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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 148 में से

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पृष्ठ 17

14 चन्द्रशेखर आ.
कुछ समय तो मनोहरलाल त्रिवेदी के साथ ही रहे। एक वर्ष बाद उनका
यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। इस अवसर पर वह त्रिवेदी जी के साथ
भावरा गये। झटानी में ही उन्होंने चौथी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की।
इन दिनों अलीराजपुर तहसील में कानपुर के निवासी श्री सीताराम
जी अग्निहोत्री तहसीलदार थे और श्री मनोहरलाल त्रिवेदी भी अलीराज-
पुर ही आ गये थे। एक बार चन्द्रशेखर आजाद उनसे मिलने अलीराजपुर
गए और उन्हीं के पास रह रहे थे। उन्होंने तहसीलदार से आजाद को कोई
नौकरी देने का निवेदन किया। तहसीलदार श्री अग्निहोत्री जी आजाद के
परिवार की ईमानदारी तथा आर्थिक स्थिति से परिचित थे। अतः उन्होंने
आजाद को नौकरी अलीराजपुर तहसील में ही लगा दी। इस समय
उनकी अवस्था लगभग चौदह वर्ष थी।
लगभग एक वर्ष आजाद ने यहां नौकरी की। इन्हीं दिनों उनका
परिचय एक व्यापारी से हुआ; जो बनारस का रहने वाला था और
मोतियों के व्यापार के सिलसिले में अलीराजपुर आया हुआ था। आजाद
उसके साथ भाग गये। उन्होंने नौकरी से त्याग-पत्र भी नहीं दिया।
सम्भवतः इस घूमते रहने वाले व्यापारी का जीवन चन्द्रशेखर आजाद को
बड़ा पसन्द आया था; यह स्वयं भी किसी बन्धन में बंधना नहीं चाहते थे।
उस व्यक्ति के साथ ही रहना आजाद को नहीं भाया। बम्बई तक उसके
साथ जाने पर उन्होंने उसका साथ छोड़ दिया। अब उनके सामने रोजी-
रोटी की समस्या थी, अतः वह बम्बई गोदी में काम करने लगे। नौकरी
लग जाने पर भी खाना बनाने की समस्या थी, क्योंकि अभी तक यह एक
रूढ़िवादी ब्राह्मण थे। स्वयं खाना बनाने की झंझट से मुक्त रहने के लिए
पहले तो कुछ दिन तक भुने हुए चनों से गुजारा करना पड़ा, किन्तु बाद में
ढाबों में खाना आरम्भ कर दिया। शाम को सिनेमा देखने चल देते, ताकि
वहां से आने पर शीघ्र नींद आ जाए। यह जीवन भी बड़ा ही ऊबाऊ और
निम्नस्तरीय था। यहां वह बड़ी कठिनता से सप्ताह में एक बार नहा
पाते थे। यहीं रहने पर उन्हें सदा एक कुली बनकर रह जाना पड़ता, अतः
उन्होंने अनुभव किया कि उन्हें बम्बई छोड़ देना चाहिए।
सम्भवतः इससे पूर्व वह अपने पिता के सामने बनारस जाकर संस्कृत