, राम जीव के पास ।
गुरु के शब्दों बाहिरा, तातैं फिरै उदास ।। 4 ।।
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श्री दादूवाणी-कस्तूरिया मृग का अंग 31
दादू जा कारण जग ढूंढ़िया, सो तो घट ही मांहि।
मैं तैं पड़दा भरम का, तातैं जानत नांहि ॥ 5 ॥
दादू दूर कहैं ते दूर हैं, राम रह्या भरपूर।
नैनहुं बिन सूझै नहीं, तातैं रवि कत दूर ॥ 6 ॥
ओडो हूवो पाण खे, न लघाऊं मंझ।
न जाताऊं पाण में, तांई क्या ऊंपंध ॥ 7 ॥
दादू केई दौड़े द्वारिका, केई काशी जांहि।
केई मथुरा को चले, साहिब घट ही मांहि ॥ 8 ॥
दादू सब घट मांही रम रह्या, बिरला बूझै कोइ।
सोई बूझै राम को, जे राम सनेही होइ ॥ 9 ॥
दादू जड़मति जीव जाणै नहीं, परम स्वाद सुख जाइ।
चेतन समझै स्वाद सुख, पीवै प्रेम अघाइ ॥ 10 ॥
जागत जे आनन्द करै, सौ पावै सुख स्वाद।
सूते सुख ना पाइये, प्रेम गँवाया बाद ॥ 11 ॥
दादू जिसका साहिब जागणा, सेवक सदा सचेत।
सावधान सन्मुख रहै, गिर गिर पड़े अचेत ॥ 12 ॥
दादू साँई सावधान, हम ही भये अचेत।
प्राणी राख न जानहि, तातैं निष्फल खेत ॥ 13 ॥
सगुना निगुना कृतघ्नी
दादू गोविन्द के गुण बहुत हैं, कोई न जाणै जीव।
अपणी बूझै आप गति, जे कुछ किया पीव ॥ 14 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-
सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-
सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
इकतीसवां कस्तूरिया कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 31 ॥ साखी 14 ॥
- 280 -
निंदा का अंग
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अथ निन्दा का अंग ३२
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
मत्सर ईर्ष्या
साधु निर्मल मल नहीं, राम रमै सम भाइ ।
दादू अवगुण काढ कर, जीव रसातल जाइ ॥ 2 ॥
दादू जब ही साधु सताइये, तब ही ऊँघ पलट।
आकाश धँसै, धरती खिसै, तीनों लोक गरक ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-निंदा का अंग 32
निन्दा
दादू जिहिं घर निंदा साधु की, सो घर गये समूल ।
तिनकी नींव न पाइये, नांव न ठांव न धूल ॥ 4 ॥
दादू निंदा नाम न लीजिये, स्वप्नै ही जनि होइ ।
ना हम कहैं, न तुम सुनो, हमें जनि भाषै कोइ ॥ 5 ॥
दादू निन्दा किये नरक है, कीट पड़ैं मुख मांहि ।
राम विमुख जामै मरै, भग-मुख आवै जाहि ॥ 6 ॥
दादू निंदक बपुरा जनि मरै, पर उपकारी सोइ ।
हम को करता ऊजला, आपण मैला होइ ॥ 7 ॥
दादू जिहिं विधि आतम उद्धरै, परसे प्रीतम प्राण ।
साधु शब्द क्यूं निंदणां, समझैं चतुर सुजाण ॥ 8 ॥
मत्सर ईर्ष्या
अनदेख्या अनरथ कहैं, कलि पृथिवी का पाप ।
धरती अंबर जब लगै, तब लग करैं कलाप ॥ 9 ॥
अनदेख्या अनरथ कहैं, अपराधी संसार ।
जद तद लेखा लेइगा, समर्थ सिरजनहार ॥ 10 ॥
दादू डरिये लोक तैं, कैसी धरहिं उठाइ ।
अनदेखी अजगैब की, ऐसी कहैं बनाइ ॥ 11 ॥
अमिट पाप प्रचंड
दादू अमृत कूँ विष, विष को अमृत, फेरि धरैं सब नाम ।
निर्मल मैला, मैला निर्मल, जाहिंगे किस ठाम ॥ 12 ॥
मत्सर ईर्ष्या
दादू साचे को झूठा कहैं, झूठे को साचा ।
राम दुहाई काढिये, कंठ तैं वाचा ॥ 13 ॥
दादू झूठ न कहिये सच को, सच न कहिये झूठ ।
दादू साहिब मानै नहीं, लागै पाप अखूट ॥ 14 ॥
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श्री दादूवाणी-निंदा का अंग 32
दादू झूठ दिखावै साच को, भयानक भयभीत ।
साचा राता साच सौं, झूठ न आनै चीत ॥ 15 ॥
साचे को झूठा कहैं, झूठा साच समान ।
दादू अचरज देखिया, यहु लोगों का ज्ञान ॥ 16 ॥
निन्दा
दादू निन्दक बुरा न कहिये, पर उपकारी अस कहाँ लहिये ।
ज्यों ज्यों निन्दैं लोग विचारा, त्यों त्यों छीजै रोग हमारा ॥ 17 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
बत्तीसवां निन्दा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 32 ॥ साखी 17 ॥
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निगुणा का
अंग
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अथ निगुणा का अंग ३३
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥
सगुणा निगुणा कृतघ्नी
दादू चंदन बावना, बसै बटाऊ आइ ।
सुखदाई शीतल किये, तीनों ताप नसाइ ॥ 2 ॥
काल कुहाड़ा हाथ ले, काटन लागा ढाइ ।
ऐसा यहु संसार है, डाल मूल ले जाइ ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33
अज्ञ स्वभाव अपलट
सतगुरु चन्दन बावना, लागे रहें भुवंग।
दादू विष छाडैं नहीं, कहा करै सत्संग ॥ 4 ॥
दादू कीड़ा नरक का, राख्या चंदन मांहि।
उलट अपूठा नरक में, चन्दन भावै नांहि ॥ 5 ॥
सतगुरु साधु सुजान है, शिष का गुण नहिं जाइ।
दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ ॥ 6 ॥
कोटि बर्ष लौं राखिये, बंसा चन्दन पास।
दादू गुण लिये रहै, कदे न लागै बास ॥ 7 ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, पत्थर पानी मांहि।
दादू आडा अंग है, भीतर भेदै नांहि ॥ 8 ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, लोहा पारस संग।
दादू रोम का अन्तरा, पलटै नांही अंग ॥ 9 ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, जीव ब्रह्म संग दोइ।
दादू मांहीं वासना, कदे न मेला होइ ॥ 10 ॥
सगुणा निगुणा कृतघ्नी
मूसा जलता देख कर, दादू हंस दयाल।
मान सरोवर ले चल्या, पंखा काटे काल ॥ 11 ॥
सब जीव भुवंगम कूप में, साधु काढैं आइ।
दादू विषहर विष भरे, फिर ताही को खाइ ॥ 12 ॥
दादू दूध पिलाइये, विषहर विष कर लेइ।
गुण का औगुण कर लिया, ताही को दुख देइ ॥ 13 ॥
अज्ञ स्वभाव अपलट
बिन ही पावक जल मुवा, जवासा जल मांहि।
दादू सूखै सींचतां, तो जल को दूषण नांहि ॥ 14 ॥
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श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33
सगुणा निगुणा कृतघ्नी
सुफल वृक्ष परमार्थी, सुख देवै फल फूल।
दादू ऊपर बैस कर, निगुणा काटै मूल ॥ 15 ॥
दादू सगुणा गुण करै, निगुणा मानै नांहि।
निगुणा मर निष्फल गया, सगुणा साहिब मांहि ॥ 16 ॥
निगुणा गुण मानै नहीं, कोटि करै जे कोइ।
दादू सब कुछ सौंपिये, सो फिर बैरी होइ ॥ 17 ॥
दादू सगुणा लीजिये, निगुणा दीजे डार।
सगुणा सन्मुख राखिये, निगुणा नेह निवार ॥ 18 ॥
सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै एक।
दादू साधू सब कहैं, निगुणा नरक अनेक ॥ 19 ॥
सगुणा गुण केते करै, निगुणा नाखै ढाहि।
दादू साधू सब कहैं, निगुणा निष्फल जाइ ॥ 20 ॥
सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै कोइ।
दादू साधु सब कहैं, भला कहाँ तैं होइ ॥ 21 ॥
सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै नीच।
दादू साधू सब कहैं, निगुणा के सिर मीच ॥ 22 ॥
साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु के घट होइ।
दादू काढै काल मुख, निगुणा न मानै कोइ ॥ 23 ॥
साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु मांही आइ।
दादू राखै जीव दे, निगुणा मेटै जाइ ॥ 24 ॥
साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु का दे संग।
दादू परलै राखिले, निगुणा न पलटै अंग ॥ 25 ॥
साहिब जी सब गुण करै, सतगुरु आडा देइ।
दादू तारै देखतां, निगुणा गुण नहिं लेइ ॥ 26 ॥
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श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33
सतगुरु दिया राम धन, रहै सुबुद्धि बताइ।
मनसा वाचा कर्मणा, बिलसै वितड़ै खाइ ॥ 27 ॥
किया कृत मेटै नहीं, गुण ही मांहि समाइ।
दादू बधै अनन्त धन, कबहुँ कदे न जाइ ॥ 28 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
तैंतीसवां निगुणा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 33 ॥ साखी 28 ॥
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विनती का
अंग
अथ विनती का अंग ३४
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
करूणा
दादू बहुत बुरा किया, तुम्हें न करना रोष।
साहिब समाई का धनी, बन्दे को सब दोष ॥ 2 ॥
दादू बुरा बुरा सब हम किया, सो मुख कह्या न जाइ ।
निर्मल मेरा सांइयाँ, ताको दोष न लाइ ॥ 3 ॥
साँई सेवा चोर मैं, अपराधी बन्दा ।
दादू दूजा को नहीं, मुझ सरीखा गन्दा ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
तिल तिल का अपराधी तेरा,रती रती का चोर ।
पल पल का मैं गुनही तेरा, बख्शो अवगुण मोर ॥ 5 ॥
महा अपराधी एक मैं, सारे इहि संसार ।
अवगुण मेरे अति घणे, अन्त न आवैं पार ॥ 6 ॥
बे मर्यादा मित नहीं, ऐसे किये अपार ।
मैं अपराधी बापजी, मेरे तुम्हीं एक अधार ॥ 7 ॥
दोष अनेक कलंक सब, बहुत बुरे मुझ मांहि ।
मैं किये अपराध सब, तुम तैं छाना नांहि ॥ 8 ॥
गुनहगार अपराधी तेरा, भाजि कहाँ हम जाहिं ।
दादू देख्या शोध सब, तुम बिन कहीं न समाहिं ॥ 9 ॥
आदि अंत लौं आय कर, सुकृत कछू न कीन्ह ।
माया मोह मद मत्सरा, स्वाद सबै चित दीन्ह ॥ 10 ॥
विनती
काम क्रोध संशय सदा, कबहूँ नाम न लीन ।
पाखंड प्रपंच पाप में, दादू ऐसे खीन ॥ 11 ॥
दादू बहु बंधन सौं बंधिया, एक बिचारा जीव ।
अपने बल छूटै नहीं, छोड़नहारा पीव ॥ 12 ॥
दादू बंदीवान है, तूँ बन्दी छोड़ दीवान ।
अब जनि राखो बंदि में, मीरां मेहरबान ॥ 13 ॥
दादू अंतर कालिमा, हिरदै बहुत विकार ।
प्रकट पूरा दूर कर, दादू करै पुकार ॥ 14 ॥
सब कुछ व्यापै राम जी, कुछ छूटा नांही ।
तुम तैं कहाँ छिपाइये, सब देखो मांही ॥ 15 ॥
सबल साल मन में रहै, राम बिसर क्यों जाइ ।
यहु दुख दादू क्यों सहै, साँई करो सहाइ ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
राखणहारा राख तूँ, यहु मन मेरा राखि ।
तुम बिन दूजा को नहीं, साधू बोलैं साखि ॥ 17 ॥
माया विषय विकार तैं, मेरा मन भागे ।
सोई कीजे साँईयाँ, तूँ मीठा लागे ॥ 18 ॥
साँई दीजे सो रति, तूँ मीठा लागे ।
दूजा खारा होइ सब, सूता जीव जागे ॥ 19 ॥
ज्यों आपै देखे आपको, सो नैना दे मुझ ।
मीरां मेरा मेहर कर, दादू देखे तुझ ॥ 20 ॥
विनती
दादू पछतावा रह्या, सके न ठाहर लाइ ।
अर्थ न आया राम के, यहु तन योंही जाइ ॥ 21 ॥
दादू कहै- दिन दिन नवतम भक्ति दे, दिन दिन नवतम नांव ।
दिन दिन नवतम नेह दे, मैं बलिहारी जांव ॥ 22 ॥
साँई संशय दूर कर, कर शंका का नाश ।
भान भ्रम दुविध्या दुख दारुण, समता सहज प्रकाश ॥ 23 ॥
दया विनती
नांही प्रकट ह्वै रह्या, है सो रह्या लुकाइ ।
संइयाँ पड़दा दूर कर, तूँ ह्वै प्रकट आइ ॥ 24 ॥
दादू माया प्रकट ह्वै रही, यों जे होता राम ।
अरस परस मिल खेलते, सब जीव सब ही ठाम ॥ 25 ॥
दया करै तब अंग लगावै, भक्ति अखंडित देवै ।
दादू दर्शन आप अकेला, दूजा हरि सब लेवै ॥ 26 ॥
दादू साध सिखावैं आत्मा, सेवा दिढ कर लेहु ।
पारब्रह्म सौं विनती, दया कर दर्शन देहु ॥ 27 ॥
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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
साहिब साधु दयालु हैं, हम ही अपराधी ।
दादू जीव अभागिया, अविद्या साधी ॥ 28 ॥
सब जीव तोरैं राम सौं, पै राम न तोरे ।
दादू काचे ताग ज्यों, टूटै त्यों जोरे ॥ 29 ॥
सजीवन
फूटा फेरि संवार कर, ले पहुँचावे ओर ।
ऐसा कोई ना मिलै, दादू गई बहोर ॥ 30 ॥
ऐसा कोई ना मिलै, तन फेरि संवारै ।
बूढे तैं बाला करै, खै काल निवारै ॥ 31 ॥
परच करूणा विनती
गलै विलै कर बीनती, एकमेक अरदास ।
अरस परस करुणा करै, तब द्रवै दादू दास ॥ 32 ॥
साँईं तेरे डर डरूँ, सदा रहूँ भैभीत ।
अजा सिंह ज्यों भय घणा, दादू लिया जीत ॥ 33 ॥
पोख प्रतिपाल रक्षक
दादू पलक मांहि प्रकटै सही, जे जन करैं पुकार ।
दीन दुखी तब देखकर, अति आतुर तिहिं बार ॥ 34 ॥
आगे पीछे संग रहै, आप उठाये भार ।
साधु दुखी तब हरि दुखी, ऐसा सिरजनहार ॥ 35 ॥
सेवक की रक्षा करै, सेवक की प्रतिपाल ।
सेवग की वाहर चढै, दादू दीन दयाल ॥ 36 ॥
विनती सागर तरण
दादू काया नाव समंद में, औघट बूड़े आइ ।
इहि अवसर एक अगाध बिन, दादू कौन सहाइ ॥ 37 ॥
यहु तन भेरा भौजला, क्यों कर लंघे तीर ।
खेवट बिन कैसे तिरै, दादू गहर गंभीर ॥ 38 ॥
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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
पिंड परोहन सिन्धु जल, भव सागर संसार ।
राम बिना सूझै नहीं, दादू खेवनहार ॥ 39 ॥
यहु घट बोहित धार में, दरिया वार न पार ।
भैभीत भयानक देखकर, दादू करी पुकार ॥ 40 ॥
कलियुग घोर अंधार है, तिसका वार न पार ।
दादू तुम बिन क्यों तिरै, समर्थ सिरजनहार ॥ 41 ॥
काया के वश जीव है, कस कस बँध्या मांहि ।
दादू आत्माराम बिन, क्यों ही छूटै नांहि ॥ 42 ॥
दादू प्राणी बँध्या पंच सौं, क्योंही छूटै नांहि ।
निधणी आया मारिये, यहु जीव काया मांहि ॥ 43 ॥
तुम बिन धणी न धोरी जीव का, यों ही आवै जाइ ।
जे तूँ साँई सत्य है, तो बेगा प्रकटहु आइ ॥ 44 ॥
निधणी आया मारिये, धणी न धोरी कोइ ।
दादू सो क्यूं मारिये, साहिब सिर पर होइ ॥ 45 ॥
दया विनती
राम विमुख जुग जुग दुखी, लख चौरासी जीव ।
जामै मरै जग आवटै, राखणहारा पीव ॥ 46 ॥
पोष प्रति पाल रक्षक
समर्थ सिरजनहार है, जे कुछ करै सो होइ ।
दादू सेवक राख ले, काल न लागै कोइ ॥ 47 ॥
विनती
साँई साचा नाम दे, काल झाल मिट जाइ ।
दादू निर्भय ह्वै रहे, कबहूँ काल न खाइ ॥ 48 ॥
कोई नहिं करतार बिन, प्राण उधारणहार ।
जियरा दुखिया राम बिन, दादू इहि संसार ॥ 49 ॥
- 292 -
श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
जिनकी रक्षा तूँ करै, ते उबरे करतार।
जे तैं छाड़ै हाथ तैं, ते डूबे संसार ॥ 50 ॥
राखणहारा एक तूँ, मारणहार अनेक।
दादू के दूजा नहीं, तूँ आपै ही देख ॥ 51 ॥
दादू जग ज्वाला जम रूप है, साहिब राखणहार।
तुम बिच अन्तर जनि पड़ै, तातैं करूँ पुकार ॥ 52 ॥
जहँ तहँ विषय विकार तैं, तुम ही राखणहार।
तन मन तुम को सौंपिया, साचा सिरजनहार ॥ 53 ॥
दया विनती
दादू कहै- गरक रसातल जात है, तुम बिन सब संसार।
कर गहि कर्त्ता काढि ले, दे अवलम्बन आधार ॥ 54 ॥
दादू दौं लागी जग प्रज्वलै, घट घट सब संसार।
हम तैं कछू न होत है, तुम बरसि बुझावणहार ॥ 55 ॥
दादू आत्म जीव अनाथ सब, करतार उबारै।
राम निहोरा कीजिये, जनि काहू मारै ॥ 56 ॥
अर्श जमीं औजूद में, तहाँ तपै अफताब।
सब जग जलता देख कर, दादू पुकारैं साध ॥ 57 ॥
सकल भुवन सब आत्मा, निर्विष कर हरि लेइ।
पड़दा है सो दूर कर, कश्मल रहण न देइ ॥ 58 ॥
तन मन निर्मल आत्मा, सब काहू की होइ।
दादू विषय विकार की, बात न बूझै कोइ ॥ 59 ॥
विनती
समर्थ धोरी कंध धर, रथ ले ओर निवाहि।
मार्ग मांहि न मेलिये, पीछे बिड़द लजाहि ॥ 60 ॥
दादू गगन गिरै तब को धरै, धरती-धर छंडै।
जे तुम छाड़हु राम रथ, कंधा को मंडै ॥ 61 ॥
- 293 -
श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
ज्यों वह बरत गगन तैं टूटै, कहाँ धरणी कहाँ ठाम।
लागी सुरति अंग तैं छूटै, सो कत जीवे राम ॥ 61 ॥
अन्तरयामी एक तूं, आतम के आधार।
जे तुम छाड़हु हाथ तैं, तो कौन संभालणहार ॥ 62 ॥
तेरा सेवक तुम लगै, तुम्हीं माथै भार।
दादू डूबत रामजी, बेगि उतारो पार ॥ 63 ॥
सत छूटा शूरातन गया, बल पौरुष भागा जाइ।
कोई धीरज ना धरै, काल पहूँता आइ ॥ 64 ॥
संगी थाके संग के, मेरा कुछ न वशाइ।
भाव भक्ति धन लूटिये, दादू दुखी खुदाइ ॥ 65 ॥
परिचय करुणा विनती
दादू जियरे जक नहीं, विश्राम न पावै।
आत्म पाणी लौंण ज्यों, ऐसे होइ न आवै ॥ 66 ॥
दया विनती
दादू तेरी खूबी खूब है, सब नीका लागे।
सुन्दर शोभा काढ़ ले, सब कोई भागे ॥ 67 ॥
विनती
तुम हो तैसी कीजिये, तो छूटेंगे जीव।
हम हैं ऐसी जनि करो, मैं सदके जाऊँ पीव ॥ 68 ॥
अनाथों का आसरा, निरधारों आधार।
निर्धन का धन राम है, दादू सिरजनहार ॥ 69 ॥
साहिब दर दादू खड़ा, निशदिन करै पुकार।
मीरां मेरा मिहर कर, साहिब दे दीदार ॥ 70 ॥
दादू प्यासा प्रेम का, साहिब राम पिलाइ।
प्रकट प्याला देहु भर, मृतक लेहु जिलाइ ॥ 71 ॥
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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34
अल्लह आली नूर का, भर-भर प्याला देहु ।
हम को प्रेम पिलाइ करि, मतवाला कर लेहु ॥ 72 ॥
तुम को हमसे बहुत हैं, हमको तुमसे नांहि ।
दादू को जनि परिहरै, तूँ रहु नैनहुँ मांहि ॥ 73 ॥
तुम तैं तब ही होइ सब, दरश परश दर हाल ।
हम तैं कबहुं न होइगा, जे बीतहिं जुग काल ॥ 74 ॥
तुम्हीं तैं तुम को मिलैं, एक पलक में आइ ।
हम तैं कबहुँ न होइगा, कोटि कल्प जे जाइ ॥ 75 ॥
छिन बिछोह
साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह ।
दादू प्रेम सनेह बिन, खरी दुहेली देह ॥ 76 ॥
साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह ।
प्रकट दर्शन देखते, दादू सुखिया देह ॥ 77 ॥
करुणा
तुम को भावै और कुछ, हम कुछ किया और ।
मिहर करो तो छूटिये, नहीं तो नांहीं ठौर ॥ 78 ॥
मुझ भावै सो मैं किया, तुझ भावै सो नांहि ।
दादू गुनहगार है, मैं देख्या मन मांहि ॥ 79 ॥
खुशी तुम्हारी त्यों करो, हम तो मानी हार ।
भावै बन्दा बख्शिये, भावै गह कर मार ॥ 80 ॥
दादू जे साहिब लेखा लिया, तो शीश काट शूली दिया ।
मिहर मया कर फिल किया, तो जीये जीये कर जिया ॥ 81 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-
सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-
ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम्
माहात्म्य चौंतीसवां विनती का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 34 ॥ साखी 81 ॥
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