सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-लै का अंग 7
जिहि आसन पहली प्राण था, तिहि आसन ल्यौ लाइ ।
जे कुछ था सोई भया, कछू न व्यापै आइ ॥ 38 ॥
तन मन अपणा हाथ कर, ताहि सौं ल्यौ लाइ ।
दादू निर्गुण राम सौं, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 39 ॥
एक मना लागा रहै, अंत मिलेगा सोइ ।
दादू जाके मन बसै, ताको दर्शन होइ ॥ 40 ॥
दादू निबहै त्यौं चलै, धीरे धीरज मांहि ।
परसेगा पीव एक दिन, दादू थाके नांहि ॥ 41 ॥
लय
जब मन मृतक ह्वै रहै, इन्द्री बल भागा ।
काया के सब गुण तजै, निरंजन लागा ॥ 42 ॥
आदि अंत मधि एक रस, टूटै नहीं धागा ।
दादू ऐकै रह गया, तब जाणी जागा ॥ 43 ॥
जब लग सेवग तन धरै, तब लग दूसर आहि ।
एकमेक ह्वै मिलि रहै, तो रस पीवन तैं जाइ ॥ 44 ॥
ये दोनों ऐसी कहैं, कीजे कौन उपाइ ।
ना मैं एक, न दूसरा, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 45 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
सातवां लै का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 7 ॥ साखी 45 ॥
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