सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
कायर
मन मनसा जीते नहीं, पंच न जीते प्राण।
दादू रिपु जीते नहीं, कहैं हम शूर सुजान ॥ 61 ॥
मन मनसा मारे नहीं, काया मारण जांहि।
दादू बांबी मारिये, सर्प मरै क्यों मांहि ॥ 62 ॥
शूरातन
दादू पाखर पहर कर, सब को झूझण जाइ।
अंग उघाड़ै शूरवां, चोट मुँहैं मुँह खाइ ॥ 63 ॥
जब झूझै तब जाणिये, काछ खड़े क्या होइ।
चोट मुँहैं मुँह खाइगा, दादू शूरा सोइ ॥ 64 ॥
शूरातन सहजैं सदा, साच सेल हथियार।
साहिब के बल झूझतां, केते लिये सु मार ॥ 65 ॥
दादू जब लग जिय लागैं नहीं, प्रेम प्रीति के सेल।
तब लग पिव क्यों पाइये, नहिं बाजीगर का खेल ॥ 66 ॥
दादू जे तूं प्यासा प्रेम का, तो किसको सेतैं जीव।
शिर के साटै लीजिये, जे तुझ प्यारा पीव ॥ 67 ॥
दादू महा जोध मोटा बली, सो सदा हमारी भीर।
सब जग रूठा क्या करै, जहाँ तहाँ रणधीर ॥ 68 ॥
दादू रहते पहते राम जन, तिन भी माँड्या झूझ।
साचा मुँह मोड़ै नहीं, अर्थ इता ही बूझ ॥ 69 ॥
हरि भरोसा
दादू काँधे सबल के, निर्बाहेगा और।
आसन अपने ले चल्या, दादू निश्चल ठौर ॥ 70 ॥
दादू क्या बल कहा पतंग का, जलत न लागै बार।
बल तो हरि बलवंत का, जीवै जिहिं आधार ॥ 71 ॥
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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
राखणहारा राम है, शिर ऊपर मेरे।
दादू केते पच गये, बैरी बहुतेरे ॥ 72 ॥
शूरातन विनती
दादू बल तुम्हारे बापजी, गिनत न राणा राव।
मीर मलिक प्रधान पति, तुम बिन सब ही बाव ॥ 73 ॥
दादू राखी राम पर, अपणी आप संवाह।
दूजा को देखूं नहीं, ज्यों जाणें त्यों निर्वाह ॥ 74 ॥
तुम बिन मेरे को नहीं, हमको राखणहार।
जे तूं राखै सांइयां, तो कोइ न सकै मार ॥ 75 ॥
सब जग छाड़ै हाथ तैं, तो तुम जनि छाड़हु राम।
नहिं कुछ कारज जगत सौं, तुमहीं सेती काम ॥ 76 ॥
शूरातन
दादू जाते जीव तैं तो डरूं, जे जीव मेरा होइ।
जिन यहु जीव उपाइया, सार करेगा सोइ ॥ 77 ॥
दादू जिन को सांई पाधरा, तिन बंका नांही कोइ।
सब जग रूठा क्या करै, राखणहारा सोइ ॥ 78 ॥
दादू साचा साहिब शिर ऊपरै, तती न लागै बाव।
चरण कमल की छाया रहै, किया बहुत पसाव ॥ 79 ॥
विनती
दादू कहै-जे तूं राखै सांइयां, तो मार सकै ना कोइ।
बाल न बांका कर सकै, जे जग बैरी होइ ॥ 80 ॥
दादू राखणहारा राखै, तिसे कौन मारै।
उसे कौन डुबोवे, जिसे सांई तारै ॥
बाकी कौन बिगारै, जाकी आप सुधारै।
कहै दादू सो कबहूँ न हारै, जे जन सांई संभारै ॥ 81 ॥
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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24
निर्भय बैठा राम जप, कबहुँ काल न खाइ ।
जब दादू कुंजर चढै, तब सुनहाँ झख जाइ ॥ 82 ॥
कायर कूकर कोटि मिलि, भौंके अरु भागैं ।
दादू गरवा गुरुमुखी, हस्ति नहीं लागैं ॥ 83 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
चौबीसवां शूरातन कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 24 ॥ साखी 83 ॥
दादूराम
सत्यराम
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काल
का
अंग
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अथ काल का अंग २५
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
काल न सूझै कंध पर, मन चितवै बहु आश ।
दादू जीव जाणै नहीं, कठिन काल की पाश ॥ 2 ॥
दादू काल हमारे कंध चढ, सदा बजावै तूर ।
कालहरण कर्त्ता पुरुष, क्यों न सँभाले शूर ॥ 3 ॥
जहाँ जहाँ दादू पग धरै, तहाँ काल का फंध ।
सर ऊपर सांधे खड़ा, अजहुँ न चेते अंध ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
दादू काल गिरासन का कहै, काल रहित कह सोइ।
काल रहित सुमिरण सदा, बिना गिरासन होइ ॥ 5 ॥
दादू मरिये राम बिन, जीजे राम सँभाल।
अमृत पीवै आत्मा, यों साधू बंचै काल ॥ 6 ॥
दादू यहु घट काचा जल भरा, बिनशत्त नाहीं बार।
यहु घट फूटा जल गया, समझत नहीं गँवार ॥ 7 ॥
फूटी काया जाजरी, नव ठाहर काणी।
तामें दादू क्यों रहै, जीव सरीषा पाणी ॥ 8 ॥
बाव भरी इस खाल का, झूठा गर्व गुमान।
दादू विनशै देखतां, तिसका क्या अभिमान ॥ 9 ॥
दादू हम तो मूये मांहि हैं, जीवण का रू भरम।
झूठे का क्या गर्वबा, पाया मुझे मरम ॥ 10 ॥
यहु वन हरिया देखकर, फूल्यो फिरै गँवार।
दादू यहु मन मृगला, काल अहेड़ी लार ॥ 11 ॥
सब ही दीसैं काल मुख, आपा गह कर दीन्ह।
विनशै घट आकार का, दादू जे कुछ कीन्ह ॥ 12 ॥
काल कीट तन काठ को, जरा जन्म को खाइ।
दादू दिन दिन जीव की, आयु घटंती जाइ ॥ 13 ॥
काल गिरासे जीव को, पल पल श्वासैं श्वास।
पग पग मांहि दिन घड़ी, दादू लखै न तास ॥ 14 ॥
पाव पलक की सुधि नहीं, श्वास शब्द क्या होइ।
कर मुख मांहि मेलतां, दादू लखै न कोइ ॥ 15 ॥
दादू काया कारवीं, देखत ही चल जाइ।
जब लग श्वास शरीर में, राम नाम ल्यौ लाइ ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
दादू काया कारवीं, मोहि भरोसा नांहि।
आसन कुंजर शिर छत्र, विनश जाहिं क्षण मांहि ॥ 17 ॥
दादू काया कारवीं, पड़त न लागै बार।
बोलणहारा महल में, सो भी चालणहार ॥ 18 ॥
दादू काया कारवीं, कदे न चालै संग।
कोटि वर्ष जे जीवना, तऊ होइला भंग ॥ 19 ॥
कहतां, सुनतां, देखतां, लेतां, देतां प्राण।
दादू सो कतहूँ गया, माटी धरी मसाण ॥ 20 ॥
सींगी नाद न बाजहि, कत गये सो जोगी।
दादू रहते मढी में, करते रस भोगी ॥ 21 ॥
दादू जियरा जायगा, यहु तन माटी होइ।
जे उपज्या सो विनश है, अमर नहीं कलि कोइ ॥ 22 ॥
दादू देही देखतां, सब किसही की जाइ।
जब लग श्वास शरीर में, गोविन्द के गुण गाइ ॥ 23 ॥
दादू देही पाहुणी, हंस बटाऊ मांहि।
का जाणूं कब चालसी, मोहि भरोसा नांहि ॥ 24 ॥
दादू सबको पाहुणा, दिवस चार संसार।
औसर औसर सब चले, हम भी इहै विचार ॥ 25 ॥
भयमय पंथ बिख्रमता
सबको बैठे पंथ सिर, रहे बटाऊ होइ।
जे आये ते जाहिंगे, इस मारग सब कोइ ॥ 26 ॥
बेग बटाऊ पंथ सिर, अब विलम्ब न कीजे।
दादू बैठा क्या करे, राम जप लीजे ॥ 27 ॥
संझ्या चलै उतावला, बटाऊ वन-खंड मांहि।
बरियाँ नांहीं ढील की, दादू बेगि घर जांहि ॥ 28 ॥
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३. साखी भाग (उत्तरार्ध): समर्थ, उपदेश, चेतावनी, बेली व उपसंहार अंग
श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
दादू करह पलाण कर, को चेतन चढ जाइ।
मिल साहिब दिन देखतां, सांझ पड़े जनि आइ ॥ 29 ॥
पंथ दुहेला दूर घर, संग न साथी कोइ।
उस मारग हम जाहिंगे, दादू क्यों सुख सोइ ॥ 30 ॥
लंघण1 के लकु2 घणा, कपर3 चाट4 डीन्ह।
अलह पांधी5 पंथ6 में, बिहंदा7 आहीन8 ॥ 31 ॥
काल चितावणी
दादू हसतां रोतां पाहुणा, काहू छाड़ न जाइ।
काल खड़ा सिर ऊपरै, आवणहारा आइ ॥ 32 ॥
दादू जोरा बैरी काल है, सो जीव न जानै।
सब जग सूता नींदड़ी, इस तानै बानै ॥ 33 ॥
दादू करणी काल की, सब जग परलै होइ।
राम विमुख सब मर गये, चेत न देखै कोइ ॥ 34 ॥
साहिब को सुमिरै नहीं, बहुत उठावै भार।
दादू करणी काल की, सब परलै संसार ॥ 35 ॥
सूता काल जगाइ कर, सब पैसैं मुख मांहि।
दादू अचरज देखिया, कोई चेतै नांहि ॥ 36 ॥
सब जीव बिसाहैं काल को, कर कर क ोटि उपाइ।
साहिब को समझैं नहीं, यों परलै ह्वै जाइ ॥ 37 ॥
दादू कारण काल के, सकल संवारैं आप।
मीच बिसाहैं मरण को, दादू शोक संताप ॥ 38 ॥
दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ।
जीव बिसाहै काल को, मूढा मर मर जाइ ॥ 39 ॥
निर्मल नाम विसार कर, दादू जीव जंजाल।
नहीं तहाँ तैं कर लिया, मनसा मांहीं काल ॥ 40 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
सब जग छेली, काल कसाई, कर्द लिये कंठ काटै ।
पंच तत्त्व की पंच पंसुरी, खंड-खंड कर बांटै ॥ 41 ॥
काल झाल में जग जलै, भाज न निकसै कोइ ।
दादू शरणैं साच के, अभय अमर पद होइ ॥ 42 ॥
सब जग सूता नींद भर, जागै नाहीं कोइ ।
आगे पीछे देखिये, प्रत्यक्ष परलै होइ ॥ 43 ॥
आसक्ति मोह
ये सज्जन दुर्जन भये, अंत काल की बार ।
दादू इनमें को नहीं, विपति बटावनहार ॥ 44 ॥
संगी सज्जन आपणां, साथी सिरजनहार ।
दादू दूजा को नहीं, इहि कलि इहि संसार ॥ 45 ॥
काल चितावणी
ये दिन बीते चल गये, वे दिन आये धाइ ।
राम नाम बिन जीव को, काल गरासै जाइ ॥ 46 ॥
जे उपज्या सो विनश है, जे दीसै सो जाइ ।
दादू निर्गुण राम जप, निश्चल चित्त लगाइ ॥ 47 ॥
जे उपज्या सो विनश है, कोई थिर न रहाइ ।
दादू बारी आपणी, जे दीसै सो जाइ ॥ 48 ॥
दादू सब जग मर मर जात है, अमर उपावणहार ।
रहता रमता राम है, बहता सब संसार ॥ 49 ॥
संजीवन
दादू कोई थिर नहीं, यहु सब आवै जाइ ।
अमर पुरुष आपै रहै, कै साधु लयौ लाइ ॥ 50 ॥
काल चितावणी
यहु जग जाता देखकर, दादू करी पुकार ।
घड़ी महूरत चालनां, राखै सिरजनहार ॥ 51 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
दादू विषै सुख मांहि खेलतां, काल पहुँचा आइ।
उपजै विनशै देखतां, यहु जग यों ही जाइ ॥ 52 ॥
राम नाम बिन जीव जे, केते मुये अकाल।
मीच बिना जे मरत हैं, तातैं दादू साल ॥ 53 ॥
कठोरता
सर्प सिंह हस्ती घणा, राक्षस भूत प्रेत।
तिस वन में दादू पड़या, चेतै नहीं अचेत ॥ 54 ॥
पूत पिता थैं बीछुट्या, भूलि पड़या किस ठौर।
मरै नहिं उर फाट कर, दादू बड़ा कठोर ॥ 55 ॥
काल चेतावनी
जे दिन जाइ सो बहुरि न आवै, आयु घटै तन छीजै।
अंतकाल दिन आइ पहुंता, दादू ढील न कीजै ॥ 56 ॥
दादू अवसर चल गया, बरियाँ गई बिहाइ।
कर छिटके कहँ पाइये, जन्म अमोलक जाइ ॥ 57 ॥
दादू गाफिल है रह्या, गहिला हुवा गँवार।
सो दिन चित्त न आवई, सोवै पांव पसार ॥ 58 ॥
दादू काल हमारा कर गहै, दिन दिन खैंचत जाइ।
अजहुं जीव जागै नहीं, सोवत गई बिहाइ ॥ 59 ॥
सूता आवै सूता जाइ, सूता खेले सूता खाइ।
सूता लेवै सूता देवै, दादू सूता जाइ ॥ 60 ॥
दादू देखत ही भया, श्याम वर्ण तैं सेत।
तन मन यौवन सब गया, अजहुँ न हरि सौं हेत ॥ 61 ॥
दादू झूठे के घर देख कर, झूठे पूछे जाइ।
झूठे झूठा बोलते, रहे मसाणों आइ ॥ 62 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
दादू प्राण पयाना कर गया, माटी धरी मसाण ।
जालणहारे देखकर, चेतैं नहीं अजाण ॥ 63 ॥
दादू केई जाले केई जालिये, केई जालण जांहि ।
केई जालन की करैं, दादू जीवन नांहि ॥ 64 ॥
केई गाड़े केई गाड़िये, केई गाडण जांहि ।
केई गाड़ण की करैं, दादू जीवन नांहिं ॥ 65 ॥
दादू कहै-उठ रे प्राणी जाग जीव, अपना सजन संभाल ।
गाफिल नींद न कीजिये, आइ पहुंचा काल ॥ 66 ॥
समर्थ का शरणा तजै, गहै आन की औट ।
दादू बलवंत काल की, क्यों कर बंचै चोट ॥ 67 ॥
सजीव
अविनाशी के आसरे, अजरावर की ओट ।
दादू शरणैं सांच के, कदे न लागै चोट ॥ 68 ॥
काल चेतावनी
मूसा भागा मरण तैं, जहाँ जाइ तहाँ गोर ।
दादू स्वर्ग पयाल में, कठिन काल का शोर ॥ 69 ॥
सब मुख मांही काल के, मांड्या माया जाल ।
दादू गोर मसाण में, झंखे स्वर्ग पयाल ॥ 70 ॥
दादू मड़ा मसाण का, केता करै डफान ।
मृतक मुर्दा गोर का, बहुत करै अभिमान ॥ 71 ॥
राजा राणा राव मैं, मैं खानों सिर खान ।
माया मोह पसारै एता, सब धरती आसमान ॥ 72 ॥
पंच तत्त्व का पूतला, यहु पिंड सँवारा ।
मंदिर माटी मांस का, बिनशत नहिं बारा ॥ 73 ॥
हाड़ चाम का पिंजरा, बिच बोलणहारा ।
दादू तामें पैस कर, बहुत किया पसारा ॥ 74 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
बहुत पसारा कर गया, कुछ हाथ न आया।
दादू हरि की भक्ति बिन, प्राणी पछताया ॥ 75 ॥
माणस जल का बुदबुदा, पानी का पोटा।
दादू काया कोट में, मैं वासी मोटा ॥ 76 ॥
बाहर गढ निर्भय करै, जीबे के तांहीं।
दादू मांहीं काल है, सो जाणै नांहीं ॥ 77 ॥
चित्त कपटी
दादू साचे मत साहिब मिलै, कपट मिलेगा काल।
साचे परम पद पाइये, कपट काया में साल ॥ 78 ॥
काल चितावणी
मन ही मांही मीच है, सारों के शिर साल।
जे कुछ व्यापै राम बिन, दादू सोई काल ॥ 79 ॥
दादू जेती लहर विकार की, काल कँवल में सोइ।
प्रेम लहर सो पीव की, भिन्न-भिन्न यों होइ ॥ 80 ॥
दादू काल रूप मांही बसै, कोई न जानै ताहि।
यह कूड़ी करणी काल है, सब काहू को खाइ ॥ 81 ॥
दादू विष अमृत घट में बसैं, दोन्यों एकै ठाँव।
माया विषय विकार सब, अमृत हरि का नाँव ॥ 82 ॥
दादू कहाँ मुहम्मद मीर था, सब नबियों सिरताज।
सो भी मर माटी हुवा, अमर अलह का राज ॥ 83 ॥
केते मर मांटी भये, बहुत बड़े बलवन्त।
दादू केते ह्वै गये, दाना देव अनन्त ॥ 84 ॥
दादू धरती करते एक डग, दरिया करते फाल।
हाकों पर्वत फाड़ते, सो भी खाये काल ॥ 85 ॥
दादू सब जग कंपै काल तैं, ब्रह्मा विष्णु महेश।
सुर नर मुनिजन लोक सब, स्वर्ग रसातल शेष ॥ 86 ॥
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श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
चंद, सूर, धर, पवन, जल, ब्रह्मांड खंड प्रवेश।
सो काल डरै करतार तैं, जै जै तुम आदेश ॥ 87 ॥
पवना, पानी, धरती, अंबर, विनशै रवि, शशि, तारा।
पंत तत्त्व सब माया विनशै, मानुष कहा विचारा ॥ 88 ॥
दादू विनशैं तेज के, माटी के किस मांहि।
अमर उपावणहार है, दूजा कोई नांहि ॥ 89 ॥
प्राण पवन ज्यों पतला, काया करैं कमाइ।
दादू सब संसार में, क्यों हि गह्या न जाइ ॥ 90 ॥
नूर तेज ज्यों जोति है, प्राण पिंड यों होइ।
दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, साहिब के वश सोइ ॥ 91 ॥
स्वकीयमित्र शत्रुता
मन ही मांही ह्वै मरै, जीवै मन ही मांहि।
साहिब साक्षीभूत है, दादू दूषण नांहि ॥ 92 ॥
आपै मारै आपको, आप आप को खाइ।
आपै अपना काल है, दादू कहि समझाइ ॥ 93 ॥
आपै मारै आपको, यहु जीव विचारा।
साहिब राखणहारा है, सो हितू हमारा ॥ 94 ॥
अग्नि रूप पुरुष इक कहहिं, संगति देह सहज ही दहहिं।
दीसे माणस प्रत्यक्ष काल, ज्यों कर त्यों कर दादू टाल ॥ 95 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
पच्चीसवां कलि का अंग सम्पूर्ण ।। अंग 25 ।। साखी 95 ।।
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सजीवन का अंग
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अथ सजीवन का अंग २६
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥
दादू जे तूं जोगी गुरुमुखी, तो लेना तत्त्व विचार ।
गह आयुध गुरु ज्ञान का, काल पुरुष को मार ॥ 2 ॥
नाद बिंदु सौं घट भरै, सो जोगी जीवै ।
दादू काहे को मरै, राम रस पीवै ॥ 3 ॥
साधु जन की वासना, शब्द रहै संसार ।
दादू आतम ले मिलै, अमर उपावनहार ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
राम सरीखे ह्वै रहें, यहु नांही उनहार ।
दादू साधू अमर हैं, विनशै सब संसार ॥ 5 ॥
जे कोई सेवे राम को, तो राम सरीखा होइ ।
दादू नाम कबीर ज्यों, साखी बोलै सोइ ॥ 6 ॥
अर्थ न आया सो गया, आया सो क्यों जाइ ।
दादू तन मन जीवतां, आपा ठौर लगाइ ॥ 7 ॥
जे जन बेधे प्रीति सौं, सो जन सदा सजीव ।
उलट समाने आप में, अन्तर नांही पीव ॥ 8 ॥
दया विनती
दादू कहै-सब रंग तेरे तैं रंगे, तूं ही सब रंग मांहि ।
सब रंग तेरे तैं किये, दूजा कोई नांहि ॥ 9 ॥
सजीवन
काटै फन्द तो छूटै द्वन्द, छूटै द्वन्द तौ लागै बंद ।
लागै बन्द तो अमर कंद, अमर कंद दादू आनन्द ॥ 10 ॥
प्रश्न
कहँ जम जोरा भंजिये, कहाँ काल कौ दंड ।
कहाँ मीच को मारिये, कहाँ जरा सत खंड ॥ 11 ॥
अमर ठौर अविनाशी आसन, तहाँ निरंजन लाग रहे ।
दादू जोगी जुग जुग जीवै, काल ब्याल सब सहज गये ॥ 12 ॥
रोम रोम लै लाइ धुनि, ऐसे सदा अखंड ।
दादू अविनाशी मिले, तो जम को दीजे दंड ॥ 13 ॥
दादू जरा काल जामण मरण, जहाँ जहाँ जीव जाइ ।
भक्ति परायण लीन मन, ताको काल न खाइ ॥ 14 ॥
मरणा भागा मरण तैं, दुःखैं नाठा दुःख ।
दादू भय सौं भय गया, सुःखैं छूटा सुःख ॥ 15 ॥
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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
जीवन मरण
जीवित मिले सो जीवते, मूये मिल मर जाइ ।
दादू दोन्यों देखकर, जहाँ जानैं तहँ लाइ ॥ 16 ॥
सजीवन
दादू साधन सब किया, जब उनमन लागा मन ।
दादू सुस्थिर आत्मा, यों जुग जुग जीवैं जन ॥ 17 ॥
रहते सेती लाग रहु, तो अजरावर होइ ।
दादू देख विचार कर, जुदा न जीवै कोइ ॥ 18 ॥
जेती करणी काल की, तेती परिहर प्राण ।
दादू आतमराम सौं, जे तूं खरा सुजाण ॥ 19 ॥
विष अमृत घट में बसै, विरला जानै कोइ ।
जिन विष खाया ते मुये, अमर अमी सौं होइ ॥ 20 ॥
दादू सब ही मर रहे, जीवै नांही कोइ ।
सोई कहिये जीवता, जे कलि अजरावर होइ ॥ 21 ॥
देह रहै संसार में, जीव राम के पास ।
दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥ 22 ॥
काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।
दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥ 23 ॥
दादू तज संसार सब, रहे निराला होइ ।
अविनाशी के आसरे, काल न लागे कोइ ॥ 24 ॥
जागहु लागहु राम सौं, रैन बिहानी जाइ ।
सुमिर सनेही आपणा, दादू काल न खाइ ॥ 25 ॥
दादू जागहु लागहु राम सौं, छाड़हु विषय विकार ।
जीवहु पीवहु राम रस, आतम साधन सार ॥ 26 ॥
मरै तो पावै पीव को, जीवत बंचै काल ।
दादू निर्भय नाम ले, दोनों हाथ दयाल ॥ 27 ॥
- 259 -
श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
दादू मरणे को चला, सजीवन के साथ ।
दादू लाहा मूल सौं, दोनों आये हाथ ॥ 28 ॥
करुणा
दादू जाता देखिये, लाहा मूल गँवाइ ।
साहिब की गति अगम है, सो कुछ लखी न जाइ ॥ 29 ॥
सजीवन
साहिब मिलै तो जीविये, नहीं तो जीवै नांहि ।
भावै अनंत उपाय कर, दादू मूवों मांहि ॥ 30 ॥
सजीविन साधै नहीं, तातैं मर मर जाइ ।
दादू पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ ॥ 31 ॥
दिन दिन लहुड़े होंहि सब, कहैं मोटा होता जाइ ।
दादू दिन दिन ते बढ़ें, जे रहैं राम ल्यौ लाइ ॥ 32 ॥
न जाणूं हाँजी, चुप गह, मेट अग्नि की झाल ।
सदा सजीवन सुमिरिये, दादू बंचै काल ॥ 33 ॥
जीवन मुक्ति
दादू जीवित छूटै देह गुण, जीवित मुक्ता होइ ।
जीवित काटै कर्म सब, मुक्ति कहावै सोइ ॥ 34 ॥
दादू जीवित ही दुस्तर तिरे, जीवित लंघे पार ।
जीवित पाया जगद्गुरु, दादू ज्ञान विचार ॥ 35 ॥
जीवित जगपति को मिलै, जीवित आत्मराम ।
जीवित दर्शन देखिये, दादू मन विश्राम ॥ 36 ॥
जीवित पाया प्रेम रस, जीवित पिया अघाइ ।
जीवित पाया स्वाद सुख, दादू रहे समाइ ॥ 37 ॥
जीवित भागे भ्रम सब, छूटे कर्म अनेक।
जीवित मुक्त सद्गति भये, दादू दर्शन एक ॥ 38 ॥
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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
जीवित मेला ना भया, जीवित परस न होइ।
जीवित जगपति ना मिले, दादू बूड़े सोइ ॥ 39 ॥
जीवित दुस्तर ना तिरे, जीवित न लंघे पार।
जीवित निर्भय ना भये, दादू ते संसार ॥ 40 ॥
जीवित प्रकट ना भया, जीवित परिचय नांहि।
जीवित न पाया पीव को, बूड़े भवजल मांहि ॥ 41 ॥
जीवित पद पाया नहीं, जीवित मिले न जाइ।
जीवित जे छूटे नहीं, दादू गये विलाइ ॥ 42 ॥
दादू छूटे जीवतां, मूवाँ छूटे नांहि।
मूवाँ पीछे छूटिये, तो सब आये उस मांहि ॥ 43 ॥
मूवाँ पीछे मुक्ति बतावैं, मूवाँ पीछे मेला।
मूवाँ पीछे अमर अभय पद, दादू भूले गहिला ॥ 44 ॥
मूवाँ पीछे वैकुंठ वासा, मूवाँ स्वर्ग पठावैं।
मूवाँ पीछे मुक्ति बतावैं, दादू जग बोरावैं ॥ 45 ॥
मूवाँ पीछे पद पहुँचावैं, मूवाँ पीछे तारैं।
मूवाँ पीछे सद्गति होवै, दादू जीवित मारैं ॥ 46 ॥
मूवाँ पीछे भक्ति बतावैं, मूवाँ पीछे सेवा।
मूवाँ पीछे संयम राखैं, दादू दोजख देवा ॥ 47 ॥
सजीवन
दादू धरती क्या साधन किया, अंबर कौन अभ्यास ?
रवि शशि किस आरंभ तैं ? अमर भये निज दास ॥ 48 ॥
साहिब मारे ते मुये, कोई जीवै नांहि।
साहिब राखे ते रहे, दादू निज घर मांहि ॥ 49 ॥
जे जन राखे राम जी, अपने अंग लगाइ।
दादू कुछ व्यापै नहीं, जे कोटि काल झख जाइ ॥ 50 ॥
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श्री दादूवाणी-सजीवन का अंग 26
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरू-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
छब्बीसवां सजीवन का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 26 ॥ साखी 50 ॥
दादूराम
सत्यराम
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पारिख
का
अंग
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अथ पारिख का अंग २७
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
साधुत्व परीक्षा
दादू मन चित आतम देखिये, लागा है किस ठौर?
जहँ लागा तैसा जाणिये, का देखै दादू और ॥ 2 ॥
दादू साधु परखिये, अन्तर आतम देख ।
मन मांहि माया रहै, कै आपै आप अलेख ॥ 3 ॥
दादू मन की देख कर, पीछे धरिये नांव ।
अन्तरगति की जे लखैं, तिनकी मैं बलि जांव ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27
यहु परख सराफी ऊपली, भीतर की यहु नांहि ।
अन्तर की जाणैं नहीं, ता तैं खोटा खांहि ॥ 5 ॥
दादू बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ ।
बाहर दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥ 6 ॥
दादू जे नांही सो सब कहैं, है सो कहै न कोइ ।
खोटा खरा परखिये, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥ 7 ॥
दह दिशि फिरै सो मन है, आवै जाइ सो पवन ।
राखणहारा प्राण है, देखणहारा ब्रह्म ॥ 8 ॥
घट की भान अनीति सब, मन की मेट उपाध ।
दादू परिहर पंच की, राम कहैं ते साध ॥ 9 ॥
अर्थ आया तब जानिये, जब अनर्थ छूटे ।
दादू भाँडा भरम का, गिरि चौड़े फूटे ॥ 10 ॥
दादू दूजा कहबे को रह्या, अन्तर डारा धोइ ।
ऊपर की ये सब कहैं, मांहि न देखै कोइ ॥ 11 ॥
दादू जैसे मांहि जीव रहै, तैसी आवै बास ।
मुख बोले तब जानिये, अन्तर का परकास ॥ 12 ॥
दादू ऊपर देख कर, सबको राखै नांव ।
अंतरगति की जे लखैं, तिनकी मैं बलि जांव ॥ 13 ॥
जग जन विपरीत
तन मन आत्म एक है, दूजा सब उनहार ।
दादू मूल पाया नहीं, दुविधा भ्रम विकार ॥ 14 ॥
काया के सब गुण बँधे, चौरासी लख जीव ।
दादू सेवक सो नहीं, जे रंग राते पीव ॥ 15 ॥
काया के वश जीव सब, ह्वै गये अनन्त अपार ।
दादू काया वश करै, निरंजन निराकार ॥ 16 ॥
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