सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-लै का अंग 7
तन मन पवना पंच गह, निरंजन ल्यौ लाइ ।
जहाँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू सहज समाइ ॥ 5 ॥
अर्थ अनुपम आप है, और अनर्थ भाई ।
दादू ऐसी जानि कर, तासौं ल्यौ लाई ॥ 6 ॥
लै लगाने की विधि
ज्ञान भक्ति मन मूल गह, सहज प्रेम ल्यौ लाइ ।
दादू सब आरंभ तजि, जनि काहू संग जाइ ॥ 7 ॥
अगम संस्कार
पहली था सो अब भया, अब सो आगे होइ ।
दादू तीनों ठौर की, बूझै बिरला कोइ ॥ 8 ॥
अध्यात्म
योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव ।
मुक्ता द्वारा महल का, इहै भक्ति का भाव ॥ 9 ॥
सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि ।
लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 10 ॥
दादू बिन पायन का पंथ है, क्यों कर पहुँचे प्राण ।
विकट घाट औखट खरे, मांहि शिखर असमान ॥ 11 ॥
मन ताजी चेतन चढै, ल्यौ की करै लगाम ।
शब्द गुरु का ताजणा, कोई पहुँचे साधु सुजान ॥ 12 ॥
सूक्ष्म मार्ग
किहिं मारग ह्वै आइया, किहिं मारग ह्वै जाइ ।
दादू कोई ना लहै, केते करैं उपाइ ॥ 13 ॥
शून्य हि मार्ग आइया, शून्य हि मारग जाइ ।
चेतन पैंडा सुरति का, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 14 ॥
दादू पारब्रह्म पैंडा दिया, सहज सुरति लै सार ।
मन का मारग मांहि घर, संगी सिरजनहार ॥ 15 ॥
- 113 -