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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

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चन्द्रशेखर आजाद
दम्पत्ति की कुछ सन्तानें मृत्यु को प्राप्त हो गई थीं। अतः माँ-बाप इस
शिशु के स्वास्थ्य से अति चिन्तित रहते थे। दुर्बल होने पर भी बालक
बड़ा सुन्दर था; उसका मुख चन्द्रमा के समान गोल था।
सीताराम तिवारी की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पहले उन्होंने
वन विभाग में कोई मामूली-सी नौकरी की। यह काम करते समय एक
बार कुछ आदिवासियों ने उन्हें मार-पीटकर उनके रुपये-पैसे, कपड़े जो कुछ
पास था, सब छीन लिया। अतः उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी। इसके बाद
उन्होंने गाय-भैंस पशु पाले और उनका दूध बेचकर परिवार का निर्वाह
करने लगे। सन् 1912 के भयंकर सूखे से उनके बहुत-से पशु मर गये, अतः
उन्हें यह व्यवसाय भी छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने एक सरकारी बाग
में नौकरी की। उनकी आर्थिक स्थिति सदा ही दयनीय बनी रही, किन्तु
फिर भी उन्होंने ईमानदारी का दामन कभी नहीं छोड़ा। इस बाग से कभी
कोई छोटी-से छोटी वस्तु भी वह अपने घर नहीं लाये। श्री विश्वनाथ वैश-
म्पायन ने अपनी पुस्तक चन्द्रशेखर आजाद में इस विषय में पं० सीताराम
तिवारी का निम्न कथन उद्धृत किया है—
"सरकारी बाग की नौकरी में हमने कोई बेईमानी नहीं की, इस बाग
से कभी आम तो क्या एक भांटा (बैंगन) भी हमने तहसीलदार तक को
मुफ्त में नहीं भेजा। फिर घरवालों को तो मैंने कभी उन्हें छूने भी नहीं
दिया। अगर ये (आजाद की माता की ओर संकेत कर) कभी कोई फल-
फूल ले जाती, तो मैं इनका सिर काट देता।***हमने कभी बेईमानी से एक
पैसा भी नहीं कमाया और पराया धन हराम समझा।"
निर्धनता के कारण पण्डित सीताराम तिवारी आजाद के लिए दूध
आदि उचित आहार का प्रबन्ध भी नहीं कर सकते थे। उस क्षेत्र में एक
विश्वास प्रचलित है कि लोग अपने बच्चों को बाघ का मांस खिलाते हैं,
ताकि बच्चा स्वस्थ, बलवान तथा वीर बने। इसीलिए आजाद को भी बाघ
का मांस खिलाया गया। सम्भवतः यह मांस सुखाकर खिलाया जाता है,
जिसे लोग अपने पास रखते हैं। इसके बाद अपने पूरे जीवन में चन्द्रशेखर
आजाद एक शाकाहारी व्यक्ति थे। यद्यपि वह शिकार करने के शौकीन थे,
तथापि वह मांस नहीं खाते थे; हाँ, बाद में भगतसिंह के प्रभाव में आकर