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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 504 में से

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पृष्ठ 255

श्री दादूवाणी-काल का अंग 25
बहुत पसारा कर गया, कुछ हाथ न आया।
दादू हरि की भक्ति बिन, प्राणी पछताया ॥ 75 ॥
माणस जल का बुदबुदा, पानी का पोटा।
दादू काया कोट में, मैं वासी मोटा ॥ 76 ॥
बाहर गढ निर्भय करै, जीबे के तांहीं।
दादू मांहीं काल है, सो जाणै नांहीं ॥ 77 ॥
चित्त कपटी
दादू साचे मत साहिब मिलै, कपट मिलेगा काल।
साचे परम पद पाइये, कपट काया में साल ॥ 78 ॥
काल चितावणी
मन ही मांही मीच है, सारों के शिर साल।
जे कुछ व्यापै राम बिन, दादू सोई काल ॥ 79 ॥
दादू जेती लहर विकार की, काल कँवल में सोइ।
प्रेम लहर सो पीव की, भिन्न-भिन्न यों होइ ॥ 80 ॥
दादू काल रूप मांही बसै, कोई न जानै ताहि।
यह कूड़ी करणी काल है, सब काहू को खाइ ॥ 81 ॥
दादू विष अमृत घट में बसैं, दोन्यों एकै ठाँव।
माया विषय विकार सब, अमृत हरि का नाँव ॥ 82 ॥
दादू कहाँ मुहम्मद मीर था, सब नबियों सिरताज।
सो भी मर माटी हुवा, अमर अलह का राज ॥ 83 ॥
केते मर मांटी भये, बहुत बड़े बलवन्त।
दादू केते ह्वै गये, दाना देव अनन्त ॥ 84 ॥
दादू धरती करते एक डग, दरिया करते फाल।
हाकों पर्वत फाड़ते, सो भी खाये काल ॥ 85 ॥
दादू सब जग कंपै काल तैं, ब्रह्मा विष्णु महेश।
सुर नर मुनिजन लोक सब, स्वर्ग रसातल शेष ॥ 86 ॥

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