सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
अथ लै का अंग ७
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
लय का स्वरूप लक्षण
दादू लै लागी तब जाणिये, जे कबहुँ छूट न जाइ ।
जीवत यों लागी रहै, मूवां मंझ समाइ ॥ 2 ॥
दादू जे नर प्राणी लै गता, सोई गत ह्वै जाइ ।
जे नर प्राणी लै रता, सो सहजैं रहै समाइ ॥ 3 ॥
सब तज गुण आकार के, निश्चल मन ल्यौ लाइ ।
आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहै समाइ ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-लै का अंग 7
तन मन पवना पंच गह, निरंजन ल्यौ लाइ ।
जहाँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू सहज समाइ ॥ 5 ॥
अर्थ अनुपम आप है, और अनर्थ भाई ।
दादू ऐसी जानि कर, तासौं ल्यौ लाई ॥ 6 ॥
लै लगाने की विधि
ज्ञान भक्ति मन मूल गह, सहज प्रेम ल्यौ लाइ ।
दादू सब आरंभ तजि, जनि काहू संग जाइ ॥ 7 ॥
अगम संस्कार
पहली था सो अब भया, अब सो आगे होइ ।
दादू तीनों ठौर की, बूझै बिरला कोइ ॥ 8 ॥
अध्यात्म
योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव ।
मुक्ता द्वारा महल का, इहै भक्ति का भाव ॥ 9 ॥
सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि ।
लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 10 ॥
दादू बिन पायन का पंथ है, क्यों कर पहुँचे प्राण ।
विकट घाट औखट खरे, मांहि शिखर असमान ॥ 11 ॥
मन ताजी चेतन चढै, ल्यौ की करै लगाम ।
शब्द गुरु का ताजणा, कोई पहुँचे साधु सुजान ॥ 12 ॥
सूक्ष्म मार्ग
किहिं मारग ह्वै आइया, किहिं मारग ह्वै जाइ ।
दादू कोई ना लहै, केते करैं उपाइ ॥ 13 ॥
शून्य हि मार्ग आइया, शून्य हि मारग जाइ ।
चेतन पैंडा सुरति का, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 14 ॥
दादू पारब्रह्म पैंडा दिया, सहज सुरति लै सार ।
मन का मारग मांहि घर, संगी सिरजनहार ॥ 15 ॥
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श्री दादूवाणी-लै का अंग 7
लय
राम कहै जिस ज्ञान सौं, अमृत रस पीवै ।
दादू दूजा छाड़ि सब, लै लागी जीवै ॥ 16 ॥
राम रसायन पीवतां, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ ।
दादू आत्म राम सौं, सदा रहै ल्यौ लाइ ॥ 17 ॥
रस रंग
सुरति समाइ सन्मुख रहै, जुग जुग जन पूरा।
दादू प्यासा प्रेम का, रस पीवै सूरा ॥ 18 ॥
अध्यात्म
दादू जहाँ जगद्गुरु रहत है, तहाँ जे सुरति समाइ ।
तो इन ही नैनहुँ उलट कर, कौतुक देखै आइ ॥ 19 ॥
अख्यूं पसण के पिरी, भिरे उलथौं मंझ।
जिते बैठो मां पिरी, निहारी दो हंझ ॥ 20 ॥
दादू उलट अनूठा आप में, अंतर सोध सुजाण ।
सो ढिग तेरे बावरे, तज बाहर की बाण ॥ 21 ॥
सुरति अपूठी फेरि कर, आत्म मांही आन ।
लाग रहै गुरुदेव सौं, दादू सोई सयान ॥ 22 ॥
सूक्ष्म सौंज अर्चा बंदगी
जहाँ आत्म तहँ राम है, सकल रह्या भरपूर ।
अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, दादू सेवक सूर ॥ 23 ॥
दादू अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, सदा सुरति सौं गाइ ।
यहु मन नाचै मगन ह्वै, भावै ताल बजाइ ॥ 24 ॥
दादू पावै सुरति सौं, बाणी बाजै ताल ।
यहु मन नाचै प्रेम सौं, आगे दीन दयाल ॥ 25 ॥
दादू सब बातन की एक है, दुनिया तैं दिल दूर ।
सांई सेती संग कर, सहज सुरति लै पूर ॥ 26 ॥
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श्री दादूवाणी-लै का अंग 7
दादू एक सुरति सौं सब रहें, पंचों उनमनि लाग।
यहु अनुभव उपदेश यहु, यहु परम योग वैराग ॥ 27 ॥
दादू सहजैं सुरति समाइ ले, पारब्रह्म के अंग।
अरस परस मिल एक है, सन्मुख रहबा संग ॥ 28 ॥
सुरति सदा सन्मुख रहै, जहाँ तहाँ लै लीन।
सहज रूप सुमिरण करै, निष्कामी दादू दीन ॥ 29 ॥
सुरति सदा साबति रहै, तिनके मोटे भाग।
दादू पीवैं राम रस, रहें निरंजन लाग ॥ 30 ॥
सूक्ष्म सौंज
दादू सेवा सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं लाइ।
जहाँ अविनाशी देव है, तहँ सुरति बिना को जाइ ॥ 31 ॥
विनती
दादू ज्यों वै बरत गगन तैं टूटै, कहाँ धरणी कहँ ठाम।
लागी सुरति अंग तैं छूटै, सो कत जीवै राम ॥ 32 ॥
अध्यात्म
सहज योग सुख में रहै, दादू निर्गुण जाण।
गंगा उलटी फेरि कर, जमुना मांहि आण ॥ 33 ॥
लय
परआतम सो आत्मा, ज्यों जल उदक समान।
तन मन पाणी लौंण ज्यों, पावै पद निर्वाण ॥ 34 ॥
मन ही सौं मन सेविये, ज्यों जल जलहि समाइ।
आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 35 ॥
छाड़ै सुरति शरीर को, तेज पुंज में आइ।
दादू ऐसे मिल रहै, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 36 ॥
यों मन तजै शरीर को, ज्यों जागत सो जाइ।
दादू बिसरै देखतां, सहज सदा ल्यौ लाइ ॥ 37 ॥
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श्री दादूवाणी-लै का अंग 7
जिहि आसन पहली प्राण था, तिहि आसन ल्यौ लाइ ।
जे कुछ था सोई भया, कछू न व्यापै आइ ॥ 38 ॥
तन मन अपणा हाथ कर, ताहि सौं ल्यौ लाइ ।
दादू निर्गुण राम सौं, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 39 ॥
एक मना लागा रहै, अंत मिलेगा सोइ ।
दादू जाके मन बसै, ताको दर्शन होइ ॥ 40 ॥
दादू निबहै त्यौं चलै, धीरे धीरज मांहि ।
परसेगा पीव एक दिन, दादू थाके नांहि ॥ 41 ॥
लय
जब मन मृतक ह्वै रहै, इन्द्री बल भागा ।
काया के सब गुण तजै, निरंजन लागा ॥ 42 ॥
आदि अंत मधि एक रस, टूटै नहीं धागा ।
दादू ऐकै रह गया, तब जाणी जागा ॥ 43 ॥
जब लग सेवग तन धरै, तब लग दूसर आहि ।
एकमेक ह्वै मिलि रहै, तो रस पीवन तैं जाइ ॥ 44 ॥
ये दोनों ऐसी कहैं, कीजे कौन उपाइ ।
ना मैं एक, न दूसरा, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 45 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सातवां लै का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 7 ॥ साखी 45 ॥
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निष्कर्म पतिव्रता
का अंग
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अथ निष्कर्मी पतिव्रता का अंग ८
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
एक तुम्हारे आसरे, दादू इहि विश्वास ।
राम भरोसा तोर है, नहिं करणी की आस ।। 2 ।।
रहणी राजस ऊपजै, करणी आपा होइ ।
सबथैं दादू निर्मला, सुमिरण लागा सोइ ।। 3 ।।
दादू मन अपना लै लीन कर, करणी सब जंजाल ।
साधू सहजैं निर्मला, आपा मेट संभाल ।। 4 ।।
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
दादू सिद्धि हमारे सांइयां, करामात करतार ।
ऋद्धि हमारे राम है, आगम अलख अपार ॥ 5 ॥
गोविन्द गोसांई तुम्हीं आमचे गुरु, तुम्हे अमचां ज्ञान ।
तुम्हे अमचे देव, तुम्हे अमचा ध्यान ॥ 6 ॥
तुम्हीं आमची पूजा, तुम्हीं आमची पाती ।
तुम्हीं आमचा तीर्थ, तुम्हीं आमची जाती ॥ 7 ॥
तुम्हीं आमचा नाद, तुम्हीं आमचा भेद ।
तुम्हीं आमचा पुराण, तुम्हीं आमचा वेद ॥ 8 ॥
तुम्हीं आमची युक्ति, तुम्हीं आमचा योग ।
तुम्हीं आमचा वैराग्य, तुम्हीं आमचा भोग ॥ 9 ॥
तुम्हीं आमची जीवनी, तुम्हीं आमचा जप ।
तुम्हीं आमचा साधन, तुम्हीं आमचा तप ॥ 10 ॥
तुम्हीं आमचा शील, तुम्हीं आमचा संतोष ।
तुम्हीं आमची मुक्ति, तुम्हीं आमचा मोक्ष ॥ 11 ॥
तुम्हीं आमचा शिव, तुम्हीं आमची शक्ति।
तुम्हीं आमचा आगम, तुम्हीं आमची उक्ति ॥ 12 ॥
तूं सत्य तूं अविगत तूं अपरंपार, तूं निराकार तुम्हचा नाम ।
दादू चा विश्राम, देहु देहु अवलम्बन राम ॥ 13 ॥
दादू राम कहूँ ते जोड़बा, राम कहूँ ते साखि ।
राम कहूँ ते गाइबा, राम कहूँ ते राखि ॥ 14 ॥
दादू कुल हमारे केशवा, सगा तो सिरजनहार ।
जाति हमारी जगद्गुरू, परमेश्वर परिवार ॥ 15 ॥
दादू एक सगा संसार में, जिन हम सिरजे सोइ ।
मनसा वाचा कर्मणा, और न दूजा कोइ ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
स्मरण नाम निःसंशय
सांई सन्मुख जीवतां, मरतां सन्मुख होइ ।
दादू जीवन मरण का, सोच करै जनि कोइ ॥ 17 ॥
पतिव्रत
साहिब मिल्या तो सब मिले, भेंटे भँटा होइ ।
साहिब रह्या तो सब रहे, नहीं तो नाहीं कोइ ॥ 18 ॥
दादू रीझै राम पर, अनत न रीझै मन।
मीठा भावै एक रस, दादू सोई जन ॥ 19 ॥
दादू मेरे हृदय हरि बसै, दूजा नांही और।
कहो कहाँ धौं राखिये, नहीं आन को ठौर ॥ 20 ॥
दादू नारायण नैना बसै, मनही मोहन राइ।
हिरदा मांही हरि बसै, आतम एक समाइ ॥ 21 ॥
दादू तन मन मेरा पीव सौं, एक सेज सुख सोइ।
गहिला लोग न जाणही, पच पच आपा खोइ ॥ 22 ॥
दादू एक हमारे उर बसै, दूजा मेल्या दूर।
दूजा देखत जाइगा, एक रह्या भरपूर ॥ 23 ॥
निश्चल का निश्चल रहै, चंचल का चल जाइ।
दादू चंचल छाड़ि सब, निश्चल सौं ल्यौ लाइ ॥ 24 ॥
साहिब रहतां सब रह्या, साहिब जातां जाइ।
दादू साहिब राखिये, दूजा सहज स्वभाइ ॥ 25 ॥
मन चित मनसा पलक मैं, सांई दूर न होइ।
निष्कामी निरखै सदा, दादू जीवन सोइ ॥ 26 ॥
कथनी बिना करणी
जहाँ नाम तहँ नीति चाहिये, सदा राम का राज।
निर्विकार तन मन भया, दादू सीझै काज ॥ 27 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
सुन्दरी विलाप
जिसकी खूबी, खूब सब, सोई खूब सँभार।
दादू सुन्दरी खूब सौं, नखशिख साज सँवार ॥ 28 ॥
दादू पंच आभूषण पीव कर, सोलह सब ही ठांव।
सुन्दरी यहु श्रृंगार करि, ले ले पीव का नांव ॥ 29 ॥
यहु व्रत सुन्दरी ले रहै, तो सदा सुहागिनी होइ।
दादू भावै पीव कौं, ता सम और न कोइ ॥ 30 ॥
पतिव्रता निष्काम
साहिब जी का भावता, कोई करै कलि मांहि।
मनसा वाचा कर्मना, दादू घटि घटि नांहि ॥ 31 ॥
आज्ञा मांहीं बैसै ऊठै, आज्ञा आवै जाइ।
आज्ञा मांहीं लेवै देवै, आज्ञा पहरै खाइ ॥ 32 ॥
आज्ञा मांही बाहर भीतर, आज्ञा रहै समाइ।
आज्ञा मांही तन मन राखै, दादू रहै ल्यौ लाइ ॥ 33 ॥
पतिव्रता गृह आपने, करै खसम की सेव।
ज्यों राखै त्यों ही रहै, आज्ञाकारी टेव ॥ 34 ॥
सुन्दरी विलाप
दादू नीच ऊँच कुल सुन्दरी, सेवा सारी होइ।
सोई सुहागिन कीजिये, रूप न पीजे धोइ ॥ 35 ॥
दादू जब तन मन सौंप्या राम को, ता सन क्या व्यभिचार।
सहज शील संतोष सत, प्रेम भक्ति लै सार ॥ 36 ॥
पर पुरुषा सब परहरै, सुन्दरी देखै जागि।
अपणा पीव पिछाण करि, दादू रहिये लागि ॥ 37 ॥
आन पुरुष हूँ बहिनड़ी, परम पुरुष भरतार।
हूँ अबला समझं नहीं, तूं जानै करतार ॥ 38 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
जिसका तिसकौं दीजिये, सांई सन्मुख आइ।
दादू नख शिख सौंप सब, जनि यहु बंट्या जाइ ॥ 39 ॥
सारा दिल सांई सौं राखै, दादू सोई सयान।
जे दिल बंटै आपना, सो सब मूढ़ अयान ॥ 40 ॥
दादू सारों सौं दिल तोरि कर, सांई सौं जोड़ै।
सांई सेती जोड़ करि, काहे को तोड़ै ॥ 41 ॥
साहिब देवै राखणा, सेवक दिल चोरै।
दादू सब धन साह का, भूला मन थोरै ॥ 42 ॥
पतिव्रत
दादू मनसा वाचा कर्मना, अंतर आवै एक।
ताको प्रत्यक्ष राम जी, बातें और अनेक ॥ 43 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मना, हिरदै हरि का भाव।
अलख पुरुष आगे खड़ा, ताके त्रिभुवन राव ॥ 44 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मना, हरि जी सौं हित होइ।
साहिब सन्मुख संग है, आदि निरंजन सोइ ॥ 45 ॥
दादू मनसा वाचा कर्मणा, आतुर कारण राम।
सम्रथ सांई सब करै, परगट पूरे काम ॥ 46 ॥
नारी पुरुषा देख करि, पुरुषा नारी होइ।
दादू सेवक राम का, शीलवन्त है सोइ ॥ 47 ॥
आन लग्न व्यभिचार
पर पुरुषा रत बांझणी, जाणे जे फल होइ।
जन्म बिगोवै आपना, दादू निष्फल सोइ ॥ 48 ॥
दादू तज भरतार को, पर पुरुषा रत होइ।
ऐसी सेवा सब करैं, राम न जाने सोइ ॥ 49 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
पतिव्रत
नारी सेवक तब लगै, जब लग सांई पास।
दादू परसै आन को, ताकी कैसी आस ॥ 50 ॥
आन लगन व्यभिचार
दादू नारी पुरुष को, जाने जे वश होइ।
पीव की सेवा ना करै, कामणिगारी सोइ ॥ 51 ॥
करूणा
कीया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार।
क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भर्तार ॥ 52 ॥
आन लग्न व्यभिचार
करामात कलंक है, जाकै हिरदै एक।
अति आनन्द व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥ 53 ॥
दादू पतिव्रता के एक है, व्यभिचारिणी के दोइ।
पतिव्रता व्यभिचारिणी, मेला क्यों कर होइ ॥ 54 ॥
पतिव्रता के एक है, दूजा नांही आन।
व्यभिचारिणी के दोइ हैं, पर घर एक समान ॥ 55 ॥
सुन्दरी सुहाग
दादू पुरुष हमारा एक है, हम नारी बहु अंग।
जे जे जैसी ताहि सौं, खेलैं तिस हि रंग ॥ 56 ॥
पतिव्रत
दादू रहता राखिये, बहता देइ बहाइ।
बहते संग न जाइये, रहते सौं ल्यौ लाइ ॥ 57 ॥
जनि बाझैं काहू कर्म सौं, दूजै आरंभ जाइ।
दादू ऐकै मूल गहि, दूजा देइ बहाइ ॥ 58 ॥
बावें देखि न दाहिने, तन मन सन्मुख राखि।
दादू निर्मल तत्त्व गह, सत्य शब्द यहु साखि ॥ 59 ॥
दादू दूजा नैन न देखिये, श्रवणहुँ सुने न जाइ।
जिह्या आन न बोलिये, अंग न और सुहाइ ॥ 60 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
चरणहुँ अनत न जाइये, सब उलटा मांहि समाइ ।
उलट अपूठा आप में, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 61 ॥
दादू दूजे अंतर होत है, जनि आने मन मांहि ।
तहाँ ले मन को राखिये, जहँ कुछ दूजा नांहि ॥ 62 ॥
भ्रम विध्वंस
भ्रम तिमिर भाजै नहीं, रे जिय आन उपाइ ।
दादू दीपक साज ले, सहजैं ही मिट जाइ ॥ 63 ॥
दादू सो वेदन नहीं बावरे, आन किये जे जाइ ।
सब दुख भंजन सांइयाँ, ताहि सौं ल्यौ लाइ ॥ 64 ॥
दादू औषध मूली कुछ नहीं, ये सब झूठी बात ।
जे औषध ही जीविये, तो काहे को मर जात ॥ 65 ॥
पतिव्रत
मूल गहै सो निश्चल बैठा, सुख में रहै समाइ ।
डाल पान भ्रमत फिरै, वेदों दिया बहाइ ॥ 66 ॥
सो धक्का सुनहाँ को देवै, घर बाहर काढै ।
दादू सेवक राम का, दरबार न छाड़े ॥ 67 ॥
साहिब का दर छाड़ि कर, सेवक कहीं न जाय ।
दादू बैठा मूल गह, डालों फिरै बलाय ॥ 68 ॥
दादू जब लग मूल न सींचिये, तब लग हरा न होइ ।
सेवा निष्फल सब गई, फिर पछताना सोइ ॥ 69 ॥
दादू सींचे मूल के, सब सींच्या विस्तार ।
दादू सींचे मूल बिन, बाद गई बेगार ॥ 70 ॥
सब आया उस एक में, डाल पान फल फूल ।
दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड़या मूल ॥ 71 ॥
खेत न निपजै बीज बिन, जल सींचे क्या होइ ।
सब निष्फल दादू राम बिन, जानत है सब कोइ ॥ 72 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
दादू जब मुख मांहि मेलिये, तब सब ही तृप्ता होइ।
मुख बिन मेले आन दिश, तृप्ति न माने कोइ ॥ 73 ॥
जब देव निरंजन पूजिये, तब सब आया उस मांहि।
डाल पान फल फूल सब, दादू न्यारे नांहि ॥ 74 ॥
दादू टीका राम को, दूसर दीजे नांहि।
ज्ञान ध्यान तप भेष पक्ष, सब आये उस मांहि ॥ 75 ॥
साधू राखै राम को, संसारी माया।
संसारी पल्लव गहै, मूल साधू पाया ॥ 76 ॥
आन लगन व्यभिचार
दादू जे कुछ कीजिये, अविगत बिन आराध।
कहबा सुनबा देखबा, करबा सब अपराध ॥ 77 ॥
सब चतुराई देखिए, जे कुछ कीजै आन।
दादू आपा सौंपि सब, पीव को लेहु पिछान ॥ 78 ॥
पतिव्रत
दादू दूजा कुछ नहीं, एक सत्य कर जान।
दादू दूजा क्या करै, जिन एक लिया पहचान ॥ 79 ॥
दादू कोई वांछै मुक्ति फल, कोइ अमरापुर वास।
कोई वांछै परमगति, दादू राम मिलन की प्यास ॥ 80 ॥
तुम हरि हिरदै हेत सौं, प्रगटहु परमानन्द।
दादू देखै नैन भर, तब केता होइ आनन्द ॥ 81 ॥
प्रेम पियाला राम रस, हमको भावै येहि।
रिधि सिधि मांगैं मुक्ति फल, चाहें तिनको देहि ॥ 82 ॥
कोटि वर्ष क्या जीवना, अमर भये क्या होइ।
प्रेम भक्ति रस राम बिन, का दादू जीवन सोइ ॥ 83 ॥
कछू न कीजे कामना, सगुण निर्गुण होहि।
पलट जीव तैं ब्रह्म गति, सब मिलि मानैं मोहि ॥ 84 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
घट अजरावर ह्वै रहै, बन्धन नांही कोइ ।
मुक्ता चौरासी मिटै, दादू संशय सोइ ॥ 85 ॥
लाँबि रस
निकटि निरंजन लाग रहु, जब लग अलख अभेव ।
दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥ 86 ॥
परिचय पतिव्रत
सालोःय संगति रहै, सामीप्य सन्मुख सोइ ।
सारूप्य सारीखा भया, सायुज्य एकै होइ ॥ 87 ॥
राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार ।
अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥ 88 ॥
आन लग्न व्यभिचार
स्वारथ सेवा कीजिये, ताथैं भला न होइ ।
दादू ऊसर बाहि कर, कोठा भरै न कोइ ॥ 89 ॥
सुत वित मांगैं बावरे, साहिब सी निधि मेलि ।
दादू वे निष्फल गये, जैसे नागर बेलि ॥ 90 ॥
फल कारण सेवा करै, जाचै त्रिभुवन राव ।
दादू सो सेवक नहीं, खेलै अपना दाव ॥ 91 ॥
सहकामी सेवा करैं, मागैं मुग्ध गँवार ।
दादू ऐसे बहुत हैं, फल के भूँचनहार ॥ 92 ॥
स्मरण नाम महात्म
तन मन लै लागा रहै, राता सिरजनहार ।
दादू कुछ मांगैं नहीं, ते बिरला संसार ॥ 93 ॥
दादू सांई को संभालतां, कोटि विघ्न टल जांहि ।
राई मन बैसंधरा, केते काठ जलांहि ॥ 94 ॥
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श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
करतूति कर्म
कर्मै कर्म काटै नहीं, कर्मै कर्म न जाइ।
कर्मै कर्म छूटै नहीं, कर्मै कर्म बँधाइ ॥ 95 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
आठवां निष्कर्मी पतिव्रता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 8 ॥ साखी 95 ॥
[दादूराम / राम / सत्यराम]
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चितावनी
का
अंग
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अथ चितावनी का अंग ९
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ १ ॥
दादू जे साहिब कौं भावै नहीं, सो हम थैं जनि होइ ।
सतगुरु लाजै आपणा, साध न मानैं कोइ ॥ २ ॥
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो सब परिहर प्राण ।
मनसा वाचा कर्मणा, जे तूं चतुर सुजाण ॥ ३ ॥
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो जीव न कीजी रे ।
परिहर विषय विकार सब, अमृत रस पीजी रे ॥ ४ ॥
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श्री दादूवाणी-चितावणी का अंग 9
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो बाट न बूझी रे ।
सांई सौं सन्मुख रही, इस मन सौं झूझी रे ॥ 5 ॥
दादू अचेत न होइये, चेतन सौं चित लाइ ।
मनवा सूता नींद भर, सांई संग जगाइ ॥ 6 ॥
दादू अचेत न होइये, चेतन सौं करि चित्त ।
यह अनहद जहाँ थें ऊपजै, खोजो तहाँ ही नित्त ॥ 7 ॥
दादू जन ! कुछ चेत कर, सौदा लीजे सार ।
निखर कमाई न छूटणा, अपने जीव विचार ॥ 8 ॥
स्मरण नाम चितावणी
दादू कर सांई की चाकरी, ये हरि नाम न छोड़ ।
जाना है उस देश को, प्रीति पिया सौं जोड़ ॥ 9 ॥
आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग ।
दादू अवसर जात है, जाग सकै तो जाग ॥ 10 ॥
बार बार यह तन नहीं, नर नारायण देह ।
दादू बहुरि न पाइये, जन्म अमोलिक येह ॥ 11 ॥
एका एकी राम सौं, कै साधु का संग ।
दादू अनत न जाइये, और काल का अंग ॥ 12 ॥
दादू तन मन के गुण छाड़ि सब, जब होइ नियारा ।
तब अपने नैनहुं देखिये, प्रगट पीव प्यारा ॥ 13 ॥
दादू झांती पाये पसु पिरी, अंदरि सो आहे ।
होणी पाणे बिच्च में, महर न लाहे ॥ 14 ॥
दादू झांती पाये पसु पिरी, हाणे लाइ न बेर ।
साथ सभौंई हल्लियो, पोइ पसंदो केर ॥ 15 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
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श्री दादूवाणी-चितावणी का अंग 9
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
आठवां चितावणी का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 9 ॥ साखी 15 ॥
दादूराम
सत्यराम
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अथ मन का अंग १०
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ॥ 1 ॥
दादू यहु मन बरजि बावरे, घट में राखि घेरि ।
मन हस्ती माता बहै, अंकुश दे दे फेरि ॥ 2 ॥
हस्ती छूटा मन फिरे, क्यों ही बँध्या न जाइ ।
बहुत महावत पच गये, दादू कछु न वशाइ ॥ 3 ॥
जहाँ थैं मन उठ चलै, फेरि तहाँ ही राखि ।
तहँ दादू लै लीन कर, साध कहैं गुरु साखि ॥ 4 ॥
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२. साखी भाग (मध्यम): माया-विवेक, मन, चित्त-शुद्धि, विश्वास व नाम-माहात्म्य
श्री दादूवाणी-मन का अंग 10
थोरे थोरे हठ किये, रहेगा ल्यौ लाइ।
जब लागा उनमनि सौं, तब मन कहीं न जाइ ॥ 5 ॥
आड़ा दे दे राम को, दादू राखै मन।
साखी दे सुस्थिर करै, सोई साधू जन ॥ 6 ॥
सोई शूर जे मन गहै, निमख न चलने देइ।
जब ही दादू पग भरै, तब ही पकड़ि लेइ ॥ 7 ॥
जेती लहर समंद की, ते ते मनहि मनोरथ मार।
वैसे सब संतोंष कर, गहि आत्म एक विचार ॥ 8 ॥
दादू जे मुख मांहीं बोलतां, श्रवणहुँ सुनतां आइ।
नैनहुँ माँहैं देखतां, सो अंतर उरझाइ ॥ 9 ॥
दादू चुम्बक देख कर, लोहा लागै आइ।
यों मन गुण इन्द्री एक सौं, दादू लीजै लाइ ॥ 10 ॥
मन का आसन जे जीव जानै, तौ ठौर ठौर सब सूझै।
पंचों आनि एक घर राखै, तब अगम निगम सब बूझै ॥ 11 ॥
बैठे सदा एक रस पीवै, निर्वैरी कत जूझै।
आत्माराम मिलै जब दादू, तब अंग न लागै दूजै ॥ 12 ॥
जब लग यहु मन थिर नहीं, तब लग परस न होइ।
दादू मनवा थिर भया, सहज मिलैगा सोइ ॥ 13 ॥
दादू बिन अवलम्बन क्यों रहै, मन चंचल चल जाइ।
सुस्थिर मनवा तो रहै, सुमिरण सेती लाइ ॥ 14 ॥
सतगुरु चरण शरण चलि जांहीं, नित प्रति रहिये तिनकी छांहीं।
मन स्थिर करि लीजै नाम, दादू कहै तहाँ ही राम ॥ 15 ॥
हरि सुमिरण सौं हेत कर, तब मन निश्चल होइ।
दादू बेध्या प्रेम रस, बीष न चालै सोइ ॥ 16 ॥
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