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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

इस पुस्तक में आजाद के जीवन की सभी घटनाओं के विषय में
सामग्री को क्रमबद्ध रूप में पिरोने की अल्प चेष्टा की गई है। जिन
पर विद्वानों में विवाद है, उनका उल्लेख यथास्थान कर दिया गया है।
प्रयास कितना सफल रहा, इसका निर्णय तो सुधी पाठक ही करेंगे।
यह पुस्तक वीरश्रेष्ठ आजाद के जीवन की ऐतिहासिक घटना
संकलन मात्र है, अतः इसके विषय में मौलिकता का दावा करना
वंचना ही कही जाएगी। इसके लेखन में श्री मन्मथनाथ गुप्त,
वैशम्पायन, श्री वीरेन्द्र, व्यथित हृदय, यशपाल शर्मा, शिव वर्मा,
रमैया आदि विद्वान् लेखकों की पुस्तकों से सहायता ली गई है, अतः
सबके प्रति मैं अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।

अनुक्रमणिका
१ अध्याय—प्रारम्भिक जीवन 9—28
वंश-परम्परा एवं उनका मूल स्थान; आजाद का जन्म
एवं बाल्यकाल; भाई-बहिन; शिक्षा-दीक्षा, विद्यार्थी
जीवन से राजनीति की ओर; रौलेट कमेटी की सिफा-
रिशें; रौलेट एक्ट का देशव्यापी विरोध; जलियांवाला
बाग काण्ड; बेंतों की सजा।
द्वितीय अध्याय—क्रान्ति की ओर 29—39
आन्दोलन की वापसी; आजाद की निराशा; क्रान्ति-
कारियों के सम्पर्क; दल के संगठन में; महन्त के शिष्य के
रूप में; दल के लिए काम और चंदे, चुनाव में मुंशी-
गीरी; क्रान्ति का पर्चा।
तृतीय अध्याय—साध्य और साधन 40—52
दल के कार्यों के लिए डकैतियां; बमरौली का छेदाहारी बम-
कर डकैती; स्वदेशिका स्टोर डकैती; काकोरी षड्यंत्र;
गिरफ्तारियों का सिलसिला; मुकद्दमा; सजाएं, फैसले
के बाद।
चतुर्थ अध्याय—कष्टप्रद काल 53—89
झांसी में; सांडुपेच में; छोटों के सम्पर्क में; बम्बई में।

पंचम अध्याय—नई सुबह : दल का पुनर्गठन 60
भगतसिंह से भेंट; नया दल : हिन्दुस्तान समाजवादी
गणतांत्रिक सेना; नये दल की केंद्रीय समिति; दल का
प्रांतीय एवं अंतःप्रांतीय संगठन; पुलिस से आँख-
मिचोली; पुलिस अधिकारी को जीवनदान; काकोरी
काण्ड के वीरों को छुड़ाने की योजना।
षष्ठ अध्याय—आरोह-अवरोह : नई कार्यवाहियाँ 71
साईमन कमीशन का आगमन; साण्डर्स की हत्या; योजना
की रूपरेखा; लाहौर से पलायन; असेम्बली में धमाका;
वाइसराय की गाड़ी को उड़ाने की योजना।
सप्तम अध्याय—न्याय का नाटक और आज़ाद 84.
असेम्बली बम काण्ड का मुकदमा; लाहौर काण्ड पर
मुकदमा; अनशन में जतीन दास की मृत्यु; मुकदमा
न्यायाधिकरण के अधीन; फैसला; फैसले के बाद; इस
बीच आज़ाद की भूमिका; आज़ाद द्वारा भगतसिंह की
मुक्ति का प्रयास; भगवतीचरण की मृत्यु; योजना की
असफलता; संशय के क्षण; यशपाल प्रकरण।
अष्टम अध्याय—वीरगति
नवम अध्याय—आज़ाद के जीवन के कुछ प्रेरक एवं
स्मरणीय प्रसंग
दशम अध्याय—व्यक्तित्व एवं विचार

  • एक स्वनिर्मित व्यक्तित्व; चरित्रबल के प्रतीक; परम्परा
    •- एवं प्रगतिशीलताके समन्वय; आदर्श नेतृत्व; भ०
    साहनी; आदर्श मित्र; देशप्रेम के पर्याय।

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पंचम अध्याय— नई सुबह : दल का पुनर्गठन 60—69
भगतसिंह से भेंट; नया दल : हिन्दुस्तान समाजवादी
गणतांत्रिक सेना; नये दल की केंद्रीय समिति; दल का
प्रांतीय एवं अंतःप्रांतीय संगठन; पुलिस से आंख-
मिचोली; पुलिस अधिकारी को जीवनदान; काकोरी
काण्ड के वीरों को छुड़ाने की योजना।
षष्ठे अध्याय—आरोह-अवरोह : नई कार्यवाहियां 70—83
साइमन कमीशन का आगमन; साण्डर्स की हत्या; योजना
की रूपरेखा; लाहौर से पलायन; असेम्बली में धमाका;
वाइसरॉय की गाड़ी को उड़ाने की योजना।
सप्तम अध्याय—न्याय का नाटक और आजाद 84—107
असेम्बली बम काण्ड का मुकदमा; लाहौर काण्ड पर
मुकदमा; अनशन में जतीन दास की मृत्यु; मुकदमा
न्यायाधिकरण के अधीन; फैसला; फैसले के बाद; इस
बीच आजाद की भूमिका; आजाद द्वारा भगतसिंह की
मुक्ति का प्रयास; भगवतीचरण की मृत्यु; योजना की
असफलता; संशय के क्षण; यशपाल प्रकरण।
अष्टम अध्याय—वीरगति 108—120
नवम अध्याय— आजाद के जीवन के कुछ प्रेरक एवं
स्मरणीय प्रसंग 121—128
दशम अध्याय—व्यक्तित्व एवं विचार 129—147

  • एक स्वनिर्मित व्यक्तित्व; चरित्रबल के प्रतीक; परम्परा
  • एवं प्रगतिशीलता के समन्वय; आदर्श नेतृत्व; अदम्य
    साहसी; आदर्श मित्र; देशप्रेम के पर्याय।

प्रथम अध्याय
प्रारंभिक जीवन
इस राष्ट्र के निर्माण में; इसकी स्वतन्त्रता के लिए न जाने कितने
वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान किया, उनमें से अनेक वीरों के नाम भी
ज्ञात नहीं हैं। जिन क्रान्तिकारी वीरों के नाम ज्ञात भी हैं, उन्हें भी आज
हम भूल जैसे गये हैं, उनके नाम केवल इतिहास की पुस्तकों तक ही सीमित
रह गये हैं। भारतीय स्वतन्त्रता का इतिहास सन् 1857 की क्रान्ति से ही
प्रारम्भ होता है। यद्यपि स्वतन्त्रता के इस पहले संग्राम को अंग्रेजों ने असफल
कर दिया था, फिर भी दासता की जंजीरों में बंधे भारतीयों को इससे जो
प्रेरणा मिली, उसी प्रेरणा ने उन्हें स्वतन्त्रता के लिए लगातार प्रयत्न करने
की शिक्षा दी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद भले ही इस
दल ने स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिए अहिंसक आधार पर स्वतन्त्रता की लड़ाई
लड़ी, आज सारा श्रेय कांग्रेस को ही दिया जाता है। किन्तु कांग्रेस के साथ
ही भारत के क्रान्तिकारी सपूतों ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध समानान्तर रूप
से युद्ध किया। अंग्रेज सरकार के लिए ये क्रान्तिकारी एक चुनौती बन गये
थे। हिंसा के माध्यम से विदेशी शासकों को देश से निकाल बाहर करना
और मातृभूमि को स्वतन्त्र कराना ही इनका लक्ष्य था।
भयंकर विपत्तियों का सामना करते हुए, सभी सुख-सुविधाओं को
त्यागकर, अपने प्राणों की परवाह न करके भारतीय वीर क्रान्तिकारी अपने
पावन कार्य को आगे बढ़ाते रहे। इन्हीं वीरों में एक नाम वीर शिरोमणि
अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद का भी है, जिन्होंने मातृभूमि की स्वतन्त्रता
के लिए अपना जीवन भी बलिदान कर दिया। यहाँ इसी वीर का जीवन-
चरित्र प्रस्तुत किया जा रहा है।

10 चन्द्रशेखर आजाद
आजाद की वंश-परम्परा एवं उनका मूल स्थान :
चन्द्रशेखर आजाद के पूर्वजों के मूल स्थान, स्वयं आजाद के निवास
स्थान आदि के विषय में अनेक भ्रान्तियाँ हैं। आजाद के पितामह मूलतः
में कानपुर के निवासी थे, जो बाद में गाँव बदरका जिला उन्नाव में बे
गये थे। इसीलिए आजाद के पिता पण्डित सीताराम तिवारी का बचप
यहीं व्यतीत हुआ था और यहीं उनकी युवावस्था का प्रारम्भिक काल
भी बीता। पण्डित सीताराम तिवारी के तीन विवाह हुए। उनकी पहली
पत्नी जिला उन्नाव के ही मौरावा की थी। अपनी इस पत्नी से उनके
एक पुत्र भी हुआ था, जो अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गया था। पण्डित
तिवारी का अपनी इस पत्नी के साथ अधिक दिनों तक निर्वाह न हो सका,
अतः उन्होंने इसे छोड़ दिया, जो अपने शेष जीवन में अपने मायके में ही
रही। इसके बाद उन्होंने दूसरा विवाह किया। उनकी दूसरी पत्नी उन्नाव
के ही सिकन्दरापुर गाँव की थी। उनकी यह द्वितीय पत्नी भी उनके
जीवन मे अधिक दिनों तक न रह सकीं; वह शीघ्र ही दिवंगत हो गईं।
इसके बाद उन्होंने तीसरा विवाह जगरानी देवी से किया। जगरानी देवी
गाँव चन्द्रमन खेड़ा, उन्नाव की थी। बदरका, उन्नाव में ही तिवारी
दम्पत्ति को एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। इस पुत्र का नाम उन्होंने सुखदेव
रखा।
आजाद का जन्म एवं बाल्यकाल :
इस पुत्र के जन्म के बाद पण्डित सीताराम आजीविका की खोज में
मध्यभारत की एक रियासत अलीराजपुर चले गए। बाद में उन्होंने अपनी
पत्नी जगरानी देवी तथा पुत्र सुखदेव को भी वहीं बुला लिया। अलीराज-
पुर के गाँव भावरा को उन्होंने अपना निवास स्थान बनाया। यहीं सुखदेव
के जन्म के 5-6 वर्ष बाद सन् 1905 में जगरानी देवी ने एक अन्य पुत्र को
जन्म दिया। यही बालक आगे चलकर चन्द्रशेखर आजाद के नाम से
प्रख्यात हुआ। इस नवजात बालक को देखकर बालक के माता-पिता को
बड़ी निराशा हुई, क्योंकि बालक अत्यन्त कमजोर था तथा जन्म के समय
इसका भार भी सामान्य बच्चों से बहुत कम था। इससे पूर्व तिवारी-

चन्द्रशेखर आजाद
दम्पत्ति की कुछ सन्तानें मृत्यु को प्राप्त हो गई थीं। अतः माँ-बाप इस
शिशु के स्वास्थ्य से अति चिन्तित रहते थे। दुर्बल होने पर भी बालक
बड़ा सुन्दर था; उसका मुख चन्द्रमा के समान गोल था।
सीताराम तिवारी की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पहले उन्होंने
वन विभाग में कोई मामूली-सी नौकरी की। यह काम करते समय एक
बार कुछ आदिवासियों ने उन्हें मार-पीटकर उनके रुपये-पैसे, कपड़े जो कुछ
पास था, सब छीन लिया। अतः उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी। इसके बाद
उन्होंने गाय-भैंस पशु पाले और उनका दूध बेचकर परिवार का निर्वाह
करने लगे। सन् 1912 के भयंकर सूखे से उनके बहुत-से पशु मर गये, अतः
उन्हें यह व्यवसाय भी छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने एक सरकारी बाग
में नौकरी की। उनकी आर्थिक स्थिति सदा ही दयनीय बनी रही, किन्तु
फिर भी उन्होंने ईमानदारी का दामन कभी नहीं छोड़ा। इस बाग से कभी
कोई छोटी-से छोटी वस्तु भी वह अपने घर नहीं लाये। श्री विश्वनाथ वैश-
म्पायन ने अपनी पुस्तक चन्द्रशेखर आजाद में इस विषय में पं० सीताराम
तिवारी का निम्न कथन उद्धृत किया है—
"सरकारी बाग की नौकरी में हमने कोई बेईमानी नहीं की, इस बाग
से कभी आम तो क्या एक भांटा (बैंगन) भी हमने तहसीलदार तक को
मुफ्त में नहीं भेजा। फिर घरवालों को तो मैंने कभी उन्हें छूने भी नहीं
दिया। अगर ये (आजाद की माता की ओर संकेत कर) कभी कोई फल-
फूल ले जाती, तो मैं इनका सिर काट देता।***हमने कभी बेईमानी से एक
पैसा भी नहीं कमाया और पराया धन हराम समझा।"
निर्धनता के कारण पण्डित सीताराम तिवारी आजाद के लिए दूध
आदि उचित आहार का प्रबन्ध भी नहीं कर सकते थे। उस क्षेत्र में एक
विश्वास प्रचलित है कि लोग अपने बच्चों को बाघ का मांस खिलाते हैं,
ताकि बच्चा स्वस्थ, बलवान तथा वीर बने। इसीलिए आजाद को भी बाघ
का मांस खिलाया गया। सम्भवतः यह मांस सुखाकर खिलाया जाता है,
जिसे लोग अपने पास रखते हैं। इसके बाद अपने पूरे जीवन में चन्द्रशेखर
आजाद एक शाकाहारी व्यक्ति थे। यद्यपि वह शिकार करने के शौकीन थे,
तथापि वह मांस नहीं खाते थे; हाँ, बाद में भगतसिंह के प्रभाव में आकर

12 चन्द्रशेखर आजाद
वे अण्डों खाने लगे थे।
दुबला-पतला बालक चन्द्रशेखर आजाद धीरे-धीरे चन्द्रमा की कलाओं
के समान बढने लगा। उनका शरीर स्वस्थ एवं हृष्ट-पुष्ट हो गया। इससे
माता-पिता को एक नई आशा जागी। एक नये हर्ष का संचार हुआ।
चन्द्रशेखर अपने बाल्यकाल से ही एक हठी स्वभाव के व्यक्ति थे। हठ के
साथ ही निर्भीकता एवं साहस भी उनके स्वभाव के अनन्य गुण थे। उनके
मन में जो बात आ जाती थी, उन्हें वह करके छोड़ते थे। इस सम्बन्ध में
उनके बचपन की एक घटना का वर्णन विभिन्न पुस्तकों में किया गया है।
एक बार वह दीपावली के अवसर पर रोशनी वाली दियासलाई से वो
रहे थे। तभी बालक चन्द्रशेखर के मन में यकायक एक विचार आया कि
जब एक तीली से इतनी रोशनी होती है, तो सारी तीलियों को एक साथ
जलाने से कितनी अधिक रोशनी होगी ! उन्होंने अपने मन की यह बात
साथियों को बताई, साथी भी इसका परिणाम जानने के लिए बड़े उत्सुक
हुए, परन्तु सारी तीलियाँ एक साथ जलाने का साहस किसी साथी को
नहीं हुआ; सभी को इतनी तीलियों के एक साथ जलने पर हाथ जलने
का डर था। बस फिर क्या था चन्द्रशेखर आगे आ गए; उन्होंने स्वयं इस
काम को करना स्वीकार किया। सारी तीलियां एक साथ जला डालीं।
तमाशा तो हुआ, किन्तु उनका हाथ भी जल गया। आज़ाद को इसकी
कोई परवाह नहीं थी। जब साथियों ने बताया कि उनका हाथ जल गया,
तभी उनका ध्यान इस ओर गया। साथियों ने उस पर दवा लगाने के लिए
कहा, किन्तु आजाद का कहना था कि जल गया है, तो अपने आप ठीक हो
जाएगा। साथी बच्चों को इससे बड़ी हैरानी हुई, वे आजाद का मुंह
ताकते रह गए। इस प्रकार के साहसिक कार्य करना बचपन से ही उनका
स्वभाव था, जो सम्भवतः उनके भावी जीवन का पूर्व संकेत था।
भाई-बहिन :
आजाद से पूर्व उनकी माँ के चार पुत्र हुए थे, जिनमें से सुखदेव ही
जीवित रहे, शेष तीन आजाद के जन्म से पूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हो गए
थे। जब आजाद बनारस में विद्यार्थी थे, उस समय उनके बड़े भाई सुखदेव

चन्द्रशेखर आजाद 13
अपने गांव के पास ही कहीं पोस्टमैन बन गये थे। इस पद पर उन्होंने
लगभग दो वर्ष तक काम किया। बाद में उन्हें निमोनिया हो गया और
उन्होंने पद से त्यागपत्र दे दिया। चिकित्सा की गई, किन्तु कोई परिणाम
न निकला तथा सन् 1925 में उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद वह अपने
माता-पिता की अकेली सन्तान शेष रह गये। सम्भवतः उनकी कोई सगी
बहिन नहीं थी। भाई की मृत्यु के समय आजाद लापता थे।
शिक्षा-दीक्षा :
घोर गरीबी के कारण पण्डित सीताराम तिवारी अपने पुत्रों की शिक्षा
देने में समर्थ नहीं थे। गांव की ही पाठशाला में उनकी शिक्षा आरम्भ
हुई। श्री मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है कि श्री मनोहरलाल त्रिवेदी नामक
एक सज्जन जो किसी सरकारी पद पर कार्यरत थे, उन दिनों सुखदेव तथा
चन्द्रशेखर आजाद को उनके घर पर भी पढ़ाते थे। उस समय सुखदेव की
अवस्था तेरह-चौदह वर्ष तथा आजाद की आठ वर्ष थी। श्री त्रिवेदी के
कथन को उद्धृत करते हुए उन्होंने लिखा है—
"जब सुखदेव की उम्र तेरह-चौदह और चन्द्रशेखर की सात-आठ
वर्ष की थी, तब मैं इन्हें पढ़ाया करता था। आजाद बचपन से ही न्याय-
प्रिय और उच्च विचारों वाले थे। एक बार मैं पढ़ा रहा था, तो जान-बूझ-
कर मैंने एक शब्द गलत बोल दिया। इस पर आजाद ने वह बेंत, जिसे मैं
उनको पढ़ाने में डराने और धमकाने को अपने पास रखता था, उठाया
और मुझे दो बेंत मार दिये। यह देख तिवारी जी दौड़े और उन्होंने
आजाद को पीटना चाहा, लेकिन मैंने उन्हें रोक दिया। पूछने पर आजाद
का उत्तर था—"हमारी गलती पर मुझे और भाई को ये मारते हैं, तो
इनकी गलती पर मैंने इन्हें मार दिया।"
इसके पश्चात् त्रिवेदी महोदय का स्थानान्तरण नाथपुर तहसील हो
गया, तब भी आजाद के घर उनका आना-जाना बना रहा। चार-पांच वर्ष
बाद उनका स्थानान्तरण पुनः भाभरा के पास ही खट्टाली गांव में हो गया,
तब त्रिवेदी जी ने आजाद को अपने ही पास रखकर पढ़ाया, क्योंकि
सीताराम तिवारी की स्थिति बच्चे को पढ़ा सकने की नहीं थी। आजाद

14 चन्द्रशेखर आ.
कुछ समय तो मनोहरलाल त्रिवेदी के साथ ही रहे। एक वर्ष बाद उनका
यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। इस अवसर पर वह त्रिवेदी जी के साथ
भावरा गये। झटानी में ही उन्होंने चौथी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की।
इन दिनों अलीराजपुर तहसील में कानपुर के निवासी श्री सीताराम
जी अग्निहोत्री तहसीलदार थे और श्री मनोहरलाल त्रिवेदी भी अलीराज-
पुर ही आ गये थे। एक बार चन्द्रशेखर आजाद उनसे मिलने अलीराजपुर
गए और उन्हीं के पास रह रहे थे। उन्होंने तहसीलदार से आजाद को कोई
नौकरी देने का निवेदन किया। तहसीलदार श्री अग्निहोत्री जी आजाद के
परिवार की ईमानदारी तथा आर्थिक स्थिति से परिचित थे। अतः उन्होंने
आजाद को नौकरी अलीराजपुर तहसील में ही लगा दी। इस समय
उनकी अवस्था लगभग चौदह वर्ष थी।
लगभग एक वर्ष आजाद ने यहां नौकरी की। इन्हीं दिनों उनका
परिचय एक व्यापारी से हुआ; जो बनारस का रहने वाला था और
मोतियों के व्यापार के सिलसिले में अलीराजपुर आया हुआ था। आजाद
उसके साथ भाग गये। उन्होंने नौकरी से त्याग-पत्र भी नहीं दिया।
सम्भवतः इस घूमते रहने वाले व्यापारी का जीवन चन्द्रशेखर आजाद को
बड़ा पसन्द आया था; यह स्वयं भी किसी बन्धन में बंधना नहीं चाहते थे।
उस व्यक्ति के साथ ही रहना आजाद को नहीं भाया। बम्बई तक उसके
साथ जाने पर उन्होंने उसका साथ छोड़ दिया। अब उनके सामने रोजी-
रोटी की समस्या थी, अतः वह बम्बई गोदी में काम करने लगे। नौकरी
लग जाने पर भी खाना बनाने की समस्या थी, क्योंकि अभी तक यह एक
रूढ़िवादी ब्राह्मण थे। स्वयं खाना बनाने की झंझट से मुक्त रहने के लिए
पहले तो कुछ दिन तक भुने हुए चनों से गुजारा करना पड़ा, किन्तु बाद में
ढाबों में खाना आरम्भ कर दिया। शाम को सिनेमा देखने चल देते, ताकि
वहां से आने पर शीघ्र नींद आ जाए। यह जीवन भी बड़ा ही ऊबाऊ और
निम्नस्तरीय था। यहां वह बड़ी कठिनता से सप्ताह में एक बार नहा
पाते थे। यहीं रहने पर उन्हें सदा एक कुली बनकर रह जाना पड़ता, अतः
उन्होंने अनुभव किया कि उन्हें बम्बई छोड़ देना चाहिए।
सम्भवतः इससे पूर्व वह अपने पिता के सामने बनारस जाकर संस्कृत

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16 चन्द्रशेखर आजाद
मिला। यह साथ उन्हें खूब भाया। वे उन्हीं के बीच रहने लगे। भीलों
के साथ रहकर उन्होंने उनसे धनुष एवं तीर चलाना सीखा। वे तीर से
निशाना लगाने में निपुण हो गए।
हर समाज की अपनी कुछ परम्पराएं होती हैं। इसी प्रकार भीलों के
समाज में भी अपराधी को तीर मारकर दण्ड देने की प्रथा है। एक बार
दुश्चरित्रता के आरोप में एक भील को तीर मारकर सजा दी जा रही थी।
इसी बीच बालक चन्द्रशेखर भी वहाँ पहुँचे। भीलों के नियमों के अनुसार
ऐसे समय वहाँ पहुँचने वाला कोई भी व्यक्ति निशाना लगा सकता है
चन्द्रशेखर को भी तीर से निशाना लगाने के लिए कहा गया, उनका
निशाना अचूक था। उनके तीर दोषी व्यक्ति की आँखों में लगे और उसकी
दोनों आँखें जाती रहीं। उनके चाचाजी को इस सब घटना की सूचना मिली
वह चन्द्रशेखर पर नाराज हुए। उन्हें चन्द्रशेखर का भीलों की संगति में
रहना उचित नही लगा। उन्होने अपने मन मे विचार किया कि इससे
उनका (चन्द्रशेखर का) जीवन बरबाद हो जाएगा। फलतः उन्होने चन्द्र-
शेखर को पुनः बनारस भेज दिया।
इस बार चन्द्रशेखर ने बुद्धिमानी से काम लिया। वह मन लगाकर
पढ़ने लगे, किन्तु संस्कृत व्याकरण की पढ़ाई उन्हें रुचिकर नही लगती थी,
क्योंकि इसमें रटने पर जोर दिया जाता है। यहीं उन्होंने संस्कृत भाषा,
उसके व्याकरण आदि का साधारण-सा अध्ययन किया। यहाँ वह एक
धर्मशाला में रहते थे। भोजन आदि की व्यवस्था भी धर्मशाला की ओर
थी।
चन्द्रशेखर बचपन से ही चञ्चल स्वभाव के थे। अधिक समय तक
एक ही स्थान पर रहना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। अतः वह कभी-कभी
गंगाजी में उतर जाते और घण्टो तैरते रहते। कभी रामायण, महाभारत
या किसी पुराण की कथा मे बैठ जाते तथा कथा सुनते रहते। वीर पुरुषों,
देशभक्तों आदि की कहानियाँ सुनना उन्हें बचपन से ही रुचिकर लगता था।
विद्यार्थी जीवन से राजनीति की ओर :
जब चन्द्रशेखर बनारस में अध्ययन कर रहे थे, उन्हीं दिनों भारतीय

चन्द्रशेखर आजाद 17
राजनीति में महात्मा गांधी का पदार्पण हो चुका था। इसके साथ ही
भारत भर में क्रान्तिकारियों की गतिविधियाँ भी बढ़ने लगी थीं। अंग्रेजी
सरकार ने भारतीयों का दमन करने के लिए एक समिति बनायी, जिसके
अध्यक्ष जस्टिस ए० एस० टी० रौलेट थे तथा इसमें निम्नलिखित चार
अन्य सदस्य थे।

  1. बेसिल स्कॉट, मुख्य न्यायाधीश, बम्बई उच्च न्यायालय।
  2. कुमार स्वामी शास्त्री, न्यायाधीश, मद्रास उच्च न्यायालय।
    3 बर्ने लावेट, बोर्ड ऑफ रेवेन्यू, यू० पी० के सदस्य।
  3. प्रभातचन्द्र मित्र, अधिवक्ता उच्च न्यायालय कलकत्ता।
    इस समिति का गठन करते समय इसके दो उद्देश्य बताये गये थे—
    भारत में क्रान्तिकारी गतिविधियों के विषय में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त
    करना तथा इन्हें दबाने के लिए कानून बनाना।
    स्पष्ट है कि इसका उद्देश्य भारतीयों की स्वतन्त्रता की आवाज को
    दबाना था, किन्तु सरकार का तर्क था कि सुधारों के लिए इस समिति का
    गठन किया गया था। यह समिति 10 दिसम्बर, 1917 को बनी थी। अन्त
    में इसने दो सौ छब्बीस पृष्ठों की अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। भारतीयों की
    स्वतन्त्रता एवं उनके अधिकारों को इस रिपोर्ट द्वारा और भी कम कर दिया
    गया था। इस रिपोर्ट से केवल क्रान्तिकारी आन्दोलनों का ही दमन नहीं
    होना था, वरन् इसका उद्देश्य राजनीतिक आन्दोलनों को दबाना भी था।
    इस समिति का नाम 'सिडीशन' कमेटी था, अतः इसके माध्यम से राज-
    नीतिक आन्दोलनों को भी राजद्रोह कहकर दबाया जा सकता था। यह
    रिपोर्ट पुलिस के विचारों पर आधारित थी। इसमें गर्म दल के कांग्रेसियों
    लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल आदि को तथा चाफेकर
    बन्धुओं, खुदीराम बोस आदि क्रान्तिकारियों को एक समान माना गया
    था। हिंसा तथा अहिंसा आदि का विचार नहीं किया गया था।
    रौलेट कमेटी की सिफारिशें :
    इस समिति ने पुलिस को विस्तृत अधिकार प्रदान कर दिये थे।
    पुलिस जब और जिसे चाहे नजरबन्द कर सकती थी, गिरफ्तार कर सकती

18 चन्द्रशेखर आज़ाद
दी, तलाशी ले सकती थी तथा जमानत माँग सकती थी। इस प्रकार इस
समिति की सिफारिशों से जहाँ एक ओर पुलिस को तानाशाही अधिकार
प्राप्त हो जाते थे, वहीं दूसरी ओर इनसे न्यायालयों की कार्यवाहियों भी
प्रभावित होती थी। इसमें ऐसी सिफारिशें भी थीं, जिनसे अभियुक्तों को
बिना पर्याप्त प्रमाणों के शीघ्रातिशीघ्र दण्डित किया जा सके। इन
सिफारिशों को सरकार ने स्वीकार कर लिया तथा यही सिफारिशें रौलेट
बिल कही गईं।
रौलेट एक्ट का देशव्यापी विरोध :
1919 के आरम्भ में इस रिपोर्ट के प्रकाशित होते ही सारे देश में
असन्तोष की लहर फैल गई। कांग्रेस ने इसे भारतीयों के मौलिक अधिकारों
पर कुठाराघात कहकर इसका विरोध किया। महात्मा गांधी ने इस बिल
के विरोध में सारे देश में सत्याग्रह करने की चेतावनी दी। और 30 मार्च,
1919 को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। यद्यपि यह तिथि फिर
बदलकर 6 अप्रैल कर दी गई, किन्तु सूचना न मिल पाने के कारण दिल्ली
में 30 मार्च को ही सफल हड़ताल हुई। एक विशाल जुलूस निकाला गया,
जिसका नेतृत्व आर्य समाज के प्रधान स्वामी श्रद्धानन्द ने किया। गोरे
सिपाहियों ने स्वामीजी को गोली मार देने की धमकी दी, परन्तु स्वामीजी
इससे बिलकुल भी विचलित नहीं हुए। वह आगे बढ़ते गए। दिल्ली रेलवे
स्टेशन पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें पाँच व्यक्तियों की मृत्यु हुई
तथा बीस व्यक्ति घायल हुए। देशवासियों का स्वतन्त्रता-प्रेम दासता की
जंजीरों को काट डालना चाहता था। सरकार उन्हें कुचल देना चाहती
थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर क्या किया जाए ?
दिल्ली के इस आन्दोलन में हिन्दू तथा मुसलमानों की एक अभूतपूर्व
एकता के दर्शन हुए। दोनों ने एक दूसरे के कन्धे से कन्धा मिलाकर इस
आन्दोलन को सफल बनाया। हिन्दुओं ने सार्वजनिक रूप में मुसलमानों के
हाथों से पानी पिया और 4 अप्रैल, 1919 को स्वामी श्रद्धानन्द ने दिल्ली
की शाही जामा मस्जिद की मिम्बर से वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते
हुए अपना भाषण दिया। निःसन्देह यह भारतीय इतिहास की

न्द्रशेखर आजाद 19
पूर्व घटना है; एक उज्ज्वलतम ऐतिहासिक पहलू है ।
दिल्ली के साथ ही सारे देश में इस बिल का विरोध हुआ। सन् 1919
में अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था। इसकी तैयारियाँ
डॉक्टर किचलू तथा सत्यपाल कर रहे थे। सरकार ने इन दोनों को
गिरफ्तार करके किसी अज्ञात स्थान पर भेज दिया। जनता इसका कारण
जानने के लिए मजिस्ट्रेट से मिलने के लिए चल पड़ी, किन्तु पुलिस ने उसे
रास्ते में ही रोक दिया। इसी बीच हिंसक उपद्रव हो गया, जिसमें पाँच
गोरे मारे गये। कई मकानों में आग लगा दी गई। जनता में आक्रोश की
कोई सीमा नहीं थी। गुजरांवाला तथा कसूर में भी हिंसक घटनाएँ हुईं।
डॉ० सत्यपाल ने गांधीजी को अमृतसर आने के लिए पत्र लिखा था। वह
8 अप्रैल को पंजाब के लिए प्रस्थान कर चुके थे। रास्ते में ही पलवल
नामक स्टेशन पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और बम्बई भेज दिया
गया।
रौलेट बिल के विरोध में पूरे पंजाब में जुलूस निकाले गये। सड़कों
पर तीन-तीन मील लम्बे जुलूस देखे गये। सड़कें प्रदर्शन करने वालों से
ठसाठस भरी हुई थीं। काले झण्डों का प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनों के
साथ ही हड़ताल भी की गई। यह हड़ताल सात दिनों तक चली। पुलिस
बलात् दूकान खुलवा देती, किन्तु पुलिस के हटते ही दुकानें फिर बन्द हो
जातीं। लाहौर में हड़ताल के दौरान बाजार की गलियों में खाना बनता
था। महिलाएँ अपनी इच्छा से इसमें काम करती थीं, ताकि काम करने
वाले तथा मजदूरी पर निर्भर रहनेवाली जनता को खाना मिल सके।
लोगों ने अपने संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर देश के हित में आन्दोलन में
भाग लिया। जगह-जगह रौलेट बिल हाय-हाय के नारे लग रहे थे, सम्राट्
पञ्चम जार्ज के पुतले जलाये जा रहे थे। पुलिस जब चाहती जगह-जगह
लाठीचार्ज करती रहती थी। कई जगहों पर पुलिस ने गोलियां भी चलाईं।
धड़ाधड़ गिरफ्तारियाँ तथा बाजारों में खुलेआम प्रदर्शनकारियों को बेंत
लगाना साधारण बात हो गई थी। सरकार हड़ताल समाप्त करने तथा
प्रदर्शन रोकने के लिए पोस्टर चिपकाती, किन्तु जनता उन्हें फाड़
डालती।

ून डाला गया। इस घटना के लिए केवल जनरल डायर के"
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"डायर के" -> look at L27 start:
"सिर पर दोष थोपना गलत होगा, क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने योजना"

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"सिर पर दोष थोपना गलत होगा, क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने योजना"
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"योजना" -> look at L28 start:
"बनाकर यह सारी बातें की थी, ऐसा ही मैं समझता हूँ। बात यह है कि"

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"बनाकर यह सारी बातें की थी, ऐसा ही मैं समझता हूँ। बात यह है कि"
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"पंजाब से ही ब्रिटिश साम्राज्यवाद को सबसे अच्छे जवान मिलते थे, इस-"

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"लिए स्वाभाविक तौर पर सरकार यह नहीं चाहती थी कि इस प्रान्त में"

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"लिए स्वाभाविक तौर पर सरकार यह नहीं चाहती थी कि इस प्रान्त में"

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चन्द्रशेखर आजाद 21
सी प्रकार बदअमनी फैले। इस सम्बन्ध में सरकार पनपने से पहले नोच
लेने वाली नीति बरतना चाहती थी। जनरल डायर तब तक गोली
चलाते रहे, जब तक कि उनका सारा क्रोध ठण्डा न हो गया। और इस
बात को उन्होंने बड़ी अकड़ के साथ कमीशन के सामने कहा। क्यों न कहते,
उन्हें किसी प्रकार का डर तो था नहीं।"
इस काण्ड में कुल सोलह सौ गोलियाँ चली थीं। सरकार की रिपोर्ट
के अनुसार इसमें चार सौ व्यक्तियों की मृत्यु हुई तथा लगभग दो हजार
व्यक्ति घायल हुए। इस प्रकार की घटनाओं में सरकार की रिपोर्ट प्रायः
गलत ही होती है, अतः यह रिपोर्ट भी सही नहीं थी। बाद में इसकी जाँच
के लिए कांग्रेस ने एक आयोग का गठन किया, जिसकी रिपोर्ट के अनुसार
मृतकों एवं घायलों की संख्या सरकारी रिपोर्ट से लगभग दुगुनी थी।
इस काण्ड के बाद भी सरकार की क्रूरता में कमी नहीं आई। अमृतसर
के लिए पानी एवं बिजली की आपूर्ति बन्द कर दी गई। राह चलते लोगों
को बेंतों से पीटा जाता था, उन्हें छाती के बल रेंगकर चलने के लिए विवश
किया जाता था। सैनिक कानून के अन्तर्गत दुकानों में वस्तुओं के भाव
सैनिकों की इच्छा के अनुसार तय किये जाते थे। सैकड़ों लोगों को गिर-
फ्तार करके जेलों में भेजा गया था।
पंजाब के गवर्नर माइकल ओडायर ने जनरल डायर के इस कार्य की
प्रशंसा की थी। सैनिक शासन के इन अत्याचारों का वर्णन श्री मन्मथनाथ

22 चन्द्रशेखर अ...
बैंत लगवाये गए। , राह चलने वालो से कुलियों का काम लिया गया
हुक्म भी था कि स्कूल के लड़के दिन मे आकर तीन बार ब्रिटिश झ
मलामी करें, बच्चों से प्रतिज्ञा कराई गई कि वे कभी कोई अपरा
करेंगे तथा उनसे पश्चाताप करवाया गया। लाला हरिकिशन स
चालीस लाख रुपये जब्त कर लिये गए तथा उन्हें काले पानी की सज
इन अत्याचारों का कहाँ तक वर्णन किया जाए।"
पंजाब की इन घटनाओं से पूरे भारतवर्ष में एक क्षोभ का वाता
उत्पन्न हो गया। चन्द्रशेखर इन सब घटनाओं से अपरिचित नहीं र
समस्त घटनाओं के विषय में उन्होंने समाचार-पत्रों में पढ़ा। देशवा
पर विदेशी अंग्रेजों के इन अत्याचारों से किशोर चन्द्रशेखर का खून
लगा। उनके हृदय में प्रतिशोध की आग धधकने लगी। इस समय
अवस्था लगभग चौदह वर्ष थी।
बैंतों की सजा और चन्द्रशेखर से आजाद :
अमृतसर के बाद दूसरे वर्ष 1920 में कांग्रेस का अधिवेशन कल
में हुआ। यह एक विशेष अधिवेशन था, जिसमे लाला लाजपतराय स
पति बनाये गए। इस अधिवेशन में सरकार के साथ असहयोग का प्र
रखा गया। यद्यपि देशबन्धु चित्तरंजनदास, महामना मदनमोहन मालवी
विपिनचन्द्र पाल आदि पुराने नेता इस प्रस्ताव के विरुद्ध थे, फिर भी
प्रस्ताव पास हो गया। फिर इसी वर्ष कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन नाग
में हुआ, जिसके सभापति विजय राघवाचार्य थे। इस अधिवेशन में भी
प्रस्ताव भारी बहुमत से पास हो गया।
1921 के प्रारम्भ में ही महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूरे देश में अस
योग आन्दोलन चलाया गया। असहयोग आन्दोलन की यह आँधी अपने
वेग के साथ देश-भर में फैल गई। विदेशी वस्त्रों की होलियां जलाई गई
वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार कर दिया। विद्यार्थी सरकारी त
सरकार से सहायता लेनेवाले विद्यालयों का बहिष्कार करने लगे। विदे
वस्तुओं की दुकानों पर आन्दोलन करनेवाले धरना देते थे। जगह-जग
सभाएं हुईं। जुलूस निकाले गए। ... ... के साथ हर प्रका

चन्द्रशेखर आजाद
का असहयोग करने का आह्वान करते थे।
पूरे देश की तरह बनारस भी इस आन्दोलन से अछूता नहीं रह सका।
अनेक विद्यार्थी इस आन्दोलन में उतर पड़े। उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी।
प्रायः सदा ही प्रदर्शन होने, सभाएँ की जातीं तथा नारों से दसों दिशाएँ
गूंज उठतीं। असहयोग आन्दोलन में भाग लेने वाली जनता पर पुलिस
लाठियाँ बरसाती। चन्द्रशेखर सभाओं में जाते, भाषण सुनते तथा पुलिस के
अत्याचारों को देखते। इन सब बातों ने उनके किशोर मन को झकझोरकर
रख दिया। पुलिस के अत्याचारों को देखकर उनका मन विद्रोह कर उठता,
वह प्रारम्भ से ही स्वतन्त्रता प्रेमी थे। अतः अपने-आपको रोक नहीं सके।
वे पढ़ाई की ओर से विमुख होकर असहयोग आन्दोलन में उतर पड़े। अभी
उनकी अवस्था केवल पन्द्रह वर्ष के लगभग ही थी।
एक दिन कुछ आन्दोलनकर्ता एक विदेशी कपड़े की दुकान पर धरना
दे रहे थे। इतने में पुलिस आ गई। पुलिस का एक दारोगा धरना देनेवालों
पर डण्डे बरसाने लगा, वह उन्हें बुरी तरह पीट रहा था। चन्द्रशेखर से
यह अत्याचार नहीं देखा गया; वह अपने-आप पर संयम न रख सके। पास
में ही एक पत्थर पड़ा था। उन्होंने दूर से ही वह पत्थर उस दारोगा के माथे
पर दे मारा। निशाना अचूक लगा था; दारोगा का माथा फूट गया और
वह वहीं पर भूमि पर गिर पड़ा। एक दूसरे सिपाही ने चन्द्रशेखर को ऐसा
करते हुए देख लिया था, चन्द्रशेखर भी इस बात को जान गए, अतः वह
भीड़ के बीच से स्वयं को पुलिस की नजरों से बचाते हुए भाग खड़े हुए।
एक सिपाही ने उन्हें पकड़ने का प्रयत्न किया, परन्तु वह उसकी पकड़ में
नहीं आए।
चन्द्रशेखर के माथे पर चन्दन का टीका लगा था। जिस सिपाही ने
उन्हें पत्थर मारते हुए देखा था, वह उन्हें पहचान गया था। अतः वह कुछ
अन्य सिपाहियों को साथ लेकर उन्हें ढूँढ़ने के लिए निकल पड़ा। जहाँ-जहाँ
उनके मिलने की सम्भावना थी, उन सभी धर्मशालाओं, विद्यालयों तथा
अन्य स्थानों पर खोज अन्त में पुलिसवाले उस धर्मशाला में भी
पहुँच गए, जहाँ रहे थे। पुलिस का सिपाही कमरे में घुस
गया। वहाँ स ता साउपरछात्र, महात्मा गांधी राष्ट्रीय