अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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संदर्भ में पढ़ें12 चन्द्रशेखर आजाद
वे अण्डों खाने लगे थे।
दुबला-पतला बालक चन्द्रशेखर आजाद धीरे-धीरे चन्द्रमा की कलाओं
के समान बढने लगा। उनका शरीर स्वस्थ एवं हृष्ट-पुष्ट हो गया। इससे
माता-पिता को एक नई आशा जागी। एक नये हर्ष का संचार हुआ।
चन्द्रशेखर अपने बाल्यकाल से ही एक हठी स्वभाव के व्यक्ति थे। हठ के
साथ ही निर्भीकता एवं साहस भी उनके स्वभाव के अनन्य गुण थे। उनके
मन में जो बात आ जाती थी, उन्हें वह करके छोड़ते थे। इस सम्बन्ध में
उनके बचपन की एक घटना का वर्णन विभिन्न पुस्तकों में किया गया है।
एक बार वह दीपावली के अवसर पर रोशनी वाली दियासलाई से वो
रहे थे। तभी बालक चन्द्रशेखर के मन में यकायक एक विचार आया कि
जब एक तीली से इतनी रोशनी होती है, तो सारी तीलियों को एक साथ
जलाने से कितनी अधिक रोशनी होगी ! उन्होंने अपने मन की यह बात
साथियों को बताई, साथी भी इसका परिणाम जानने के लिए बड़े उत्सुक
हुए, परन्तु सारी तीलियाँ एक साथ जलाने का साहस किसी साथी को
नहीं हुआ; सभी को इतनी तीलियों के एक साथ जलने पर हाथ जलने
का डर था। बस फिर क्या था चन्द्रशेखर आगे आ गए; उन्होंने स्वयं इस
काम को करना स्वीकार किया। सारी तीलियां एक साथ जला डालीं।
तमाशा तो हुआ, किन्तु उनका हाथ भी जल गया। आज़ाद को इसकी
कोई परवाह नहीं थी। जब साथियों ने बताया कि उनका हाथ जल गया,
तभी उनका ध्यान इस ओर गया। साथियों ने उस पर दवा लगाने के लिए
कहा, किन्तु आजाद का कहना था कि जल गया है, तो अपने आप ठीक हो
जाएगा। साथी बच्चों को इससे बड़ी हैरानी हुई, वे आजाद का मुंह
ताकते रह गए। इस प्रकार के साहसिक कार्य करना बचपन से ही उनका
स्वभाव था, जो सम्भवतः उनके भावी जीवन का पूर्व संकेत था।
भाई-बहिन :
आजाद से पूर्व उनकी माँ के चार पुत्र हुए थे, जिनमें से सुखदेव ही
जीवित रहे, शेष तीन आजाद के जन्म से पूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हो गए
थे। जब आजाद बनारस में विद्यार्थी थे, उस समय उनके बड़े भाई सुखदेव