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बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

नक्षत्रजातकाध्यायः ५६१
धनधान्यसञ्चयानामीशः स्यान्नृपतिसत्कृतो यज्वा।
अक्लेशभाग् जितरिपुः श्रविष्ठायाभीष्टतारश्च।। इति।।१२।।
अथ शतभिषक्पूर्वभद्रपदयोर्जातस्य स्वरूपमाह—
स्फुटवाग्व्यसनी रिपुहा साहसिकः शतभिषक्सु दुर्ग्राह्यः ।
भद्रपदासूद्विग्नः स्त्रीजितधनपटुरदाता च ॥१३॥
शतभिषा नक्षत्र में उत्पन्न जातक स्पष्ट बोलने वाला, अनेक व्यसन में आसक्त,
शत्रुओं का नाश करने वाला, साहसी और कष्ट से किसी के वश में आने वाला होता है।
पूर्वभाद्र में उत्पन्न जातक दुःखित चित्त वाला, स्त्री के वश में रहने वाला, धनी, पण्डित
और कृपण होता है।।१३।।
स्फुटवाग् निष्ठुरभाषी। व्यसनी भूषणादिव्यसनोपेतः। रिपुहा शत्रुहर्ता। साहसिकः
असमीक्षितवीर्यवान्। दुर्ग्राह्यो दुराराध्यः। एवंविधः शतभिषक्सु जातो भवति। तथा च
पराशरः—
परदारमद्यसेवी क्लेशसहो वारुणे नरो धीरः।
स्थिरसञ्चयः स्थिरसुहृद्विषक्रियापण्डितो रोगी।।
भद्रपदास्विति। उद्विग्नः दुःखितः। स्त्रीजितधनः स्त्रिया जितं धनं यस्य स्त्रीभिर्वा।
पटुः प्रवक्ता। अदाता च लुब्धः। एवंविधो भद्रपदास जातो भवति। तथा च पराशरः—
दारुणकर्मा क्रोधी निशाचरस्तीक्ष्णविक्रमश्चपलः।
विषमः प्रसह्य हन्ता प्राक्प्रौष्ठपदे भवति जातः।। इति।।१३।।
अथोत्तरभद्रपदारेवत्योर्जातस्य स्वरूपमाह—
वक्ता सुखी प्रजावान् जितशत्रुर्धार्मिको द्वितीयासु ।
सम्पूर्णाङ्गः सुभगः शूरः शुचिरर्थवान् पौष्णे ॥१४॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां नक्षत्रजातकं
नामैकशततमोऽध्यायः ॥१०१॥
उत्तरभाद्रपदा में उत्पन्न जातक वक्ता, सुखी, सन्तति से युक्त, शत्रुओं को जीतने
वाला और धर्माचरण करने वाला होता है। रेवती नक्षत्र में उत्पन्न जातक सम्पूर्ण अंगों से
युक्त, सबका प्रिय, पवित्र और धनवान होता है।
विशेष—अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो चोर, द्वितीय में थोड़ा काम
करने वाला, तृतीय में सबका प्रिय और चतुर्थ में जन्म हो तो दीर्घायु होता है। भरणी के
प्रथम चरण में जन्म हो तो त्यागी, द्वितीय में भोगी, तृतीय में पाप कर्म करने वाला और
चतुर्थ चरण में जन्म हो तो दरिद्र होता है। कृत्तिका नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो
बृ० भ० द्वि०-३६
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५६२ बृहत्संहिता
तेजस्वी, द्वितीय में शास्त्र का ज्ञाता, तृतीय में शूर और चतुर्थ में सन्तानयुक्त होता है।
रोहिणी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो सौभाग्य से युक्त, द्वितीय में पीड़ायुक्त,
तृतीय में भययुक्त और चतुर्थ में सत्यवक्ता होता है। मृगशिरा नक्षत्र के प्रथम चरण में
जन्म हो तो राजा, द्वितीय में चोर, तृतीय में भोगी और चतुर्थ में जन्म हो तो अन्न-धन
से युक्त होता है। आर्द्रा नक्षत्र में प्रथम चरण में जन्म हो तो व्यय करने वाला, द्वितीय
में दरिद्र, तृतीय में अल्पायु और चतुर्थ चरण में जन्म हो तो चोर होता है। पुनर्वसु नक्षत्र
के प्रथम चरण में जन्म हो तो सुखी, द्वितीय में विद्वान्, तृतीय में रोगी और चतुर्थ चरण
में जन्म हो तो मिथ्यावादी होता है। पुष्य नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो दीर्घायु,
द्वितीय में चोर, तृतीय में भोगी और चतुर्थ में जन्म हो तो धनी होता है। आश्लेषा के
प्रथम चरण में जन्म हो तो सन्तान से रहित, द्वितीय में भृत्यकर्म करने वाला, तृतीय में
रोगी और चतुर्थ में जन्म हो तो अभागा होता है। मघा के प्रथम चरण में जन्म हो तो पुत्र
से रहित, द्वितीय में पुत्र से युत, तृतीय में रोगी और चतुर्थ चरण में जन्म हो तो पण्डित
होता है। पूर्वफाल्गुनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो समर्थ, द्वितीय में धार्मिक,
तृतीय में राजा या राजतुल्य और चतुर्थ चरण में जन्म हो तो अल्पायु होता है। उत्तर-
फाल्गुनी के प्रथम चरण में जन्म हो तो पण्डित, द्वितीय में राजा, तृतीय में विजयी और
चतुर्थ चरण में जन्म हो तो धर्मात्मा होता है। हस्त नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो
शूर, द्वितीय में वक्ता, तृतीय में रोगी और चतुर्थ चरण में जन्म हो तो श्रीमान् होता है।
चित्रा के प्रथम चरण में जन्म हो तो चोर, द्वितीय में चित्र बनाने वाला, तृतीय में परस्त्री
के साथ गमन करने वाला और चतुर्थ में जन्म हो तो पाँव में पीड़ा से युक्त होता है।
स्वाती नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो चोर, द्वितीय में अल्पायु, तृतीय में धर्मात्मा
और चतुर्थ में जन्म हो तो राजा या राजतुल्य होता है। विशाखा नक्षत्र के प्रथम चरण में
जन्म हो तो नीति को जानने वाला, द्वितीय में शास्त्र को जानने वाला, तृतीय में बोलने
वाला और चतुर्थ में जन्म हो तो दीर्घायु होता है। मूल नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो
तो भोगी, द्वितीय में त्याग करने वाला, तृतीय में अच्छे मित्र वाला हौर चतुर्थ जन्म हो
तो राजा या राजतुल्य होता है। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो श्रेष्ठ
विचार वाला, द्वितीय में राजा या राजतुल्य, तृतीय में सबों का प्रिय और चतुर्थ चरण में
जन्म हो तो बाजा बजाने वाला होता है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो
राजा या राजतुल्य, द्वितीय में खराब मित्र वाला, तृतीय में अभिमानी और चतुर्थ में जन्म
हो तो धर्मात्मा होता है। श्रवण नक्षत्र के सब चरणों का फल शुभ है। पूर्वभाद्रपदा
नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो शूर, द्वितीय में चोर, तृतीय में सन्मति वाला और
चतुर्थ में जन्म हो तो भोगी होता है। उत्तरभाद्रपदा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो
राजा या राजतुल्य, द्वितीय में चोर, तृतीय में पुत्रवान एवं चतुर्थ में जन्म हो तो दुःख से
रहित होता है। रेवती नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हो तो ज्ञानी, द्वितीय में चोर, तृतीय
में विजयी और चतुर्थ में जन्म हो तो युद्धस्थान में कष्ट पाने वाला होता है। जिस ग्रन्थ

नक्षत्रजातकाध्यायः ५६३
से उद्धृत कर यहाँ मैंने जो उपर्युक्त प्रमाण लिखा है उसमें धनिष्ठा, अनुराधा, ज्येष्ठा और
शतभिषा-इन चार नक्षत्रों का फल नहीं कहा गया है; अतः मैंने भी उनका फल नहीं
लिखा है।।१४।।
इति 'विमला' हिन्दीटीकायां नक्षत्रजातकाध्याय एकोत्तरशततमः ॥१०१॥
वक्ता सम्भाषणदक्षः। सुखी सुखभाक्। प्रजावान् पुत्रपौत्रदौहित्रसंयुक्तः। जितशत्रुर्जिताः
शत्रवो रिपवो येन। धार्मिका धर्मरतः। एवंविधो द्वितीयासूत्तरासु जातो भवति। तथा च
पराशरः—
नृपसत्कृता बहुसुतः प्रदानशीला जले सततभीरुः।
ईज्याध्ययनरतिः स्यादाहिर्बुध्न्ये नरो जातः।।
सम्पूर्णाङ्ग इति सम्पूर्णाङ्गोऽविकलावयवः। सुभगः सौभाग्ययुतः। शूरः सङ्ग्रामप्रियः।
शुचिः शौचयुक्तः परस्वाद्यलुब्धः। अर्थवान् धनोपेतः। एवंविधः पौष्णे रेवत्यां जातो
भवति। तथा च पराशरः—
सर्वार्थभुक् प्रदाता प्रवासनिरतो विशुद्धकुलशीलः।
गोमाननल्पपुत्रः पौष्णे विद्वान् नरो जातः।। इति।।१४।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ नक्षत्रजातकं
नामैकशततमोऽध्यायः ॥१०१॥
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अथ राशिविभागाध्यायः
अथ राशिविभागो व्याख्यायते। तत्रादावेव मेषवृषयोर्नक्षत्रजातप्रविभागमाह--
अश्विन्योऽथ भरण्यो बहुलापादश्च कीर्त्यते मेषः।
वृषभो बहुलाशेषं रोहिण्योऽर्धं च मृगशिरसः ॥१॥
अश्विनी का चार पाद, भरणी का चार पाद और कृत्तिका का आद्य पाद मेष राशि
का तथा कृत्तिका का शेष तीन पाद, रोहिणी का चार पाद और मृगशिरा का प्रथम दो
पाद वृष राशि होता है॥१॥
अश्विन्यः सकलाः पादचतुष्टयम्। अथशब्दश्चार्थे। भरण्यः सकला एव पादचतुष्टयम्।
बहुला कृत्तिका। तस्याश्चतुर्थमंशम्। एष मेष इति मेषराशिः कीर्त्यते कथ्यते। अत्र नक्षत्रं
चतुष्पादम्। पादमृक्षद्वयं राशिर्भवति। एवं नक्षत्रे नवपादाः प्रत्येकस्य राशेः प्रमाणम्।
उक्तं च—
मेषाश्विप्रथमा नवर्क्षचरणाश्चक्रस्थिता राशयः। इति।
बहुलाशेषं कृत्तिकापादत्रयम्। रोहिणी सकला। अर्धं च मृगशिरसो मृगशिरसः पादद्वयं
वृषभो राशिः कीर्त्यते॥१॥
अथ मिथुनकर्कटयोर्नक्षत्रविभागमाह—
मृगशिरसोऽर्धं रौद्रं पुनर्वसोरंशकत्रयं मिथुनः।
पादश्च पुनर्वसुतस्तिष्यः श्लेषा च कर्कटकः ॥२॥
मृगशिरा का शेष दो पाद, आर्द्रा का चार पाद और पुनर्वसु का प्रथम तीन पाद
मिथुन राशि का तथा पुनर्वसु का शेष एक पाद, पुष्य का चार पाद और अश्लेषा का
चार पाद कर्कट राशि का होता है॥२॥
मृगशिरसोऽर्धं पादद्वयम्। रौद्रमार्द्रा सकला। पुनर्वसोरंशकत्रयम्। एष मिथुनराशिः।
पादश्चेति। पुनर्वसुतः पुनर्वसोः पादः तिष्यः सकलः। श्लेषा च सकला। एष कर्कट-
राशिः॥२॥
सिंहकन्ययोर्नक्षत्रविभागमाह—
सिंहोऽथ मघा पूर्वा च फल्गुनीपाद उत्तरायाश्च।
तत्परिशेषं हस्तश्चित्राद्यर्धं च कन्याख्यः ॥३॥
मघा का चार पाद, पूर्वफाल्गुनी का चार पाद और उत्तरफाल्गुनी का प्रथम एक
पाद सिंह राशि का तथा उत्तरफाल्गुनी का शेष तीन पाद, हस्त का चार पाद और चित्रा
का आद्य दो पाद कन्या राशि का होता है॥३॥
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राशिविभागाध्यायः ५६५
मघा सकला। पूर्वा च फल्गुनी सकला। उत्तरायाश्च पादः। इति सिंहः। तत्परिशेष-
मिति। तदित्युत्तरायाः परामर्शः। तत्परिशेषमुत्तरापादत्रयम्। हस्तः सकलः। चित्राया अर्धं
प्रथमं पादद्वयम्। इति कन्याराशिः।।३।।
अथ तुलावृश्चिकयोर्नक्षत्रविभागमाह—
तौलिनी चित्रान्त्यर्धं स्वातिः पादत्रयं विशाखायाः।
अलिनी विशाखापादस्तथानुराधान्विता ज्येष्ठा।।४।।
चित्रा का शेष दो पाद, स्वाति का चार पाद और विशाखा का आद्य तीन पाद तुला
राशि का तथा विशाखा का शेष एक पाद, अनुराधा का चार पाद और ज्येष्ठा का चार
पाद वृश्चिक राशि का होता है।।४।।
चित्राया अन्त्यमर्धं पश्चिमं पादद्वयम्। स्वातिः सकला। विशाखायाः पादत्रयम्। एतत्तौ-
लिनि तुले स्थितम्। विशाखायाः पश्चिमः पादः। अनुराधा सकला। तथा तयान्विता संयुक्ता
ज्येष्ठा सकलैव। एतदलिनि वृश्चिके।।४।।
अथ धन्विमकरयोर्नक्षत्रविभागमाह—
मूलमषाढा पूर्वा प्रथमश्चाप्युत्तरांशको धन्वी।
मकरस्तत्परिशेषं श्रवणः पूर्वं धनिष्ठार्धम् ।।५।।
मूल का चार पाद, पूर्वाषाढ़ा का चार पाद और उत्तराषाढ़ा का प्रथम एक पाद धनु
राशि का तथा उत्तराषाढ़ा का शेष तीन पाद, श्रवण का चार पाद और धनिष्ठा का प्रथम
दो पाद मकर राशि का होता है।।५।।
मूलं सकलम्। आषाढा पूर्वा सकलैव। उत्तरांशकः प्रथम आद्यपादः। एष धन्वी।
मकरस्तत्परिशेषमिति। तदित्युत्तरायाः परामर्शः। तत्परिशेषमुत्तरापादत्रयमन्त्यम्। श्रवणः
सकलः। पूर्वं धनिष्ठार्धम्। धनिष्ठाया आद्यं पादद्वयम्। एष मकरः।।५।।
अथ कुम्भमीनयोर्नक्षत्रविभागमाह—
कुम्भोऽन्त्यधनिष्ठार्धं शतभिषगंशत्रयं च पूर्व्याः।
भद्रपदायाः शेषं तथोत्तरा रेवती च झषः।।६।।
धनिष्ठा का शेष दो पाद, शतभिषा का चार पाद और पूर्वाभाद्रपदा का प्रथम तीन
पाद कुम्भ राशि का तथा पूर्वाभाद्रपदा का शेष एक पाद, उत्तरभाद्रपदा का चार पाद
और रेवती का चार पाद मीन राशि का होता है।।६।।
धनिष्ठायामन्त्यमर्धं पश्चिमं पादद्वयम्। शतभिषक् सकला। पूर्व्या अंशत्रयमाद्यं
पादत्रयम्। एष कुम्भः। भद्रपदायाः शेषमिति। भद्रपदायाः पूर्वभद्रपदायाः शेषमेकमंशम्।
तथोत्तरा सकला। रेवती च सकलैव। एष झषो मीन इति।।६।।
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५६६ बृहत्संहिता
अथैतदेव संक्षेपेणाह—
अश्विनीपित्र्यमूलाद्या मेषसिंहहयादयः ।
विषमर्क्षान्निवर्तन्ते पादवृद्ध्या यथोत्तरम् ॥७॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां राशिविभागो
नाम द्विशततमोऽध्यायः ॥१०२॥
अश्विनी, मघा और मूल नक्षत्र के आदि से क्रमशः मेष, सिंह और धनु राशि
प्रारम्भ होती है तथा विषम नक्षत्र ( कृत्तिका, मृगशिर, पुनर्वसु और आश्लेषा ) से
एक-एक पाद वृद्धि करके समाप्त होती है ।।७।।
इति 'विमला'हिन्दीटीकायां राशिविभागाध्यायो द्व्युत्तरशततमः ॥१०२॥
मेषादयश्चत्वारः। सिंहादयश्चत्वारः। हयादयचत्वार एव। अश्विन्यादौ मेषस्यादि।
पित्र्यादौ सिंहस्यादि। मूलादौ हयादि धनुषः प्रारम्भः। ते च यथोत्तरं पादवृद्ध्या स्थिताः।
विषमर्क्षात् तृतीयपञ्चमसप्तमनवमनक्षत्राद्यथोत्तरं पादवर्धनेन स्थिताः। निवर्तन्ते निवृत्तिं
यान्ति। यथा कृत्तिका गणनया अश्विन्यादितृतीयनक्षत्रम्। तत्प्रथमपादे मेषस्य निवृत्तिः
समाप्तिः। मृगशिरो गणनया पञ्चमः। तत्पादद्वये वृषस्य निवृत्तिः। पुनर्वसुर्गणनया सप्तमः।
तत्पादत्रये मिथुनस्य निवृत्तिः। श्लेषा गणनया नवमः। तत्पादचतुष्टये कर्कटस्य निवृत्तिः।
एवं सिंहधनुषोर्योज्यमिति ।।७।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ राशिविभागो
नाम द्विशततमोऽध्यायः ॥१०२॥
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अथ विवाहपटलाध्यायः
अथ प्रसङ्गागतं विन्ध्यवासिकृतं विवाहपटलं व्याख्यायते। तत्रादावेव लग्नस्थितानां
सर्वग्रहाणां फलान्याह—
मूर्तौ करोति दिनकृद्विधवां कुजश्च
राहुर्विपन्नतनयां रविजो दरिद्राम्।
शुक्रः शशाङ्कतनयश्च गुरुश्च साध्वी-
मायुःक्षयं प्रकुरुतेऽथ विभावरीशः ॥१॥
यदि विवाहकालिक लग्न में सूर्य या मंगल बैठा हो तो विधवा, राहु हो तो नष्ट
सन्तान वाली, शनि हो तो दरिद्र, शुक्र, बुध या गुरु बैठा हो तो साध्वी और चन्द्र हो तो
नष्ट आयु वाली स्त्री होती है॥१॥
दिनकृदादित्यो मूर्तौ वैवाहिके लग्ने स्थितो विधवा मृतभर्तृकां कन्यकां करोति।
कुजाऽङ्गारकश्चशब्दाद्विधवामेव करोति। राहुः सैंहिकेयो विपन्नतनयां मृतपुत्रां करोति।
रविजो दरिद्रां निर्धनाम्। शुक्नो भार्गवः। शशाङ्कतनयो बुधः। गुरुश्च जीवः। एते साध्वीं
सच्छीलां कुर्वन्ति। विभावरी रात्रिः। तस्या ईशश्चन्द्रः। आयुषो जीवितस्य क्षयं विनाशं
प्रकुरुते॥१॥
अथ द्वितीयस्थानस्थितानां सर्वग्रहाणां फलान्याह—
कुर्वन्ति भास्करशनैश्चरराहुभौमा
दारिद्र्यदुःखमतुलं नियतं द्वितीये।
वित्तेश्वरीमविधवां गुरुशुक्रसौम्या
नारीं प्रभूततनयां कुरुते शशाङ्कः ॥२॥
यदि विवाहकाल में लग्न से द्वितीय भाव में सूर्य, शनि, राहु या मंगल बैठा हो तो
सदा अतिशय दारिद्र्य-दुःख से युत; गुरु, शुक्र या बुध हो तो धनवती, वैधव्यरहित
तथा चन्द्र हो तो अधिक सन्तान वाली स्त्री होती है॥२॥
द्वितीये लग्नाद् द्वितीयस्थाने। भास्कर आदित्यः। शनैश्चरः सौरिः। राहुः सैंहिकेयः।
भौमोऽङ्गारकः। अतुलमक्षमं दारिद्र्यं दुःखं विगतधनेन क्लेशं नियतं सर्वकालं कुर्वन्ति।
गुरुर्बृहस्पतिः। शुक्रः। सौम्यो बुधः। वित्तेश्वरीं धनस्य स्वामिनीम् अविधवां जीवद्भर्तृकां
च कुर्वन्ति। शशाङ्कश्चन्द्रः। नारीं कन्यां प्रभूततनयां बहुप्रजां कुरुते॥२॥
अथ तृतीयस्थानस्थितानां सर्वग्रहाणां फलान्याह—
सूर्येन्दुभौमगुरुशुक्रबुधास्तृतीये
कुर्युः सदा बहुसुतां धनभागिनीं च।
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५६८ बृहत्संहिता
व्यक्तां दिवाकरसुतः सुभगां करोति
मृत्युं ददाति नियमात् खलु सैंहिकेयः ॥३॥
यदि विवाहकाल में लग्न से तृतीय भाव में सूर्य, चन्द्र, मंगल, गुरु, शुक्र या बुध
हो तो अधिक सन्तान वाली और धन से युत, शनि हो तो कीर्ति से युत और सुभगा तथा
राहु हो तो निश्चय ही मृत्यु को प्राप्त करने वाली स्त्री होती है॥३॥
तृतीये तृतीयस्थाने स्थिताः। सूर्य आदित्यः। इन्दुश्चन्द्रः। भौमोऽङ्गारकः। गुरुर्जीवः।
शुक्रः। बुधः। एते सदा सर्वदा बहुसुतां प्रभूतपुत्राम्, धनभागिनीं च वित्तान्वितां कन्यकां
कुर्युः। दिवाकरसुतः सौरिः। व्यक्तां कीर्तियुक्ताम्। सुभगां भर्तृवल्लभां च करोति। सैंहिकेयो
राहुः, नियमान्निश्चयान्मृत्युं मरणं ददाति। खलुशब्दश्वार्थे वाक्यालङ्कारे वा॥३॥
अथ चतुर्थस्थानस्थितानां सर्वग्रहाणां फलान्याह—
स्वल्पं पयः स्रवति सूर्यसुते चतुर्थे
दौर्भाग्यमुष्णकिरणः कुरुते शशी च।
राहुः सपत्नमपि च क्षितिजोऽल्पवित्तं
दद्याद्भृगुः सुरगुरुश्च बुधश्च सौख्यम् ॥४॥
जिसके विवाहकाल में लग्न से चतुर्थ स्थान में शनि हो, उसके स्तनों से बहुत
थोड़ा दूध निकलता है। सूर्य या चन्द्र हो तो भाग्यरहित, राहु हो तो सौत ( सौतिन )
वाली, मंगल हो तो अल्प धन वाली तथा शुक्र, बृहस्पति या बुध हो तो सुख भोगने
वाली स्त्री होती है॥४॥
चतुर्थे चतुर्थस्थाने। सूर्यसुते शनैश्चरे। स्वल्पं स्तोकम्। पयः क्षीरं स्रवति। उष्णकिरणः
सूर्यो दौर्भाग्यं दुर्भगत्वं कुरुते। शशी च चन्द्रो दौर्भाग्यमेव कुरुते। राहुः सपत्नं शत्रुं
करोति। सापत्न्यं करोतीत्यर्थः। क्षितिजोऽङ्गारकोऽल्पवित्तं स्वल्पधनं करोति। भृगुः
शुक्रः। सुरगुरुर्जीवः। बुधश्च। सौख्यं दद्यात् ॥४॥
अथ पञ्चमस्थानस्थितानां सर्वग्रहाणां फलान्याह—
नष्टात्मजां रविकुजौ खलु पञ्चमस्थे
चन्द्रात्मजो बहुसुतां गुरुभार्गवौ च।
राहुर्ददाति मरणं शनिरुग्ररोगं
कन्याविनाशमचिरात् कुरुते शशाङ्कः ॥५॥
जिसके विवाहकाल में लग्न से पञ्चम स्थान में रवि या मंगल हो तो उसकी
सन्तान मर जाती है। बुध, गुरु और शुक्र हो तो बहुत सन्तान, राहु हो तो मृत्यु, शनि हो
तो कठोर रोग तथा चन्द्र हो तो शीघ्र ही कन्या का नाश करता है॥५॥
रविरादित्यः। कुजोऽङ्गारकः। एतौ पञ्चमस्थौ लग्नात् पञ्चमस्थाने स्थितौ नष्टात्मजां
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विवाहपटलाध्यायः ५६९
मृतापत्यां कन्यकां कुरुतः। खलुशब्द आगमद्योतनार्थः। चन्द्रात्मजो बुधो बहुसुतां प्रभूतपुत्रां
करोति। गुरुर्बृहस्पतिः। भार्गवः शुक्रः। एतावपि चशब्दाद् बहुसुतामेव कुरुतः। राहुर्मरणं
ददाति। शनिः सौरिः। उग्रं तीव्रं रोगं गदं ददाति। शशाङ्कश्चन्द्रोऽचिराच्छीघ्रमेव कन्याया
विनाशं कुरुते करोति॥५॥
अथ षष्ठस्थितानां सर्वग्रहाणां फलान्याह—
षष्ठाश्रिताः शनिदिवाकरराहुजीवाः
कुर्युः कुजश्च सुभगां श्वशुरेषु भक्ताम्।
चन्द्रः करोति विधवामुशना दरिद्रा-
मृद्धां शशाङ्कतनयः कलहप्रियां च॥१६॥
यदि विवाहकाल में लग्न से षष्ठ भाव में शनि, सूर्य, राहु, गुरु या मंगल हो श्वशुर
की सेवा करने वाली, चन्द्र हो तो विधवा, शुक्र हो तो निर्धन तथा बुध हो तो धन से
युत और कलहकारिणी स्त्री होती है।।१६।।
शनिः सौरिः। दिवाकर आदित्यः। राहुः सैहिकेयः। जीवो बृहस्पतिः। एते षष्ठाश्रिताः
षष्ठस्थानस्थाः। कुजश्चाङ्गारकः षष्ठस्थानस्थ एव। सुभगां भर्तृवल्लभां श्वशुरेषु च भक्तां
कन्यकां कुर्युः। चन्द्रः शशी विधवा मृतभर्तृकां करोति। उशनाः शुक्नो दरिद्रां निर्धनां
करोति। शशाङ्कतनयो बुधः। ऋद्धां सधनां कलहप्रियां च करोति।।१६।।
अथ सप्तमस्थितानां सर्वग्रहाणां फलान्याह—
सौरारजीवबुधराहुरवीन्दुशुक्राः
कुर्युः प्रसह्य खलु सप्तमराशिसंस्थाः।
वैधव्यबन्धनवधक्षयमर्थनाश-
व्याधिप्रवासमरणानि यथाक्रमेण ॥१७॥
यदि विवाहकाल में लग्न से सप्तम भाव में शनि, मंगल, गुरु, बुध, राहु, सूर्य,
चन्द्र या शुक्र हो तो क्रम से विधवा, बन्धन, विनाश, धननाश, व्याधि, प्रवास और
मृत्यु करता है। जैसे कि सप्तम में शनि हो तो विधवा, मंगल हो तो बन्धन इत्यादि
करता है।।१७।।
सौरादयः सप्तमस्थानस्था यथाक्रमं प्रसह्यात्यर्थं वैधव्यादीन् दोषान् कुर्वन्ति।
तद्यथा—शनैश्चरः सप्तमे स्थितो वैधव्यं करोति। आरोऽङ्गारको बन्धनम्। जीवो बृहस्पतिर्वधं
मरणम्। बुधः क्षयं विनाशं करोति। राहुरर्थनाशं वित्तक्षयम्। रविरादित्यो व्याधिम्।
इन्दुश्चन्द्रः प्रवासं देशान्तरगमनम्। शुक्रो मरणम्। एवं सप्तमस्था यथाक्रमेण परिपाट्या
कुर्युः। खलुशब्दोऽत्रागमद्योतनार्थः ॥१७॥
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५७० बृहत्संहिता
अथाष्टमस्थितानां सर्वग्रहाणां फलान्याह—
स्थानेऽष्टमे गुरुबुधौ नियतं वियोगं
मृत्युं शशी भृगुसुतश्च तथैव राहुः ।
सूर्यः करोत्यविधवां सरुजां महीजः
सूर्यात्मजो धनवतीं पतिवल्लभां च ॥८॥
यदि विवाहकाल में लग्न से अष्टम भाव में गुरु या बुध हो तो स्त्री का पति से
वियोग, चन्द्र, शुक्र या राहु हो तो मृत्यु, सूर्य हो तो सौभाग्यवती, मंगल हो तो रुग्णा
तथा शनि हो तो धन से युत और पतिवल्लभा कराता है॥८॥
गुरुर्जीवः। बुधश्च। एतौ लग्नादष्टमस्थानस्थितौ नियतं सर्वकालं निश्चितं वा वियोगं
जायापत्योः कुरुतः। शशी चन्द्रो भृगुसुतः शुक्रश्च मृत्युं मरणं करोति। तथैव तेनैव प्रकारेण
राहुर्मृत्युं करोति। सूर्य आदित्योऽविधवां जीवद्भर्तृकां करोति। महीजोऽङ्गारकः सरुजां
पीडितदेहां करोति। केचित् सुभगां भर्तृवल्लभामिति पठन्ति। सूर्यात्मजः सौरिः। धनवतीं
वित्तान्विताम्। पतिवल्लभां भर्तृप्रियां च करोति॥८॥
अथ नवमस्थानस्थितानां सर्वग्रहाणां फलान्याह—
धर्मे स्थिता भृगुदिवाकरभूमिपुत्रा
जीवश्च धर्मनिरतां शशिजस्त्वरोगाम् ।
राहुश्च सूर्यतनयश्च करोति बन्ध्यां
कन्याप्रसूतिमटनां कुरुते शशाङ्कः ॥९॥
यदि विवाहकाल में लग्न से नवम स्थान में शुक्र, सूर्य, मंगल या गुरु हो तो स्त्री
को धर्म करने वाली, बुध हो तो नीरोग, राहु और शनि हो तो वन्ध्या तथा चन्द्र हो तो
कन्या उत्पन्न करने वाली और घूमने वाली बनाता है॥९॥
भृगुः शुक्रः। दिवाकर आदित्यः। भूमिपुत्रोऽङ्गारकः। जीवो बृहस्पतिश्च। एते सर्व
एव धर्मे नवमस्थाने स्थिता धर्मनिरतां कन्यकां कुर्युः। शशिजो बुधः। अरोगां कल्याणीं
करोति। राहुः सैंहिकेयः। सूर्यतनयः सौरिः। एतौ बन्ध्यामपुत्रां कुरुतः। शशाङ्कश्चन्द्रः कन्या-
प्रसूतिं कन्याजनयित्रीम्। अटनां भ्रमणशीलां च करोति॥९॥
अथ दशमस्थितानां सर्वग्रहाणां फलान्याह—
राहुर्नभःस्थलगतो विधवां करोति
पापे रतां दिनकरश्च शनैश्चरश्च।
मृत्युं कुजोऽर्थरहितां कुलटां च चन्द्रः
शेषा ग्रहा धनवतीं सुभगां च कुर्युः ॥१०॥
यदि वैवाहिक लग्न से दशम भाव में राहु बैठा हो तो स्त्री को विधवा, सूर्य या
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विवाहपटलाध्यायः ५७१
शनि हो तो पाप करने वाली, मंगल हो तो मृत्यु, चन्द्र हो तो निर्धन और कुलटा तथा
शेष ग्रह ( बुध, गुरु और शुक्र ) हो तो स्त्री को धनवती और सुभगा करता है।।१०।।
नभःस्थलं दशमस्थानम्। नभःस्थलगतो राहुर्विधवां मृतभर्तृकां करोति। दिनकर
आदित्यः पापे रतां पापकर्मणि सक्तां करोति। शनैश्चरः पापरतामेव। कुजोऽङ्गारको मृत्युं
मरणं करोति। चन्द्रोऽर्थरहितां दरिद्रां कुलटां बन्धकीं च करोति। शेषा बुधबृहस्पतिशुक्रा
धनवतीं वित्तान्वितां सुभगां भर्तृवल्लभां च कुर्युः।।१०।।
अथैकादशस्थितानां सर्वग्रहाणां फलान्याह—
आये रविर्बहुसुतां सधनां शशाङ्कः
पुत्रान्वितां क्षितिसुतो रविजो धनाढ्याम्।
आयुष्मतीं सुरगुरुः शशिजः समृद्धां
राहुः करोत्यविधवां भृगुरर्थयुक्ताम् ।।११।।
यदि वैवाहिक लग्न से एकादश भाव में रवि हो तो बहुत पुत्र वाली, चन्द्र हो तो
धन से युत, मंगल हो तो पुत्र से युत, शनि हो तो धनाढ्य, बृहस्पति हो तो बहुत दिन
तक जीवित रहने वाली, बुध हो तो धन से युत, राहु हो तो पतियुक्त और शुक्र हो तो
धन से युत स्त्री को करता है।।११।।
आये एकादशस्थाने रविरादित्यो बहुसुतां प्रभूतपुत्रां कन्यकां करोति। शशाङ्कश्चन्द्रः
सधनां वित्तान्विताम्। क्षितिसुतोऽङ्गारकः पुत्रान्वितां सुतसंयुक्ताम्। रविजः सौरो धनाढ्या-
मीश्वरीम्। सुरगुरुर्जीव आयुष्मतीं चिरजीविनीम्। शशिजो बुधः समृद्धां सधनाम्। राहुरविधवां
जीवद्भर्तृकाम्। भृगुः शुक्लोऽर्थयुक्तां सधनां करोति।।११।।
अथ द्वादशस्थितानां सर्वग्रहाणां फलान्याह—
अन्ते गुरुर्धनवतीं दिनकृद्दरिद्रां
चन्द्रो धनव्ययकरीं कुलटां च राहुः ।
साध्वीं भृगुः शशिसुतो बहुपुत्रपौत्रां
पानप्रसक्तहृदयां रविजः कुजश्च ।।१२।।
यदि वैवाहिक लग्न से द्वादश भाव में गुरु हो तो धनवती, सूर्य हो तो निर्धन, चन्द्र
हो तो बहुत खर्च करने वाली, राहु हो तो कुलटा, शुक्र हो तो साध्वी, बुध हो तो बहुत
पुत्र वाली और शनि या मंगल हो तो मद्य आदि पान करने वाली स्त्री को करता है।
अन्ते द्वादशस्थाने गुरुर्जीवो धनवतीं सधनां कन्यकां करोति। दिनकृदादित्यो दरिद्रां
निर्धनाम्। चन्द्रः शशी धनव्ययकरीमर्थक्षयकरीम्। राहुः कुलटां बन्धकीम्। भृगुः शुक्रः
साध्वीं सच्छीलाम्। शशिसुतो बुधो बहुपुत्रपौत्रां प्रभूतसुतां प्रभूतपौत्राम्। रविजः शनैश्चरः
पानप्रसक्तहृदयां पाने प्रसक्तमनुरतं हृदयं यस्याः। कुजोऽङ्गारकश्चशब्दात् पानप्रसक्तहृदया-
मेव।।१२।।
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५७२ बृहत्संहिता
अथ गोधूलिप्रशंसार्थमाह—
गोपैर्यष्ट्याहतानां खुरपुटदलिता या तु धूलिर्दिनान्ते
सोद्वाहे सुन्दरीणां विपुलधनसुतारोग्यसौभाग्यकर्त्री ।
तस्मिन् काले न चर्क्षं न च तिथिकरणं नैव लग्नं न योगः
ख्यातः पुंसां सुखार्थं शमयति दुरितान्युत्थितं गोरजस्तु ॥१३॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां विन्ध्यवासिकृतं
विवाहपटलं नाम त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१०३॥
दिनान्त ( सायं सन्ध्या ) में ग्वालों के द्वारा यष्टि से ताड़ित गायों के खुरों से खण्डित
धूलि सुन्दरियों ( स्त्रियों ) के विवाह में अत्यधिक धन, पुत्र, आरोग्य और सौभाग्य को
करने वाली होती है। उस गोधूलि समय में नक्षत्र, तिथि, करण, लग्न और योग का
कुछ भी विचार नहीं करना चाहिये। पुरुषों के सुख के लिये वह काल कहा गया है तथा
उत्पन्न यह गायों की धूलि समस्त दुष्कृतों का नाश करने वाली होती है।।१३।।
इति ‘विमला'हिन्दीटीकायां प्रसङ्गागतविन्ध्यवासिकृत-
विवाहपटलाध्यायस्त्र्यधिकशततमः ॥१०३॥
अथ गोधूलिप्रशंसावशाद् गोपशब्दो व्यवह्रियते। गोपैर्गोपालकैर्यष्ट्या लगुडेनाहतानां
ताडितानां गवां खुरपुटैः पादाग्रैर्य्या दलिता खण्डिता धूली रजो दिनान्ते सूर्यास्तमयकाले
सा उद्वाहे विवाहे सुन्दरीणां विपुलं विस्तीर्णं धनं वित्तं सुतान् पुत्रानारोग्यमरोगत्वं सौभाग्यं
भर्तृवाल्लभ्यं करोति। तस्मिन् सन्ध्यासमये न चर्क्षं नक्षत्रं न च तिथिर्नन्दादिकाः, न करणं
ववादि, न च योग आनन्दादिक उपयुज्यते। सुखार्थं पुंसां पुरुषाणां स कालः ख्यात उक्तः।
उत्थितमुद्भूतं गोरजो गोधूलिर्दुरितानि दुष्कृतानि शमयत्युपशान्तिं नयति। तेन हेतुना न
किञ्चित् तत्रोपयुज्यत इति॥१३॥
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ विन्ध्यवासिकृतं
विवाहपटलं नाम त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१०३॥
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रत्नपरीक्षा, दन्तकाष्ठ, शकुन विचार एवं बृहत्संहिता उपसंहार

अथ ग्रहगोचराध्यायः
अथ ग्रहगोचराध्यायो व्याख्यायते। तत्राचार्यः शिष्यजनवत्सलतया लाघवेन छन्दसां
लक्षणमन्तर्भूतं करोति। तेषां च प्रस्तारविधौ गुरुलघुसंज्ञाविज्ञानेन विना न किञ्चिद् ज्ञायते।
आचार्येण ग्रन्थविस्तरभयात् प्रसिद्धत्वाच्च लक्षणं नोक्तम्। तदस्माभिर्गुरुलघूनां लक्षणं
प्रदर्श्यते। तथा—
मस्त्रिगुरुस्त्रिलघुश्च नकारो भादिगुरुश्च तथादिलघुर्यः।
जो गुरुमध्यगतो रलमध्यः सोऽन्तगुरुः कथितोऽन्तलघुस्तः ॥
जिसमें तीनों गुरु हों वह मगण, जिसमें तीनों लघु हों वह नगण, जिसमें आदि गुरु
और दो लघु हों वह भगण, जिसमें आदि लघु और दो गुरु हो वह यगण, जिसमें मध्य
गुरु और आदि तथा अन्त में लघु हो वह जगण, जिसमें मध्य में लघु और आदि तथा
अन्त्य में गुरु हो वह रगण, जिसमें अन्त्य में गुरु और आदि तथा मध्य में लघु हो वह
सगण एवं जिसमें अन्त में लघु और आदि तथा मध्य में गुरु हो वह तगण होता है।
गुरु एवं लघु लिखने की विधि—वक्र रेखा गुरु का चिह्न और सीधी रेखा लघु
का चिह्न है तथा एक गुरु से 'ग' संज्ञा और एक लघु से 'ल' संज्ञा होती है।
अत्र व्याख्या—मस्त्रिगुरुः, यत्र यत्र मकारग्रहणं भविष्यति तत्र तत्र त्रिगुरुः प्रस्तारः।
नकारस्त्रिलघुः। भकार आदिगुरुः। आदौ गुरुरन्ते लघुद्वयम्। तथा यकार आदिलघुः। आदौ
लघुरन्ते गुरुद्वयम्। जो जकारो गुरुमध्यगतः, मध्यगुरुराद्यन्तयोर्लघुद्वयम्। रलमध्यः, रेफो
मध्यलघुराद्यन्तयोर्गुरुद्वयम्। सोन्तऽगुरुः, सकार आदौ लघुद्वयमन्ते गुरुः। तकारोऽन्त-
लघुः, आदौ तस्य गुरुद्वयमन्ते लघुरिति।
न्यासः—म SSS, न।।।, भ SII, य ISS, ज ISI, र SIS, स IIS, त SSI
अत्राप्यपरेयं परिभाषा। अ, इ, उ, ऋ, ऌ सामान्यव्यञ्जनानि कादीनि लघवस्ते
चर्जवः प्रस्तार्याः। आ ई ऊ ऋृ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः। एते गुरवः कुटिलाश्च प्रस्तार्याः।
पादान्ते स्थितो लघुरपि गुरुतां याति। वक्ष्यत्याचार्यः—
प्रकृत्यापि लघुर्यश्च वृत्तबाह्ये व्यवस्थितः।
.......................................स याति गुरुतामिति।।
यस्य वर्णस्य संयोगाक्षरः परः स गुरुर्भवति। प्रस्तारे गुरुलघुर्वाङ्गुष्ठपर्वप्रमाणः
कार्यः। तत्रादावेव प्रयोजनप्रदर्शनार्थमाह—
प्रायेण सूत्रेण विनाकृतानि प्रकाशरन्ध्राणि चिरन्तनानि।
रत्नानि शास्त्राणि च योजितानि नवैर्गुणैर्भूषयितुं क्षमाणि ॥१॥
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५७४ बृहत्संहिता
जिस प्रकार धागों से वर्जित, प्रकटित छिद्र वाले पुरातन रत्न नवीन धागों से
योजित करने पर बहुधा भूषित करने के लिये समर्थ होते हैं, उसी प्रकार सूत्र
( अक्षररचनारूप वृत्तबन्ध ) से वर्जित, प्रकटित दोष वाले, पुरातन, नवीन गुणों ( सुन्दर
वस्तु द्रव्य, वृत्तबन्धों ) से योजित शास्त्र भी भूषित करने के लिये समर्थ होते हैं ।। १ ।।
प्रायेण बाहुल्येन रत्नानि मणिविशेषाणि सूत्रेण विनाकृतानि वर्जितानि प्रकाशरन्ध्राणि
प्रकटच्छिद्राणि चिरन्तनानि पुरातनानि च यानि तानि नवैर्गुणैरभिनवैः सूत्रैर्योजितानि प्रोतानि
विभूषयितुमलङ्कर्तुं क्षमाणि योग्यानि भवन्ति। एवं शास्त्राणि सूत्रेण अक्षररचनावृत्तबन्धेन
विनाकृतानि वर्जितानि प्रकाशरन्ध्राणि प्रकटदोषाणि चिरन्तनानि पुरातनानि चिरन्तनत्वाद्
जातापशब्दानि। अपशब्दत्वाच्च प्रकाशरन्ध्राणि तथाभूतानि च तानि नवैर्गुणैरभिनवैः सद्ग्र-
स्तुभिर्द्रव्यवृत्तबन्धैर्योजितानि वचनस्थापितानि भूषयितुं क्षमाणि योग्यानि भवन्ति, नान्यथे-
त्यर्थः ।। १ ।।
अधुना गोचरस्य कारणं मुखचपलार्यायाऽऽह—
प्रायेण गोचरो व्यवहार्योऽतस्तत्फलानि वक्ष्यामि ।
नानावृत्तैरार्या मुखचपलत्वं क्षमध्वं नः ॥२॥
बहुधा इस संसार में ग्रहगोचर का व्यवहार किया जाता है। इसलिये अनेक छन्दों
के द्वारा उसके फलों को कहता हूँ। आर्यगण हमारे मुख-चापल्य को क्षमा करें। यह
आर्यावृत्तों के अन्तर्गत मुखचपला वृत्त है।।२।।
प्रायेण बाहुल्येन गोचरो ग्रहगोचरो व्यवहार्यो व्यवहरणाय शीलमस्य व्यवहार्यः।
यः कश्चिद् लोके ग्रहसंस्थां पृच्छति। अतोऽस्माद्धेतोस्तत्फलानि गोचरफलानि वक्ष्यामि
कथयिष्यामि। नानावृत्तैर्विचित्रैर्वृत्तबन्धैः सम्पाद्य। आर्याः साधवः पण्डिता अस्माकं मुख-
चपलत्वं बहुभाषित्वं क्षमध्वं सहत इत्यर्थः। आर्याणामग्रे मुखचपलत्वमयोग्यमतः क्षम्यता-
मिति। मुखचपलेयमार्या।
अस्या लक्षणं व्याख्यायते। तत्र चार्यालक्षणेन विना तस्या लक्षणमुपदेष्टुं न युज्यते,
तस्मादार्यालक्षणं तावद् व्याख्यायते—
द्व्यान्तान्तरादिगुरुभिः सोदधिलैः सप्तभिर्गणैर्गुरुणा।
आर्यार्धं नात्रायुजि जः षष्ठोऽयं नलघुको वा।।
आर्या मात्राभिः परिमीयन्ते। पथ्यादीनामार्याणां त्रिंशन्मात्राः पूर्वमर्धं भवति। अपरं सप्त-
विंशतिः। चतुर्भिर्लघुभिर्गणो भवति। द्वौ गुरू यस्य द्विगुरुः। अन्तेऽवसाने गुरुर्यस्यासा-
वन्तगुरुः। अन्तरगुरुर्मध्यगुरुः। आदौ गुरुर्यस्यासावादिगुरुः। तैर्गणैः। कीदृशैः? सोदधिलैः,
उदधिसमसंख्याश्चत्वारो ला लघवो यस्य स उदधिलः, सह उदधिसंख्येन लेन गणेन
वर्तन्ते इति सोदधिलाः। तैः सोदधिलैरुक्तविकल्पैः। चतुर्भिर्लघुभिरित्यर्थः। एवमेष पञ्च-
विकल्पो गणस्तन्न्यास उक्तः—ऽऽ, ।।ऽ, ।ऽ।, ऽ।।, ।।।।, तैः सप्तभिर्गणैर्गुरुणा चाष्टमे-
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ग्रहगोचराध्यायः ५७५
नार्धगणेनार्याणां पथ्यादिकानां पूर्वमर्धं प्रथमदलं भवति। नात्रास्यामार्यायामयुजि प्रथमतृतीय-
पञ्चमसप्तमगणस्थानेषु जो गणश्च भवति। षष्ठोऽयं तु जकारो भवति। अथ वा षष्ठो गणो
नलघुको यो नलघू भजते जकाराभावात्। अन्यदप्याह—
ले लात् पदं द्वितीयात् प्रथमात् परकेऽथ विषमयुजि चरमे।
षष्ठो लोऽग्रेऽन्त्ये त्रिषु पादो भवति भवति तु पथ्या।।
ले सर्वलघौ षष्ठे गणे सति द्वितीयाल्लात् पदं कार्यम्। प्रथमात् परक इति। षष्ठात्
परके सप्तमगणे सर्वलघौ प्रथमाल्लात् पदं कार्यम्। षष्ठस्थानान्ते यतिः कार्येत्यर्थः।
अथ विषमयुजि चरमे। पश्चार्धे विषमयुजि पञ्चमस्थानभाजि ले सति प्रथमाक्षरमारभ्य
पदं विधेयम्। षष्ठो ल इति पश्चिमेऽर्धे षष्ठो गण एकलघुरेव कार्यः। अग्रेऽन्त्ये च त्रिषु
गणेषु यदि पादो यतिर्भवेत् तदा पथ्यानाम्यार्या भवतीत्यार्याद्वयस्यार्थः। द्व्यान्तान्तरादि-
गुरुभिरित्यस्य न्यासः। ले लात् पदमित्यस्य पथ्याया न्यासश्च प्रसिद्धः।

।।।।।।।।ऽऽऽऽऽऽऽऽ।।ऽ।।ऽ
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एवमादयः।
अथ विपुलाचपलयोर्लक्षणम्—
विपुला तु याऽन्यथा पादभाग् जकारौ द्वितीयकचतुर्थौ।
गुरुमध्यगौ भवेतां भवेत् तदा सर्वतश्चपला।।
पथ्यातो याऽन्यथा पादं भजते त्रिषु गणेषु यस्या यतिर्नास्तीत्यर्थः, सा विपुला, यत्र
तु जकारौ मध्यगुरुगणौ द्वितीयकचतुर्थौ द्वितीयस्थाने चतुर्थे च स्थितौ तौ च गुरुमध्यगौ
गुर्वोर्मध्यगौ भवेतां स्याताम्। सर्वतोऽर्धद्वयेऽपि तदा चपला भवति।
न्यासः— ज ज
⏜ ⏜ ⏜ ⏜ ⏜ ⏜ ⏜ ⏜
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ज ज
⏜ ⏜ ⏜ ⏜ ⏜ ⏜ ⏜ ⏜
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or anusvara? 'ला' 'यें' 'ति'? No, 'यै' 'ति' -> 'मुखचपलायैति'?
Wait, look at: 'मु' 'ख' 'च' 'प' 'ला' 'यै' 'ति' -> wait, between 'ला' and 'ति', there is 'यें' or 'यै'?
There's an anusvara? "मुखचपलायेंति"?
Wait, look at "मुखचपलायैति": 'य' has two slants. Does it have a dot? Yes, a tiny dot, or just two slants: 'मुखचपलायेंति' or 'मुखचपलायेति'?
Wait, in Sanskrit: "एवमियं मुखचपला आर्या इति" -> मुखचपलायैति or मुखचपलायेति.
Wait, "मुखचपला" + "इति" = मुखचपलेति! But here it is "मुखचपलाया इति" -> मुखचपलाया इति?
Wait, look at the characters:
म (ma)
ु (u)
ख (kha)
च (cha)
प (pa)
ल (la)
ा (aa)
य (ya) with two slants (ai) and dot? -> 'यें' or 'यै'? It looks like 'यें' or 'यै'.
Wait, look at line 2: "मुखचपलाया".
In line

ग्रहगोचराध्यायः ५७७
अधुना शार्दूलविक्रीडितेन सर्वग्रहाणां गोचरफलं संक्षेपेण दर्शयन्नाह—
सूर्यः षट्त्रिदशस्थितस्त्रिदशषट्सप्ताद्यगश्चन्द्रमा
जीवः सप्तनवद्विपञ्चमगतो वक्रार्कजौ षट्त्रिगौ ।
सौम्यः षड्द्विचतुर्दशाष्टमगतः सूर्येऽप्युपान्ते शुभाः
शुक्रः सप्तमषद्दशर्क्षसहितः शार्दूलवत् त्रासकृत् ॥४॥
जन्मराशि से छठी, तीसरी या दशवीं राशि में सूर्य; तीसरी, दशवीं, छठी, सातवीं
या पहली राशि में चन्द्रमा; सातवीं, नवीं, दूसरी या पाँचवीं राशि में गुरु; छठी या तीसरी
राशि में मंगल और शनि; छठी, दूसरी, चौथी, दशवीं या आठवीं राशि में बुध तथा
ग्यारहवीं राशि में सभी ग्रह शुभ होते हैं। सातवीं, छठी और दशवीं राशि स्थित शुक्र
सिंह की तरह भय करने वाला होता है। यह शार्दूलविक्रीडित छन्द भी है॥४॥
सूर्य आदित्यः। षट्त्रिदशस्थितः, यस्य जन्मराशेः षष्ठतृतीयदशमस्थो गोचरेण शुभः।
अर्थादेव परिशेषस्थानेष्वशुभः। त्रिदशषट्सप्ताद्यगश्चन्द्रमाः, चन्द्रमास्तृतीयस्थाने दशमे
षष्ठे सप्तमे आद्ये जन्मनि च गतः स्थितः शुभः। शेषेष्वशोभनः। जीवः सप्तनवद्विपञ्चम-
गतः, जीवो बृहस्पतिः सप्तमे स्थाने नवमे द्वितीये पञ्चमे च गतः प्राप्तः शुभः। शेषेष्वशुभः।
वक्रार्कजौ षट्त्रिगौ, वक्रोऽङ्गारकः। अर्कजः शनैश्चरः। एतौ षट्त्रिगौ षष्ठतृतीयस्थानप्राप्तौ
शुभौ। अन्यस्थानेष्वशुभाविति। सौम्यः षड्द्विचतुर्दशाष्टमगतः, सौम्यो बुधः, षष्ठद्वितीय-
चतुर्थदशमाष्टमस्थानगतः शुभः। शेषेष्वशुभः। सर्वेऽप्युपान्ते शुभाः। अन्त्यस्य द्वादशस्य
समीपमुपान्त्यमेकादशस्थानम्। तत्राप्युपान्ते सर्व एव सूर्यादयः शुभाः। शुक्रः सप्तम-
षद्दशर्क्षसहित इति। शुक्रः सप्तमे स्थाने षष्ठे दशमे ऋक्षे दशमे राशौ सहितः स्थितः
शार्दूलवत् सिंहवत् त्रासकृद् भयं करोति। यथा सिंहो दर्शनादेव भयं जनयति, तद्वदेतेषु
स्थानेषु स्थितः, शुक्रः, अथादेवान्यस्थानेषु स्थितः शुक्रः शुभ इति। शार्दूलविक्रीडितं वृत्त-
मेतत्। तल्लक्षणम्—
म्सौ जसौ तौ गुरुं च सूर्यतुरगैः शार्दूलविक्रीडितम्।
अत्र मस्त्रिगुरुः। सोऽन्तगुरुः। जो गुरुमध्यगतः। सः पुनरन्तगुरुः। अन्तर्लघुस्तः।
द्वौ तकारौ। अन्ते गुरुश्च। सूर्या द्वादश। तुरगा अश्वाः सप्त। अस्य सूर्यतुरगैर्द्वादशभिः
सप्तभिश्च यतिर्भवति॥४॥
न्यासः— म स ज स त त गु
ऽऽऽ ।।ऽ ।ऽ। ।।ऽ ऽऽ। ऽऽ। ऽ
इदानीमाचार्यः पृथक् पृथग् विस्तरेण गोचरफलं चिकीर्षुस्तत्रादावेवार्कस्य जन्मद्वितीय-
तृतीयचतुर्थस्थानेषु गोचरफलं स्रग्धरावृत्तेनाह—
जन्मन्यायासदोऽर्कः क्षपयति विभवान् कोष्ठरोगाध्वदाता
वित्तभ्रंशं द्वितीये दिशति च न सुखं वञ्चनां दृग्रुजं च।
बृ० सं० द्वि०-३७

[Header] ५७८ बृहत्संहिता

स्थानप्राप्तिं तृतीये धननिचयमुदा कल्पकृच्चारिहर्ता
रोगान् दत्ते चतुर्थे जनयति च मुहुः स्रग्धराभोगविघ्नम् ॥५॥
यदि सूर्य जन्मराशि में हो तो उपद्रव, धन का नाश, पेट का रोग और मार्ग में
भ्रमण; द्वितीय राशि में हो धन का नाश, दुःख, सभी कार्यों का नाश और नेत्ररोग;
तृतीय राशि में हो तो स्थानलाभ, धन-समूह से युत, आनन्दयुत और शत्रु का नाश तथा
चतुर्थ राशि में सूर्य हो तो रोग और माला को धारण करने वाली स्त्री के उपभोग में
बार-बार विघ्न उत्पन्न करता है। यह स्रग्धरा छन्द है।।५।।
अर्क आदित्यो जन्मनि जन्मराशौ आयासमुपद्रवं ददाति। विभवानैश्वर्यान् क्षपयति
नाशयति। कोष्ठरोगाध्वदाता, कोष्ठरोगं हृदयरोगमुदरामयमध्वानं च ददाति। वित्तभ्रंशं
द्वितीय इति। द्वितीयस्थाने वित्तभ्रंशं धननाशं दिशति ददाति। न सुखं सुखं च न ददाति।
केचिन्मनसि च न सुखं पठन्ति। वञ्चनामुपशमनं सर्वकार्याणाम्। दृग्रुजं नेत्रपीडां च दिशति।
स्थानप्राप्तिं तृतीय इति। तृतीये स्थानप्राप्तिं स्थानलाभं तथा धननिचयमुदा कल्पकृत्,
धनस्य वित्तस्य निचयः समूहः, तेन या मुद्धर्षस्तया कल्पमरोगित्वं करोति। अरिहर्ता
शत्रुघाती च भवति। रोगान् दत्ते चतुर्थ इति। चतुर्थस्थाने रोगान् गदान् दत्ते ददाति।
मुहुः क्षणं क्षणं स्रग्धराभोगविघ्नं जनयति उत्पादति। स्रजं मालां धारयतीति स्रग्धरा
स्त्री तस्या भोगे उपभोगे पीडितत्वाद्धिघ्नं जनयति। स्रग्धरावृत्तमेतत्। तल्लक्षणम्—
मौ भ्नौ याश्च त्रयः स्युः स्वरमुनितुरगैः स्रग्धरा स्याद्दिरामैः।
अत्र मस्त्रिगुरुः। रो लमध्यः। भ आदिगुरुः। नः सर्वलघुः। य आदिलघुः। ते च त्रयो
यकाराः। स्वराः समस्ताः सप्त मुनयस्तुरगाश्च सप्त एतैर्विरामैर्यतिभिः स्रग्धरा स्याद् भवेत्।
न्यासः— म र भ न य य य
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अथ पञ्चमषष्ठसप्तमाष्टमेषु फलं सुवदनावृत्तेनाह—
पीडाः स्युः पञ्चमस्थे सवितरि बहुशो रोगारिजनिताः
षष्ठेऽर्को हन्ति रोगान् क्षपयति च रिपून् शोकांश्च नुदति।
अध्वानं सप्तमस्थो जठरगदभयं दैन्यं च कुरुते
रुक्त्रासौ चाष्टमस्थे भवति सुवदना न स्वापि वनिता ॥६॥
यदि सूर्य जन्मराशि से पञ्चम राशि में हो तो रोग और शत्रु-जनित बहुत प्रकार की
पीड़ा; षष्ठ में हो तो रोग, शत्रु और शोक का नाश; सप्तम में हो तो मार्ग में भ्रमण, पेट
के रोग का भय और दुःखी तथा अष्टम में हो तो रोग और भय करता है एवं अपनी स्त्री
भी सुवदना (अच्छी तरह बात) नहीं करती है। यह सुवदना छन्द है।।६।।
पीडाः स्युरिति। पञ्चमस्थे पञ्चमस्थानस्थिते सवितर्यादित्ये बहुशो बहुप्रकारा रोगा-

ग्रहगोचराध्यायः ५७९
रिजनिता रोगजनिताः शत्रुजनिताश्च शत्रुभिरुत्पादिताः पीडा व्यथाः स्युर्भवेयुः। षष्ठेऽर्क
इति। षष्ठे स्थानेऽर्कः सूर्यो रोगान् हन्ति नाशयति; रिपून् शत्रूंश्च क्षपयति विनाशयति;
शोकान् चित्तसन्तापांश्च नुदति प्रेरयति नाशयतीत्यर्थः। अध्वानं सप्तमस्थ इति। सप्तम-
स्थोऽर्कोऽध्वानं कुरुते। तथा च जठरगदभयम्, जठरमुदरम्, गदो रोगः, जठररोगभयम्।
दैन्यं दीनतां च कुरुते। रुक्त्रासौ चाष्टमस्थ इति। अष्टमस्थेऽर्के रुक्त्रासौ रोगभये भवतः।
स्वापि वनिता आत्मीयापि स्त्री सुवदना शोभनमुखी सस्नेहा न भवति। वृत्तमिदं सुवदना।
तल्लक्षणम्—
मौ भ्नौ य्भौ ल्गौ मुनिव्योमगरसविरतिः ख्याता सुवदना।
अत्र मस्त्रिगुरुः। रो लमध्यः। भ आदिगुरुः। नस्त्रिलघुः। यकार आदिलघुः। भ आदि-
गुरुः। अन्ते लघुगुरू। मुनयः सप्त। व्योमगाः सप्त। रसाः षट्। एतैर्विरतिर्विरामो यति-
र्यस्याः सा सुवदना कथिता इति।।६।।
न्यासः — म र भ न य भ ल गु
ऽऽऽ ऽ।ऽ ऽ।। ।।। ।ऽऽ ऽ।। । ऽ
अथ नवमदशमैकादशद्वादशस्थानस्थेऽर्के फलं सुवृत्तयाऽऽह—
रवावापद्धैन्यं रुगिति नवमे वित्तचेष्टाविरोधो
जयं प्राप्नोत्युग्रं दशमगृहगे कर्मसिद्धिं क्रमेण।
जयस्थानं मानं विभवमपि चैकादशे रोगनाशं
सुवृत्तानां चेष्टा भवति सफला द्वादशे नेतरेषाम् ॥७॥
यदि सूर्य जन्मराशि से नवम राशि में हो तो आपत्ति, दीनता और धन के प्रयोग
आदि से विघ्न; दशम में हो तो कठिन विजय और कार्य की सिद्धि; एकादश में हो तो
विजय, स्थानलाभ, पूजा और रोग का नाश तथा द्वादश राशि में हो तो सुन्दर स्वभाव
वालों की क्रिया फलवती होती है, दुर्जनों की नहीं। यह सुवृत्ता छन्द है॥७॥
रवावापद्धैन्यमिति। रवावादित्ये नवमे नवमस्थानस्थे आपदार्तिर्दैन्यं दीनता। रुग्रोगः।
वित्तस्य धनस्य चेष्टया क्रियया विरोधो विघ्नो भवति। इतिशब्दः प्रकाराय। जयं प्राप्नो-
त्युग्रमिति। दशमगृहगे दशमस्थानस्थेऽर्के जयं विजयमुग्रं कठिनं प्राप्नोति लभते। क्रमेण
परिपाट्या कर्मसिद्धिं कार्याणां निष्पत्तिम्। जयस्थानमिति। एकादशे जयं विजयं स्थानं
स्थानलाभं मानं पूजां विभवमैश्वर्यं रोगनाशं गदोपशमनं च प्राप्नोति। सुवृत्तानामिति।
द्वादशे सूर्ये सुवृत्तानां शोभनं वृत्तं शीलं येषां तेषां चेष्टा क्रिया सफला फलसंयुक्ता
भवति। तथा चोक्तम्—
मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यं च प्रयतात्मनाम्।
जपतां जुह्वतां चैव विनिपातो विनश्यते।। इति।

५८० बृहत्संहिता
नेतरेषाम्। दुर्वृत्तानां चेष्टा सफला न भवति। वृत्तमिदं सुवृत्ता। तल्लक्षणम्—
यमौ नसौ रौ गश्चेद् द्विरसमुनिभिः स्याद्विरामैः सुवृत्ता।
य आदिलघुः। मस्त्रिगुरुः। नस्त्रिलघुः। सोऽन्तगुरुः। रलमध्यः। द्वौ रेफौ। सोऽन्ते
गुरुः। द्वे यती रसैः षड्भिर्भवतः। तृतीया मुनिभिः सप्तभिः। एतैर्विरामैः सुवृत्ता स्याद्
भवेत्। अन्येषां मेघविस्फूर्जिता।
न्यासः— य म न स र र गु
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तथा च यवनेश्वरः—
हृद्रोगशोकाध्वविवाहदैन्यक्रोधक्षयव्याधिभयार्तिदोषान् ।
स्थाने शशाङ्कस्य रविः करोति व्यर्थश्रमोद्वेगमपि द्वितीये॥
तृतीयसंस्थो धनमानधर्मस्थानासनप्रीतिसुखप्रदोऽर्कः।
चतुर्थगस्तु क्षतजप्रवृत्तिर्ज्वरामयो भेदविवादकारी।।
नृपावमर्दात्मजबन्धुशोकव्याधिप्रदः पञ्चमसंस्थितोऽर्कः।।
आरोग्यसौख्यारिविनाशहर्षख्यातिक्रियासिद्धिकरश्च षष्ठः।।
जामित्रसंस्थो रुधिरप्रवृत्तिज्वरक्लमाजीर्णविषाध्वकारी।
सूर्योऽष्टमे स्त्रीसुतबन्धुदुःखव्याधिप्रदोपद्रवमृत्युकृत् स्यात्।।
दैन्यस्थितिभ्रंशगुरुस्वबन्धुप्रद्वेषकृत् स्यान्नवमाश्रितोऽर्कः।
मेषूरणस्थो द्विचतुष्पदस्त्रीहिरण्यरौप्याम्बरलाभकर्ता।।
एकादशे स्थानयशःप्रहर्षमिष्टान्नारोग्यसुखप्रदोऽर्कः।
स्थाने निरुक्तं शशिनो विधिज्ञैः क्रियाफलाघातकृदन्त्यराशौ।। इति।।७।।
अथ चन्द्रमसो जन्मद्वितीयतृतीयचतुर्थस्थस्य फलं शिखरिण्याऽऽह—
शशी जन्मन्यन्नप्रवरशयनाच्छादनकरो
द्वितीये मानार्थान् ग्लपयति सविघ्नश्च भवति।
तृतीये वस्त्रस्त्रीधनविजयसौख्यानि लभते
चतुर्थेऽविश्वासः शिखरिणि भुजङ्गेन सदृशः ॥८॥
यदि चन्द्रमा जन्मराशि में हो तो अन्न, उत्तम शय्या और वस्त्र को देता है। द्वितीय
में हो तो पूजा और धन का नाश तथा विघ्न करता है। तृतीय में हो तो वस्त्र, धन, विजय
और सुख का लाभ कराता है तथा जिसके चतुर्थ राशि में चन्द्र हो, उसको शिखरी
( पर्वत ) पर सर्प की तरह सब पर अविश्वास रहता है। यह शिखरिणी छन्द है॥८॥
शशी जन्मनीति। शशी चन्द्रः। जन्मनि जन्मराशौ स्थितः। अन्नप्रवराणि प्रधानानि
शयनानि आस्तरणानि आच्छादनानि वस्त्राणि करोति। द्वितीय इति। द्वितीये स्थाने मानं
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