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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 504 में से

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पृष्ठ 119

श्री दादूवाणी-निष्कर्म पतिव्रता का अंग 8
स्मरण नाम निःसंशय
सांई सन्मुख जीवतां, मरतां सन्मुख होइ ।
दादू जीवन मरण का, सोच करै जनि कोइ ॥ 17 ॥
पतिव्रत
साहिब मिल्या तो सब मिले, भेंटे भँटा होइ ।
साहिब रह्या तो सब रहे, नहीं तो नाहीं कोइ ॥ 18 ॥
दादू रीझै राम पर, अनत न रीझै मन।
मीठा भावै एक रस, दादू सोई जन ॥ 19 ॥
दादू मेरे हृदय हरि बसै, दूजा नांही और।
कहो कहाँ धौं राखिये, नहीं आन को ठौर ॥ 20 ॥
दादू नारायण नैना बसै, मनही मोहन राइ।
हिरदा मांही हरि बसै, आतम एक समाइ ॥ 21 ॥
दादू तन मन मेरा पीव सौं, एक सेज सुख सोइ।
गहिला लोग न जाणही, पच पच आपा खोइ ॥ 22 ॥
दादू एक हमारे उर बसै, दूजा मेल्या दूर।
दूजा देखत जाइगा, एक रह्या भरपूर ॥ 23 ॥
निश्चल का निश्चल रहै, चंचल का चल जाइ।
दादू चंचल छाड़ि सब, निश्चल सौं ल्यौ लाइ ॥ 24 ॥
साहिब रहतां सब रह्या, साहिब जातां जाइ।
दादू साहिब राखिये, दूजा सहज स्वभाइ ॥ 25 ॥
मन चित मनसा पलक मैं, सांई दूर न होइ।
निष्कामी निरखै सदा, दादू जीवन सोइ ॥ 26 ॥
कथनी बिना करणी
जहाँ नाम तहँ नीति चाहिये, सदा राम का राज।
निर्विकार तन मन भया, दादू सीझै काज ॥ 27 ॥

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