सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-काल का अंग 25
दादू काल गिरासन का कहै, काल रहित कह सोइ।
काल रहित सुमिरण सदा, बिना गिरासन होइ ॥ 5 ॥
दादू मरिये राम बिन, जीजे राम सँभाल।
अमृत पीवै आत्मा, यों साधू बंचै काल ॥ 6 ॥
दादू यहु घट काचा जल भरा, बिनशत्त नाहीं बार।
यहु घट फूटा जल गया, समझत नहीं गँवार ॥ 7 ॥
फूटी काया जाजरी, नव ठाहर काणी।
तामें दादू क्यों रहै, जीव सरीषा पाणी ॥ 8 ॥
बाव भरी इस खाल का, झूठा गर्व गुमान।
दादू विनशै देखतां, तिसका क्या अभिमान ॥ 9 ॥
दादू हम तो मूये मांहि हैं, जीवण का रू भरम।
झूठे का क्या गर्वबा, पाया मुझे मरम ॥ 10 ॥
यहु वन हरिया देखकर, फूल्यो फिरै गँवार।
दादू यहु मन मृगला, काल अहेड़ी लार ॥ 11 ॥
सब ही दीसैं काल मुख, आपा गह कर दीन्ह।
विनशै घट आकार का, दादू जे कुछ कीन्ह ॥ 12 ॥
काल कीट तन काठ को, जरा जन्म को खाइ।
दादू दिन दिन जीव की, आयु घटंती जाइ ॥ 13 ॥
काल गिरासे जीव को, पल पल श्वासैं श्वास।
पग पग मांहि दिन घड़ी, दादू लखै न तास ॥ 14 ॥
पाव पलक की सुधि नहीं, श्वास शब्द क्या होइ।
कर मुख मांहि मेलतां, दादू लखै न कोइ ॥ 15 ॥
दादू काया कारवीं, देखत ही चल जाइ।
जब लग श्वास शरीर में, राम नाम ल्यौ लाइ ॥ 16 ॥
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