सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-लै का अंग 7
लय
राम कहै जिस ज्ञान सौं, अमृत रस पीवै ।
दादू दूजा छाड़ि सब, लै लागी जीवै ॥ 16 ॥
राम रसायन पीवतां, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ ।
दादू आत्म राम सौं, सदा रहै ल्यौ लाइ ॥ 17 ॥
रस रंग
सुरति समाइ सन्मुख रहै, जुग जुग जन पूरा।
दादू प्यासा प्रेम का, रस पीवै सूरा ॥ 18 ॥
अध्यात्म
दादू जहाँ जगद्गुरु रहत है, तहाँ जे सुरति समाइ ।
तो इन ही नैनहुँ उलट कर, कौतुक देखै आइ ॥ 19 ॥
अख्यूं पसण के पिरी, भिरे उलथौं मंझ।
जिते बैठो मां पिरी, निहारी दो हंझ ॥ 20 ॥
दादू उलट अनूठा आप में, अंतर सोध सुजाण ।
सो ढिग तेरे बावरे, तज बाहर की बाण ॥ 21 ॥
सुरति अपूठी फेरि कर, आत्म मांही आन ।
लाग रहै गुरुदेव सौं, दादू सोई सयान ॥ 22 ॥
सूक्ष्म सौंज अर्चा बंदगी
जहाँ आत्म तहँ राम है, सकल रह्या भरपूर ।
अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, दादू सेवक सूर ॥ 23 ॥
दादू अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, सदा सुरति सौं गाइ ।
यहु मन नाचै मगन ह्वै, भावै ताल बजाइ ॥ 24 ॥
दादू पावै सुरति सौं, बाणी बाजै ताल ।
यहु मन नाचै प्रेम सौं, आगे दीन दयाल ॥ 25 ॥
दादू सब बातन की एक है, दुनिया तैं दिल दूर ।
सांई सेती संग कर, सहज सुरति लै पूर ॥ 26 ॥
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