सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-निंदा का अंग 32
निन्दा
दादू जिहिं घर निंदा साधु की, सो घर गये समूल ।
तिनकी नींव न पाइये, नांव न ठांव न धूल ॥ 4 ॥
दादू निंदा नाम न लीजिये, स्वप्नै ही जनि होइ ।
ना हम कहैं, न तुम सुनो, हमें जनि भाषै कोइ ॥ 5 ॥
दादू निन्दा किये नरक है, कीट पड़ैं मुख मांहि ।
राम विमुख जामै मरै, भग-मुख आवै जाहि ॥ 6 ॥
दादू निंदक बपुरा जनि मरै, पर उपकारी सोइ ।
हम को करता ऊजला, आपण मैला होइ ॥ 7 ॥
दादू जिहिं विधि आतम उद्धरै, परसे प्रीतम प्राण ।
साधु शब्द क्यूं निंदणां, समझैं चतुर सुजाण ॥ 8 ॥
मत्सर ईर्ष्या
अनदेख्या अनरथ कहैं, कलि पृथिवी का पाप ।
धरती अंबर जब लगै, तब लग करैं कलाप ॥ 9 ॥
अनदेख्या अनरथ कहैं, अपराधी संसार ।
जद तद लेखा लेइगा, समर्थ सिरजनहार ॥ 10 ॥
दादू डरिये लोक तैं, कैसी धरहिं उठाइ ।
अनदेखी अजगैब की, ऐसी कहैं बनाइ ॥ 11 ॥
अमिट पाप प्रचंड
दादू अमृत कूँ विष, विष को अमृत, फेरि धरैं सब नाम ।
निर्मल मैला, मैला निर्मल, जाहिंगे किस ठाम ॥ 12 ॥
मत्सर ईर्ष्या
दादू साचे को झूठा कहैं, झूठे को साचा ।
राम दुहाई काढिये, कंठ तैं वाचा ॥ 13 ॥
दादू झूठ न कहिये सच को, सच न कहिये झूठ ।
दादू साहिब मानै नहीं, लागै पाप अखूट ॥ 14 ॥
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