सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

भगत सिंह से मिलन, HSRA की स्थापना एवं लाला लाजपतराय का प्रतिशोध

चन्द्रशेखर आजाद 81
स्वयं गिरफ्तार करवाया। इसके बाद न्याय का दीर्घ नाटक खेला गया,
जिसकी परिणति अन्ततः भगतसिंह, राजगुरु एवं बटुकेश्वरदत्त को फांसी
तथा अन्य कई क्रान्तिकारियों को विभिन्न प्रकार के कैद की सजाओं में
हुई, इसका वर्णन आगे यथास्थान किया जाएगा।
वायसराय की गाड़ी को उड़ाने की योजना.
असेम्बली बम काण्ड में भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त की गिरफ्तारी
के बाद उन पर साण्डर्स की हत्या का भी मामला चल चुका था और उनके
दल के कई सदस्य इस हत्याकाण्ड के सिलसिले में गिरफ्तार किये जा चुके
थे। अतः दल एक प्रकार से छिन्न-भिन्न-सा हो चुका था। फिर भी आजाद
इस दल के सेनापति थे; और एक योग्य, साहसी एवं कर्मठ सेनापति के
सभी गुण उनमें विद्यमान थे। इसके साथ ही भगवतीचरण वोहरा, उनकी
धर्मपत्नी दुर्गादेवी, सुशीला दीदी, श्री यशपाल आदि योग्य क्रान्तिकारी
उनके साथ थे। अतः दल का कार्य निरन्तर चलता रहा।
इसी कार्यक्रम के अन्तर्गत वायसराय की विशेष रेलगाड़ी को बम से
उड़ा देने की योजना बनाई गई। पहले इसके लिए 27 अक्तूबर, 1929 का
दिन नियत किया गया। परन्तु बाद में कुछ अनिवार्य कारणों से उस दिन
यह काम न हो सका। फिर इसके लिए 23 दिसम्बर, 1929 का दिन
निश्चित किया गया।

The provided image is entirely blank (pure white) and does not contain any text, diagrams, or content to transcribe.

Please re-upload or check the image file.

चन्द्रशेखर आजाद
साथ सड़ता हुआ मारा गया।
इन गिरफ्तार व्यक्तियों को मुकदमे में विभिन्न प्रकार की सजाएँ
मिलीं। गुलाबसिंह, जहांगीरलाल तथा अमरीकसिंह को पहले फाँसी की
सजा सुनाई दी, किन्तु बाद में अमरीकसिंह छोड़ दिया गया तथा शेष दोनों
को कालापानी और शेष अभियुक्तों को अनेक प्रकार की कैद की सजा
सुनाई गई।

82 चन्द्रशेखर आजाद

के पीछे का तीसरा डिब्बा उड़ गया।
इस घटना से फिर तहलका मच गया। पुलिस पहले ही सतर्क थी;
अब और भी अधिक बौखला उठी, उसने अपने प्रयत्न पहले से भी तेज कर
दिये।
कांग्रेस के सन् 1930 के लाहौर अधिवेशन में प्रथम बार एक ओर
भारत के लिए पूर्ण स्वराज्य की मांग की गई, वहीं दूसरी ओर इस घटना
की निन्दा की गई। इसके मुख्य अंश इस प्रकार हैं—
"यह कांग्रेस वाइसराय की ट्रेन पर बम विस्फोट के कृत्य की निन्दा
करती है और अपना यह निश्चय फिर प्रकट करती है कि इस प्रकार के
कार्य न केवल कांग्रेस के उद्देश्यो के प्रतिकूल हैं, अपितु उनसे राष्ट्रीय हित
की हानि होती है। यह कांग्रेस महामहिम वाइसराय, श्रीमती इर्विन तथा
गरीब नौकरों सहित उनके साथियों का इस बात के लिए अभिनन्दन करती
है कि वे सौभाग्य से बाल-बाल बच गए।"
वाइसराय की ट्रेन को बम से उड़ाने का प्रयत्न असफल हो जाने के बाद
भी चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में दल क्रियाशील बना रहा। इसके बाद
भी कई जगह बम विस्फोट हुए, डकैती तथा हत्या की योजनाएँ बनीं, किन्तु
इन सभी योजनाओं में कोई विशेष सफलता नहीं मिली। पुलिस इस दल के
सदस्यों की गिरफ्तारी के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ी थी। अगस्त, 1930
में इस दल के चार सदस्य—रूपचन्द, इन्द्रपाल, जहांगीर लाल तथा कुन्दन
लाल गिरफ्तार कर लिये गए। इसके बाद कुछ और सदस्य पकड़ लिये
गए; कुल छब्बीस सदस्यों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, किन्तु दल के
अध्यक्ष चन्द्रशेखर आजाद, यशपाल, सुशीला दीदी, दुर्गा भाभी, हंसराज
तथा प्रकाशवती आदि पुलिस की पकड़ में नहीं आ सके। अतः उन्हें फरार
घोषित कर दिया गया।
सुखदेवराज भी पुलिस की पकड़ में नहीं आये थे। सभी फरार अभि-
युक्तों की खोज में पुलिस के मुखबिर घूमने लगे थे। एक दिन पुलिस को
सूचना मिली कि सुखदेवराज किसी अन्य युवक के साथ लाहौर के शाली-
मार पार्क में हैं। अतः पुलिस ने घेरा डाल दिया। यहाँ सुखदेवराज का तो
.......रार नामक एक युवक गोली से पुलिस के

चन्द्रशेखर आजाद
माद लड़ता हुआ मारा गया ।
इन गिरफ्तार व्यक्तियों को मुकदमे में विभिन्न प्रकार की सजाएं,
मिलीं। गुलाबसिंह, जहाँगीरलाल तथा अमरीकसिंह को पहले फाँसी की
सजा सुनाई दी, किन्तु बाद में अमरीकसिंह छोड़ दिया गया तथा शेष दोनों
को कालापानी और शेष अभियुक्तों को अनेक प्रकार की कैद की सजा
सुनाई गई।

The provided image is almost entirely blank and does not contain any legible text to transcribe. Only a tiny artifact or speck is visible at the bottom-left corner.

The provided image is completely blank and contains no text, diagrams, or content to transcribe.

Please re-upload or provide a clear image of the page you would like transcribed.

86 चन्द्रशेखर आजाद
कहा कि उन्होंने हमें बम फेंकते हुए देखा, उन्हें यह सफेद झूठ बोलने में
कोई झिझक नहीं आई। हम आशा करते हैं कि जिन लोगों का ध्येय न्याय
की शुद्धता तथा निष्पक्षता की रक्षा करना है, वे इन तथ्यों से स्वयं निष्कर्ष
निकाल लेंगे।
प्रथम प्रश्न के उत्तरार्द्ध का उत्तर कुछ विस्तार से देना होगा, जिससे
कि हम उन प्रयोजनों और परिस्थितियों को एक पूर्ण और सुलझे रूप में
स्पष्ट कर सकें, जिनके फलस्वरूप यह घटना हुई, जिसने अब ऐतिहासिक
रूप ले लिया है। जेल में हमसे कुछ पुलिस के अधिकारियों ने मुलाकात की,
उनमें से कुछ ने जब हमें यह बताया कि विचाराधीन इस घटना के पश्चात्
दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए लार्ड इरविन ने
यह कहा कि हम लोगों ने बम फेंककर किसी व्यक्ति पर नहीं, अपितु स्वयं
एक संविधान पर आक्रमण किया है, तब हमें प्रतीत हुआ कि इस घटना के
महत्त्व का सही मूल्यांकन नहीं किया गया है।
मानवमात्र के प्रति हमारा प्रेम किसी से कम नहीं है। अतः किसी व्यक्ति
के प्रति विद्वेष रखने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसके विपरीत हमारी दृष्टि
में मानव-जीवन इतना पवित्र है कि उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा
सकता।
हमारा लक्ष्य उस संस्था के प्रति अपना व्यावहारिक प्रतिरोध प्रकट
करना था, जिसने अपने आरम्भ से ही न केवल अपनी निरुपयोगिता का,
अपितु हानिकारक दूरगामी शक्ति का भी नग्न प्रदर्शन किया है। हमने
जितना अधिक चिन्तन किया है, हम उतने ही अधिक इस नतीजे पर पहुंचे
हैं कि इस संस्था (असेम्बली) के अस्तित्व का उद्देश्य दुनिया के सामने
भारत की गरीबी तथा असहायता का प्रदर्शन करना है तथा यह एक

The provided image is a blank page and contains no readable text to transcribe.

88 चन्द्रशेखर आजाद
सदस्य स्व० श्री सी० आर० दास के उन शब्दों से प्रेरणा ली है, जो उन्होंने
अपने पुत्र को एक पत्र में लिखे थे; जिनका तात्पर्य था कि इंग्लैंड को उसके
दुःस्वप्न से जगाने के लिए बम की आवश्यकता है और हमने उन लोगों की
ओर से असेम्बली के फर्श पर बम फेंका है, जिनके पास अपनी हृदयविदारक
वेदना की अभिव्यक्ति के लिए अन्य कोई राह नहीं रह गई थी। हमारा
एकमात्र उद्देश्य था कि हम बहरों को अपनी आवाज सुनाएँ और समय की
चेतावनी उन लोगों तक पहुँचाएँ, जो उनकी अनदेखी कर रहे हैं।***हमने
उन लोगों को चेतावनी दी है, जो सामने आनेवाली परिस्थिति की चिन्ता
किए बिना सरपट दौड़े चले जा रहे हैं।
पिछले खण्डों में हमने काल्पनिक अहिंसा शब्द का प्रयोग किया है।
हम उसकी व्याख्या करना चाहते हैं। हमारी दृष्टि से बल का प्रयोग तब
अन्यायपूर्ण होता है, जब उसका प्रयोग आक्रमण की रीति से किया जाए
और हमारे दृष्टिकोण में यह हिंसा है। किन्तु जब बलप्रयोग किसी विशेष
उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाए, तो यह नैतिक दृष्टि से न्यायसंगत है।
शक्ति के प्रयोग का पूर्णतया बहिष्कार एक कोरी काल्पनिक भ्रान्ति है।
इस देश में एक नया आन्दोलन उठ खड़ा हुआ है, जिसकी पूर्व सूचना हम
दे चुके हैं। यह आन्दोलन गुरु गोविन्दसिंह, शिवाजी, कमाल पाशा एवं
रज़ा खां, वाशिंगटन एवं गैरी बाल्डी और लायफेते एवं लेनिन के कार्यों
से प्रेरणा ग्रहण करता है।
हमें ऐसा लगा कि विदेशी सरकार और भारत के सार्वजनिक नेताओं
ने इस आन्दोलन से आँखें मूँद ली हैं तथा उनके कानों में इसकी आवाज
नहीं पड़ी है। अतः हमें यह कर्तव्य लगा कि ऐसे स्थानों पर चेतावनी दी
जाए, जहाँ हमारी आवाज अनसुनी न रह सके।***हमारे मन में उन लोगों
के प्रति कोई व्यक्तिगत द्वेष या बैर नहीं था, जिनको इस घटना के दौरान
मामूली चोटें आई हैं।***हमने जान-बूझकर असेम्बली में बम फेंका। तथ्य
स्वयं स्पष्ट है। हमारा अनुरोध है कि हमारे प्रयोजन को हमारे कार्य के
परिणाम से ही आंका जाना चाहिए, न कि काल्पनिक परिस्थितियों एवं
पूर्वाग्रहों के आधार पर। सरकारी विशेषज्ञ द्वारा दिए गए प्रमाणों के बाव-
जूद यह सत्य है कि हमने असेम्बली भवन में जो बम फेंके, उनसे एक

The provided image is completely blank (white) and contains no text or visible content to transcribe.

Please upload or provide the correct image page so it can be transcribed for you.

90 चन्द्रशेखर आजाद
करने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहे हैं। ये भयंकर विषम-
ताएँ और विकास के अवसरों की कृत्रिम समानताएं समाज को अराजकता
की ओर ले जा रही हैं।
यदि इसकी उपेक्षा कर दी जाती है तथा वर्तमान शासन-व्यवस्था
नवोदित प्राकृतिक शक्तियों के मार्ग को रोक देती है और यह क्रम निरन्तर
चलता रहा, तो एक भयंकर संघर्ष उत्पन्न होना निश्चित है, जिसके फल-
स्वरूप समस्त अवरोधक तत्त्वों को उठाकर फेंक दिया जाएगा तथा सर्व-
हारा वर्ग का आधिपत्य होगा, जिससे क्रान्ति का लक्ष्य प्राप्त किया जा
सके। क्रान्ति मानव-जाति का जन्मसिद्ध अधिकार है। स्वतन्त्रता सभी
मनुष्यों का एक ऐसा जन्मसिद्ध अधिकार है, जिसे किसी भी स्थिति में
छीना नहीं जा सकता। श्रमिक वर्ग समाज का वास्तविक आधार है। प्र-
प्रभुता की स्थापना श्रमिकों का अन्तिम लक्ष्य है। इन आदर्शों तथा आग्रह
के लिए हम उन सब कष्टों का सामना करेंगे, जो हमें न्यायालय द्वारा दिये
जाएँगे। इस वेदी पर हम अपना यौवन धूपबत्ती की तरह जलाने के लिए
सन्नद्ध हुए हैं। इस महान लक्ष्य के लिए कोई भी बलिदान बड़ा नहीं माना
जा सकता। हम क्रान्ति की उन्नति की सन्तोष के साथ प्रतीक्षा करेंगे।'"'
इन्कलाब-जिन्दाबाद।"
भगतसिंह के इस भाषण से स्वाभाविक रूप में देश का ध्यान उनके
तथा दल के प्रति आकृष्ट हुआ। इस मुकदमे में उन्होंने अपने बचाव का
कोई प्रयत्न नहीं किया। अदालत की कार्यवाही 10 जून, 1929 को पूरी
हो गई और इसके दो दिन बाद 12 जून को निर्णय सुना दिया गया, जिसमें
भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त दोनों को आजीवन कारावास का दण्ड मिला।
इसके बाद भगतसिंह पंजाब की मियानवाली जेल भेज दिये गये तथा बटुकेश्वर
दत्त लाहौर सेन्ट्रल जेल भेज दिये गए।

चन्द्रशेखर आजाद 91
लाहौर उच्च न्यायालय में इस अपील की पेशी जस्टिस फोर्ड तथा
जस्टिस एडीसन के सामने हुई। यहाँ भी भगतसिंह ने अपने उद्देश्यों के
विषय में बयान दिया। इस बयान में उन्होंने यह सिद्ध करना चाहा कि वे
कोई अपराधी नहीं हैं, वरन् मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करनेवाले
एक योद्धा हैं। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि किसी भी अप-
राधी को दण्ड उसके उद्देश्य को ध्यान में रखकर मिलना चाहिए—
" जब तक अभियुक्त के मनोभाव का पता न लग जाए, उसके
वास्तविक उद्देश्य का पता नहीं चल सकता। यदि उद्देश्य को पूरी तरह
भुला दिया जाए, तो किसी भी व्यक्ति के साथ न्याय नहीं हो सकता,
क्योंकि उद्देश्य की उपेक्षा करने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति साधारण
हत्यारे नज़र आएँगे। शासकीय कर ग्रहण करने वाले अधिकतर चोर-
जालसाज दिखाई देंगे और न्यायाधीशों पर भी हत्या का अभियोग लगेगा।
इस तरह तो समाज-व्यवस्था और सभ्यता, खून-खराबा, चोरी और जाल-
साज़ी बनकर रह जाएगी। यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाए तो सरकार
को क्या अधिकार है कि समाज के व्यक्तियों से न्याय की उपेक्षा करे!
उद्देश्य की उपेक्षा की जाए, तो हर धर्म-प्रचार झूठ का प्रचार दिखाई देगा
और प्रत्येक पैगम्बर पर अभियोग लगेगा कि उसने करोड़ों अनजान और
भोले-भाले लोगों को गुमराह किया। यदि उद्देश्य को भुला दिया जाए, तो
हजरत ईसा मसीह गड़बड़ करने वाले, शान्ति भंग करने वाले और विद्रोह
का प्रचार करने वाले दिखाई देंगे और कानून के शब्दों में खतरनाक
व्यक्तित्व समझे जाएँगे, किन्तु हम उनकी पूजा करते हैं; हमारे हृदयों में
उनके लिए असीम आदर है।"
लाहौर उच्च न्यायालय ने इस अपील को खारिज कर दिया तथा
निचली अदालत की सजा को कायम ठहराया। जेलों में राजनैतिक कैदियों
के लिए सुविधाओं को लेकर भगतसिंह ने 15 जून, 1929 से आमरण अन-
शन प्रारम्भ कर दिया। यह समाचार मिलने पर बटुकेश्वरदत्त ने भी
लाहौर सेन्ट्रल जेल में उसी दिन से उनके समर्थन में भूख हड़ताल शुरू कर
दी। भगतसिंह मियाँवाली जेल में थे। अब इन पर साण्डर्स हत्या-
कांड का मुकदमा भी चलने वाला था। इस हत्याकाण्ड में अन्य अभियुक्त

92 चन्द्रशेखर आजाद
लाहौर सेण्ट्रल जेल में थे। अतः 17 जून, 1929 को उन्होंने पंजाब राज
के इंसपेक्टर जनरल जेल को अपना स्थानान्तरण लाहौर सेण्ट्रल जेल
करवाने के लिए प्रार्थना-पत्र दिया। उनकी यह मांग मान ली गई और
इसी माह के अन्तिम सप्ताह में उन्हें लाहौर सेण्ट्रल जेल भेज दिया गया।
लाहौर काण्ड पर मुकदमा :
साण्डर्स हत्याकाण्ड, जो लाहौर काण्ड भी कहलाता है, इस पर
मुकदमा 10 जुलाई, 1929 से लाहौर के मजिस्ट्रेट श्री कृष्ण की अदालत में
प्रारम्भ हुआ। भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त अनशन पर थे, अतः उन्हें
स्ट्रेचर पर अदालत में लाया गया। इसके बाद उनके समर्थन में इस काण्ड
के अन्य अभियुक्तों ने भी भूख हड़ताल आरम्भ कर दी। भगतसिंह ने 14
जुलाई, 1929 को अपनी मांगों के विषय में भारत सरकार के गृह सदस्य
को एक पत्र भेजा, जिसमें कैदियों के लिए सुविधाओं की मांग की गई थी।
सरकार इन मांगों को कोई महत्त्व नहीं दे रही थी, हड़ताल चलती रही।
कैदियों का स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन गिरता रहा, भगतसिंह का वजन प्रारम्भ
में 133 पौण्ड था, जो 30 जुलाई तक लगभग 5 पौण्ड प्रति सप्ताह गिरता
रहा और फिर स्थिर हो गया।
अनशन में जतीनदास की मृत्यु

चन्द्रशेखर आजाद 93
हो गए हैं, उनमें करवट बदलने की भी ताकत नहीं है। वह बहुत धीरे-धीरे
बोलते हैं। वास्तव में देखा जाए, तो वह मौत की ओर बढ़ रहे हैं। मुझे
इन बहादुर नौजवानों के कष्ट को देखकर बहुत दुःख हुआ। मालूम होता
है, ये अपने प्राणों की बाजी लगाकर इस लड़ाई में शामिल हुए हैं। ये
चाहते हैं कि राजनीतिक बंदियों के साथ राजनीतिक कैदियों का जैसा
व्यवहार हो। मुझे पूरा विश्वास है कि यह तपस्या सफलता से सुशोभित
होकर ही रहेगी।'
इस अनशन की सहानुभूति में अनेक अन्य जेलों में भी अनशन किया
गया। इस अनशन के कारण मुकदमे की तारीखें भी बदलती गईं। बाद में
पंजाब जेल कमेटी ने सुधार की मांगों पर विचार करने के लिए एक उप-
समिति बनाई। अतः 2 सितम्बर, 1929 को जतीनदास को छोड़कर अन्य
सभी ने अनशन तोड़ दिया। इस उपसमिति ने जतीनदास को रिहा कर देने
की सिफारिश की थी, किन्तु सरकार ने बिना जमानत रिहा करना स्वीकार
नहीं किया। और जमानत-पत्र पर जतीनदास ने हस्ताक्षर करने से मना
कर दिया। जतीनदास की स्थिति को देखकर भगतसिंह आदि ने दो दिन
बाद पुनः अनशन प्रारम्भ कर दिया। अन्ततः 13 सितम्बर, 1929 को
एक बजकर पाँच मिनट पर जतीनदास मृत्यु को प्राप्त हो गए। उनके शव
को लाहौर से कलकत्ता भेजने के लिए नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने 600 रु०
भिजवाए थे, अतः उनका शव कलकत्ता भेज दिया गया, जहाँ उनके अन्तिम
संस्कार में लाखों लोगों ने एकत्र होकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

94 चन्द्रशेखर आजाद
इन्हें विश्वास था कि यह सर्व कानूनी कार्यवाही केवल एक दिखावा थी।
अतः ये भी अदालत की हर कार्यवाही पर अड़ंगा लगाते रहते थे। एक
बार इसी प्रकार की एक घटना में न्यायाधिकरण के अध्यक्ष जस्टिस कोल्ड-
स्ट्रीम ने पुलिस को आदेश दिया कि इन अभियुक्तों को लाठियों तथा जूतों
से पीटा जाए। पुलिस ने ऐसा ही किया। अतः अभियुक्तों ने दूसरे दिन से
अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार कर दिया और जस्टिस कोल्डस्ट्रीम
को बदलने की मांग की। इस दिन पुलिस द्वारा अभियुक्तों के साथ जो
दुर्व्यवहार किया गया, इस कार्यवाही की न्यायाधिकरण के भारतीय
सदस्य जस्टिस आगा हैदर ने भी आलोचना की थी, अतः कोल्डस्ट्रीम के
साथ ही आगा हैदर को भी बदलकर नया न्यायाधिकरण बनाया गया,
जिसमें जस्टिस जी० सी० हिल्टन, जस्टिस अब्दुल कादिर तथा जस्टिस
जे० के० टॅप थे।
अभियुक्तों ने फिर भी अदालत का बहिष्कार जारी रखा। भगतसिंह
का कहना था कि जस्टिस कोल्डस्ट्रीम को अपने व्यवहार के लिए माफी
मांगनी चाहिए। सरकार ने जस्टिस कोल्डस्ट्रीम को लम्बी छुट्टी पर भेज
दिया था और सरकार इस माँग को स्वीकार भी कैसे कर सकती थी।
फैसला :
न्यायाधिकरण में अभियुक्तों की अनुपस्थिति में एकतरफा कार्यवाही
चली। इसके बाद 26 अगस्त, 1930 को अदालत ने अपना काम पूरा कर
लिया, तब अभियुक्तों के पास सन्देश भेजा गया कि वे अपने बचाव के
लिए स्वयं कुछ कहना चाहें या वकील रखना चाहें अथवा कोई गवाह
प्रस्तुत करना चाहें तो करें। अभियुक्त इस नाटक का अर्थ समझते थे,
क्योंकि समस्त कार्यवाही हो जाने के बाद अब केवल निर्णय ही दिया जाने
वाला था, अतः उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया।
7 अक्टूबर 1930 को इस मुकदमे का फैसला सुना दिया गया।
अभियुक्तों ने अदालत का बहिष्कार कर रखा था, अतः ट्रिब्यूनल के एक
विशेष सन्देशवाहक ने उन्हें यह फैसला जेल में ही जाकर सुनाया। फैसले
के अनुसार अभियुक्तों को निम्न दण्ड दिये गए थे-

"?
Wait, look at:
"पं०" then a space, then "राधे" or "राजे"?
Wait, could it be "पं० जी के साथ"?
Look at the last word: 'य' 'ा' 'द' -> "याद"!
Wait, what is the word before "याद"?
Is it "की"?
Wait, look at the letter: 'क' with left stroke? No, it's 'क' with matra: 'के' or 'की'.
Wait, what if it is "पं० जी की याद"?
Why would it have that shape between पं० and की?
Let's look at that shape very closely:
It has:
Top bar.
Left: like a vertical with a tick, or 'र'?
Right: like 'ध' or 'घ' with 'े'?
Wait, could it be "राधे"?
Wait, who was "राधे"?
Wait, was someone named "राधे" in H.S.R.A.?
Radha Krishna? Radhe Shyam?
Wait! What about "पं० राधे" - could it be "पं० राधे की याद"?

Wait, let's look at lines 3, 4, 5 again very carefully:
काले पानी की सजा — कमलनाथ तिवारी, जयदेव
कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, गया
सिंह तथा किशोरीलाल ।

Wait! Look at line 5 again:

26 चन्द्रशेखर आजाद
बदलवाने के लिए आवाज उठाई, जगह-जगह से लोगों ने हस्ताक्षर अभियान
चलाकर वाइसराय के पास अनुस्मारक भेजे, किन्तु, इनका परिणाम
शून्य ही रहा। और 23 मार्च, 1931 को इन तीनों वीरों को लाहौर में
फाँसी दे दी गई।
फाँसी दे दिए जाने पर भी देश के आक्रोश में कमी नहीं आई। देश भर
के समाचार-पत्रों ने सरकार के इस कृत्य की भर्त्सना की। महात्मा गांधी
उस समय भारत की राजनीति पर छाए हुए थे। फरवरी, 1931 में वाइसराय
लार्ड इरविन के साथ उनका एक समझौता हुआ, जिसे गांधी-इरविन
समझौता कहा जाता है। भारत की जनता बड़ी आशाओं के साथ इस
समझौते की रिपोर्ट की प्रतीक्षा कर रही थी। उसे पूरा विश्वास था कि
गांधीजी इन वीरों को फाँसी पर चढ़ने से बचा लेंगे, किन्तु समझौते की
रिपोर्ट प्रकाशित होने पर उसकी सारी आशाओं पर पानी फिर गया;
समझौते में इस मामले का कोई उल्लेख ही नहीं था। हाँ, काँग्रेसी सत्या-
ग्रही, जो जेलों में थे, सबको छोड़ दिए जाने की घोषणा की गई थी।
गांधीजी के इस कार्य की खूब आलोचना हुई। जगह-जगह पत्रकारों ने
उनसे इस विषय में प्रश्न पूछे। इस फाँसी के कुछ ही दिन बाद कराँची
कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए वहाँ जाने पर उन्हें काले झण्डे
दिखाए गए।
इस फाँसी के बाद पंजाब में जगह-जगह सभाएँ हुईं। लोगों ने अपने
खून से लिखकर इसका बदला लेने की शपथ ली। किसानों ने कर देना
बन्द कर दिया। भगतसिंह उनके लिए आराध्यदेव के समान बन गए थे।
उनके चित्र धड़ाधड़ बिकने लगे। देश भर में इन वीरों की वीरतापूर्ण
जीवनी की पुस्तकें प्रकाशित होने लगीं। सरकार इन्हें अपने लिए मौत का
साया समझती थी। परिणामस्वरूप इन चित्रों एवं पुस्तकों पर प्रतिबन्ध
लगा दिया गया।
इन वीरों के शहीद होने पर भारतीय क्रान्तिकारियों के इतिहास के
एक अध्याय की इतिश्री हो गई।
इस बीच आजाद की भूमिका :
भगतसिंह आदि के गिरफ्तार हो जाने पर भी चन्द्रशेखर आजाद

चन्द्रशेखर आजाद 97
निष्क्रिय होकर नहीं बैठे। इसके बाद भी वे कुछ-न-कुछ करते रहते थे।
वाइसराय की गाड़ी को बम से उड़ाने का प्रयास भी इसकी पुष्टि करता
है। इसके साथ ही वह पण्डित मोतीलाल नेहरू तथा उनके सुपुत्र
पण्डित जवाहरलाल नेहरू से भी मिले थे। यद्यपि कांग्रेस के तथा उनके
सिद्धान्तो में अन्तर था, फिर भी दोनों के लक्ष्य समान थे। नेहरू परिवार
से उनके सम्बन्ध सुमधुर थे। यह परिवार यद्यपि खुले रूप में क्रान्ति-
कारियों का समर्थन नहीं करता था, तथापि उसे इन वीरों के साथ सहानु-
भूति अवश्य थी। कहा जाता है, अपने इन्हीं फरारी के दिनों में 1930 में
वह आनन्द भवन, इलाहाबाद गए। वहाँ उन्होंने पण्डित मोतीलाल नेहरू
से भेंट की। पण्डित नेहरू ने उन्हें अहिंसा का मार्ग त्यागने का परामर्श
दिया था, जिसे आजाद ने विनम्र शब्दों में अस्वीकार कर दिया था।
उन्होंने कहा कि उन्हें अहिंसा पर विश्वास नहीं था, वह नहीं समझते थे
कि कांग्रेस की इस अहिंसा की नीति से अंग्रेज भारत को छोड़कर चले
जाएँगे। अंग्रेजों को भगाने के लिए वह हिंसा को अनिवार्य मानते थे।
इसके बाद वह पण्डित जवाहरलाल नेहरू से भी मिले थे। उनकी
गिरफ्तारी पर दस हजार रुपयों का इनाम था और वह इस प्रकार घूम
रहे थे, इससे जवाहरलाल नेहरू को बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंने इस
विषय में आजाद से सचेत रहने को कहा, किन्तु, आजाद को इस सब की
परवाह कहाँ थी! उनका तो बस इतना ही कहना था कि जीते जी पुलिस
उन्हें नहीं पकड़ पाएगी। इन्हीं दिनों गांधी-इरविन समझौते के लिए बातें
चल रही थीं। इस सम्बन्ध में आजाद ने नेहरूजी से पूछा था कि इस
समझौते में प्राणों को हथेली पर रखकर घूमने वाले क्रान्तिकारियों के
लिए क्या किया जाएगा? पण्डित नेहरू शायद इसका कोई उत्तर नहीं
दे पाए थे, क्योंकि वे जानते थे कि इस समझौते के हो जाने पर भी इन
वीरों की रक्षा नहीं हो सकेगी। इस समझौते में गांधीजी इरविन से बातें
करेंगे और उन्हें अपने सिद्धान्त सबसे प्रिय थे, किन्तु नेहरूजी की हार्दिक
इच्छा थी कि इन क्रान्तिकारियों की रक्षा होनी चाहिए। भगतसिंह आदि
को फाँसी दे दिए जाने पर उन्हें जो दुःख हुआ, उसे व्यक्त करते हुए उन्होंने
कहा था—

98
चन्द्रशेखर आज़ाद
"मैं भगतसिंह तथा उनके साथियों के अन्तिम दिनों में मौन धारण
किए रहा, क्योंकि मैं जानता था कि कहीं मेरे बोलने से फाँसी की सजा
रद्द होने की सम्भावना जाती न रहे। मैं चुप रहा, गोकि इच्छा होती थी मैं
उबल पडूँ। हम सब मिलकर उन्हें बचा न सके, गोकि हमारे इतने प्यारे थे,
और उनका महान त्याग तथा साहस भारत के नौजवानों के लिए एक
प्रेरणा की चीज थी और है। हमारी इस असहायता पर देश में दुःख
प्रकट किया जाएगा, किन्तु साथ ही हमारे देश की इस स्वर्गीय आत्मा पर
गर्व है और जब इंग्लैण्ड हम से समझौते की बात करे, तो हम भगतसिंह
की लाश को भूल न जाएं।"
क्रान्तिकारियों से नेहरूजी की सहानुभूति के कारण लाहौर काण्ड के
एक मुखबिर कैलाशपति ने उनके नाम का भी उल्लेख किया था इस सम्बन्ध
में मन्मथनाथ गुप्त लिखते हैं—
"उसकी स्मरण-शक्ति अद्भुत थी। बयान में उसने लाहौर से लेकर
कलकत्ते तक बीसियों मनुष्यों का नाम लिया। जिस सरगर्मी से वह क्रान्ति-
कारी बना था, उसी सरगर्मी से मुखबिर बना न तब कोई उसको फिक्र थी
न अब।... उसने अपने बयान में पण्डित जवाहरलाल तक को तान दिया
था, फिर कौन बचता।"
स्पष्ट है कि नेहरूजी को यद्यपि क्रान्तिकारियों से पूरी सहानुभूति
थी, फिर भी वह कुछ कर पाने में असमर्थ थे।
आज़ाद द्वारा भगतसिंह की मुक्ति का प्रयास :
1930 में काँग्रेस के आन्दोलन भी जोरों पर थे, अतः क्रान्तिकारी दल
ने भी अपनी कार्यवाहियाँ तेज करने का निर्णय लिया। इस समय दल के
भगतसिंह आदि अनेक सदस्य जेलों में थे, किन्तु आज़ाद चुप नहीं बैठे थे,
इस समय उनके मुख्य सहयोगी भगवतीचरण थे। उन्हें विश्वास हो गया था
कि भगतसिंह को सरकार अवश्य फाँसी पर लटका देगी। इस समय आज़ाद
तथा भगवतीचरण ने भगतसिंह को जेल से मुक्त कराने की योजना बनाने
की सोची। उन्होंने योजना के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया।
---- फाँसी देने पर तुली हुई थी। यदि ऐसे समय में उन्हें
सरकार भग