अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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संदर्भ में पढ़ें16 चन्द्रशेखर आजाद
मिला। यह साथ उन्हें खूब भाया। वे उन्हीं के बीच रहने लगे। भीलों
के साथ रहकर उन्होंने उनसे धनुष एवं तीर चलाना सीखा। वे तीर से
निशाना लगाने में निपुण हो गए।
हर समाज की अपनी कुछ परम्पराएं होती हैं। इसी प्रकार भीलों के
समाज में भी अपराधी को तीर मारकर दण्ड देने की प्रथा है। एक बार
दुश्चरित्रता के आरोप में एक भील को तीर मारकर सजा दी जा रही थी।
इसी बीच बालक चन्द्रशेखर भी वहाँ पहुँचे। भीलों के नियमों के अनुसार
ऐसे समय वहाँ पहुँचने वाला कोई भी व्यक्ति निशाना लगा सकता है
चन्द्रशेखर को भी तीर से निशाना लगाने के लिए कहा गया, उनका
निशाना अचूक था। उनके तीर दोषी व्यक्ति की आँखों में लगे और उसकी
दोनों आँखें जाती रहीं। उनके चाचाजी को इस सब घटना की सूचना मिली
वह चन्द्रशेखर पर नाराज हुए। उन्हें चन्द्रशेखर का भीलों की संगति में
रहना उचित नही लगा। उन्होने अपने मन मे विचार किया कि इससे
उनका (चन्द्रशेखर का) जीवन बरबाद हो जाएगा। फलतः उन्होने चन्द्र-
शेखर को पुनः बनारस भेज दिया।
इस बार चन्द्रशेखर ने बुद्धिमानी से काम लिया। वह मन लगाकर
पढ़ने लगे, किन्तु संस्कृत व्याकरण की पढ़ाई उन्हें रुचिकर नही लगती थी,
क्योंकि इसमें रटने पर जोर दिया जाता है। यहीं उन्होंने संस्कृत भाषा,
उसके व्याकरण आदि का साधारण-सा अध्ययन किया। यहाँ वह एक
धर्मशाला में रहते थे। भोजन आदि की व्यवस्था भी धर्मशाला की ओर
थी।
चन्द्रशेखर बचपन से ही चञ्चल स्वभाव के थे। अधिक समय तक
एक ही स्थान पर रहना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। अतः वह कभी-कभी
गंगाजी में उतर जाते और घण्टो तैरते रहते। कभी रामायण, महाभारत
या किसी पुराण की कथा मे बैठ जाते तथा कथा सुनते रहते। वीर पुरुषों,
देशभक्तों आदि की कहानियाँ सुनना उन्हें बचपन से ही रुचिकर लगता था।
विद्यार्थी जीवन से राजनीति की ओर :
जब चन्द्रशेखर बनारस में अध्ययन कर रहे थे, उन्हीं दिनों भारतीय